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पशुपालन, संस्कृति और ग्रामीण जीवन का उत्सव

नागौर पशु मेला 24-27 जनवरी

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नागौर का पशु मेला सिर्फ पशु व्यापार तक सीमित नहीं है, यह राजस्थान और देशभर की पशुपालन संस्कृति, लोक कला, पारंपरिक पोशाक, खेल और ग्रामीण जीवन का जीवंत उत्सव है।

नागौर का पशु मेला सिर्फ पशुओं के व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समूची पशुपालक संस्कृति का उत्सव है। यहां राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश के पशुपालक केवल पशुओं की खरीद-फरोख्त के लिए ही नहीं आते और न ही हजारों पर्यटक सिर्फ पशु व्यापार देखने भर आते हैं, बल्कि सभी लोग पशुपालन संस्कृति का जश्न मनाने यहां जुटते हैं। इस मेले में सजे-धजे ऊंट, साबुन से धुले और सींगों में तेल लगाए बैल तथा करीने से सुसज्जित घोड़े उत्सव की एक अलग ही छटा बिखेरते हैं। यह सब केवल व्यापार के लिए नहीं, बल्कि पूर्वजों के सौंदर्यबोध और जीवन संस्कृति के उत्सव के रूप में होता है। वास्तव में नागौर का पशु मेला सिर्फ राजस्थान का नहीं, बल्कि देश की समूची पशुपालन सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है।

मेले के दौरान यहां सैकड़ों तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। ढोल, नगाड़े, खड़ताल और अलगोजे की गूंज हर तरफ सुनाई देती है। कालबेलिया, घूमर और तेरहताली जैसे लोकनृत्यों की प्रवीणता का भी यह उत्सव है। एक से बढ़कर एक लोकनर्तक अपनी नृत्य कला से दर्शकों और पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। जहां लोक कलाकारों के लिए यह मेला पहचान और आजीविका का साधन है, वहीं देश-विदेश से आए हजारों पर्यटकों के लिए यह आत्मा के विरेचन का जरिया बनता है। लोग यहां सिर्फ घूमने नहीं, बल्कि तन और मन से तरोताजा होने के लिए आते हैं।

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पहनावे का प्रदर्शन

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नागौर मेले में राजस्थानी पहनावे का मुग्धकारी प्रदर्शन देखने को मिलता है। यह मेला एक तरह से राजस्थानी पारंपरिक वस्त्रों के आकर्षक संसार जैसा है। यहां पुरुषों के सिर पर कम से कम सौ से अधिक तरह की रंग-बिरंगी पगड़ियां देखने को मिल जाती हैं। राजस्थानी अंगरखा, धोती, महिलाओं की घाघरा-चोली, ओढ़नी और चांदी सहित अन्य पारंपरिक धातुओं के प्राचीन गहने इस मेले को सांस्कृतिक संग्रहालय का रूप दे देते हैं। नागौर मेला राजस्थानी पोशाक संस्कृति का महाकाव्य है। पोशाकों की जितनी विविधता और बहुरंगी छटा यहां देखने को मिलती है, शायद ही किसी दूसरे मेले में मिलती हो।

इसके अलावा नागौर मेला पशुओं की सौंदर्य प्रतियोगिताओं के लिए भी मशहूर है। यहां ऊंटों को नवविवाहितों की तरह सजाया जाता है। पर्यटक रोमांचक ऊंट दौड़ का भी आनंद लेते हैं और इस मेले में पारंपरिक ग्रामीण खेल, जैसे रस्साकशी, बैल और ऊंटगाड़ी दौड़ प्रतियोगिताएं भी होती हैं। नागौर का पशु मेला भले ही पशुओं के नाम पर जाना जाता हो, लेकिन यह समूचे पशुपालक समुदाय की सभ्यता का उत्सव है।

ग्रामीण भारत की झलक

इस मेले में समूचे ग्रामीण भारत की झलक देखने को मिलती है। दूसरे शहरी मेलों के विपरीत नागौर मेला अभी भी चमक-दमक और बाजार की दिखावट का शिकार नहीं हुआ है। यहां ग्रामीण सादगी हर तरफ बिखरी नजर आती है। यहां आने वाला व्यक्ति राजस्थान के ग्रामीण जीवन को बहुत नजदीक से देख पाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह व्यापार और उत्सव का साझा संगम है। पशु खरीद-बिक्री के साथ गीत-संगीत, खानपान और मनोरंजन का उत्सव भी अनवरत चलता रहता है।

इस मेले का एक धार्मिक और आस्था से जुड़ा पक्ष भी है। यह मेला लोकदेवता रामदेवजी की पहचान से भी जुड़ा हुआ है। यहां लाखों की तादाद में उनके भक्त आते हैं, जिससे मेले में आध्यात्मिक रंग भी घुल जाता है। नागौर मेला वास्तव में राजस्थान की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करता है। लोकगीत, लोकनृत्य, लोकबोलियां और लोकपरंपराएं इस बहुरंगी अनुष्ठान के जरिए सहज रूप से संरक्षित होती हैं। नागौर जैसे मेले ऐसी गतिविधियां हैं, जिन्हें किसी पर्दे या किताबों के माध्यम से पूरी तरह महसूस नहीं किया जा सकता।

पशुपालन अर्थव्यवस्था का आधार

यह मेला राजस्थान के पशुपालन अतीत की खुली किताब है। यह उस अर्थव्यवस्था को लोगों के सामने पुनर्जीवित करता है, जो कभी पशुओं पर आधारित जीवन के कारण यहां की मूल जीवनशैली थी। आज के आधुनिक और यांत्रिक युग में यह संस्कृति जीवंत रूप में ऐसे आयोजनों में ही देखी और जी जा सकती है। नागौर मेला इसलिए खास है, क्योंकि यह इस विशिष्ट संस्कृति को जीवंत बनाए हुए है। इस मेले में पहुंचकर हम पशुओं की उपयोगिता, उनकी नस्ली विशिष्टता और उनके कारोबार के तौर-तरीके बिल्कुल जीवंत रूप में देख सकते हैं।

यही कारण है कि नागौर मेला देखने के लिए देश-विदेश से हर साल हजारों पर्यटक इस उत्सव को जीने आते हैं। विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष रूप से नागौर मेला एक अनोखा अनुभव होता है, जहां ऊंटों की कतारें, लोकवाद्यों की धुनें और मरुस्थलीय जीवन की लय एक साथ सुर-ताल में संगत करती नजर आती हैं। ऐसे मेले केवल जीवनयापन की गतिविधियों को ही नहीं, बल्कि संस्कृति को भी संरक्षित करते हैं। इसी वजह से नागौर का वार्षिक पशु मेला अब एक विशिष्ट सांस्कृतिक मेले के रूप में जाना जाता है। इ.रि.सें.

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