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हरीश राणा के निधन के बाद चर्चा में 'आखिरी सांस' की वसीयत, जब डॉक्टर हार मान लें, तो कैसे काम आता है 'लिविंग विल' कानून

Harish Rana Euthanasia : 13 साल से कोमा में रहे गाजियाबाद के हरीश राणा का निधन। जानिए क्या है 'लिविंग विल' और मशीनों के सहारे 'ज़िंदा लाश' बनने से इनकार कर सम्मानजनक मृत्यु चुनने का आपका कानूनी अधिकार

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2013 के हादसे से पहले हरीश राणा (बाएं) और कोमा (वेजिटेटिव स्टेट) में जाने के बाद की स्थिति। (फोटो साभार: X)
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Harish Rana Euthanasia : हर भारतीय अपनी जिंदगी भर की कमाई, घर, जमीन और बैंक बैलेंस का हिसाब अपनी वसीयत में छोड़कर जाता है, ताकि हमारे जाने के बाद परिवार में कोई विवाद न हो। लेकिन क्या आपने कभी अपनी 'आखिरी सांस' की वसीयत (Living Will) के बारे में सुना है? कल्पना कीजिए, आप आज पूरी तरह स्वस्थ हैं और आज ही यह तय कर दें कि अगर भविष्य में किसी हादसे या बीमारी की वजह से आप कोमा में चले जाएं, जहां से वापसी की कोई उम्मीद न बचे, तो आपको वेंटिलेटर या मशीनों के सहारे 'ज़िंदा लाश' बनाकर न रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने आपके इस फैसले को एक कानूनी हकीकत बना दिया है।

16 मार्च 2026 को शरीर से लाइफ स्पोर्ट सिस्टम हटा दिया गया।  11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने उनके माता-पिता की याचिका पर ऐतिहासिक आदेश देते हुए उनके शरीर से लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाजत दी थी।

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हरीश राणा केस : 13 साल का मौन, माता-पिता की तड़प और एक गरिमापूर्ण अंत

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गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा के साथ 2013 में चंडीगढ़ (मोहाली) में एक बेहद दर्दनाक हादसा हुआ था। वह अपने पेइंग गेस्ट (PG) की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई थी। उस दिन के बाद से हरीश 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' (Permanent Vegetative State) में चले गए। यह एक ऐसी मेडिकल स्थिति है जिसमें मरीज की आंखें तो खुली हो सकती हैं, लेकिन उसका दिमाग काम करना बंद कर देता है और वह अपने आस-पास की दुनिया से पूरी तरह कट जाता है।

उनके बुजुर्ग माता-पिता (अशोक राणा और उनकी पत्नी) ने अपने जवान बेटे को 13 साल तक अपने सामने तिल-तिल कर मरते देखा। घर बिक गया, सारी जमा-पूंजी इलाज में खत्म हो गई। जब डॉक्टरों ने जवाब दे दिया कि हरीश अब कभी ठीक नहीं हो सकते, तो माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि उनके बेटे को इस 'मशीनी नरक' से मुक्ति दी जाए। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बिना किसी उम्मीद के उन्हें इस हाल में वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब के सहारे रखना उनके साथ 'अमानवीय क्रूरता' है। 16 मार्च को उनके निधन के साथ ही भारत में पहली बार पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) को व्यावहारिक रूप से लागू किया गया।

'मौत की वसीयत' या लिविंग विल आखिर है क्या?

लिविंग विल एक ऐसा अग्रिम चिकित्सा निर्देश (Advance Medical Directive) है जिसे कोई भी व्यक्ति तब तैयार करता है जब वह पूरी तरह स्वस्थ, मानसिक रूप से परिपक्व और होश में हो। इसमें व्यक्ति स्पष्ट रूप से यह निर्देश देता है कि यदि भविष्य में वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां उसका मस्तिष्क मृत (Brain Dead) हो जाए या वह स्थायी कोमा में चला जाए, जहां से ठीक होने की मेडिकल विज्ञान में कोई गुंजाइश न हो, तो उसे कृत्रिम साधनों (जैसे वेंटिलेटर, सीपीआर या फीडिंग ट्यूब) पर न रखा जाए।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को 'सम्मान के साथ जीने का अधिकार' है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि 'सम्मान के साथ जीने' के अधिकार में 'सम्मान के साथ मरने का अधिकार' भी शामिल है।

क्या है इसका उद्देश्य?

  • आर्थिक और मानसिक बचाव : यह दस्तावेज परिवार को उस भारी आर्थिक कर्ज और मानसिक दलदल से बचाता है जो बरसों तक एक बेनतीजा इंतजार में पैदा होता है।
  • डॉक्टरों पर से बोझ कम : अक्सर डॉक्टर कानूनी पचड़े से बचने के लिए ब्रेन डेड मरीज को भी मशीनों पर रखते हैं। लिविंग विल डॉक्टरों को स्पष्टता देती है।
  • अपनी शर्तों पर विदाई : आप खुद तय करते हैं कि आपको कृत्रिम रूप से भोजन या जीवन रक्षक दवाएं दी जाएं या नहीं।

'लिविंग विल' कैसे बनाएं ? 

2018 में जब सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इसे लागू किया था, तो प्रक्रिया बहुत जटिल थी। लेकिन 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इसके नियमों में संशोधन करके इसे बेहद सरल बना दिया है। इसकी वर्तमान प्रक्रिया इस प्रकार है :

  • कौन बना सकता है : 18 साल या उससे अधिक उम्र का कोई भी व्यक्ति, जो मानसिक रूप से स्वस्थ हो।
  • सत्यापन: पहले इसके लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की जरूरत होती थी। अब यह अनिवार्यता खत्म कर दी गई है। आप किसी भी नोटरी या प्रथम श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी के सामने दो गवाहों की मौजूदगी में इस वसीयत को सत्यापित करवा सकते हैं।
  • कस्टडी : इसकी एक कॉपी आपके पास रहेगी, एक कॉपी आपके द्वारा चुने गए 'प्रतिनिधि' (जो आपके कोमा में जाने पर फैसला लेगा) के पास होगी, और एक कॉपी स्थानीय पंचायत या नगर निगम के सुरक्षित रिकॉर्ड में जमा होगी।
  • मेडिकल बोर्ड की भूमिका : जब मरीज कोमा में जाता है, तो अस्पताल का एक प्राइमरी मेडिकल बोर्ड उसकी जांच करेगा। इसके बाद जिला प्रशासन द्वारा बनाया गया एक सेकेंडरी बोर्ड उसकी पुष्टि करेगा। यह पूरी प्रक्रिया अब 48 घंटे के भीतर पूरी करना अनिवार्य है।

एक्टिव बनाम पैसिव यूथेनेशिया : क्या वैध है और क्या अपराध?

अक्सर लोग 'इच्छा मृत्यु' शब्द सुनकर भ्रमित हो जाते हैं। कानूनी और मेडिकल नजरिए से इसके दो स्पष्ट हिस्से हैं:

  • पैसिव यूथेनेशिया (भारत में वैध) : इसमें मरीज की जान लेने के लिए बाहर से कोई दवा नहीं दी जाती। बल्कि, उसे कृत्रिम रूप से जिंदा रखने वाली मशीनें (वेंटिलेटर/ट्यूब) हटा ली जाती हैं, ताकि प्राकृतिक रूप से उसकी मृत्यु हो सके। हरीश राणा के केस में यही हुआ है।
  • एक्टिव यूथेनेशिया (भारत में अवैध) : इसमें डॉक्टर मरीज को मौत की नींद सुलाने के लिए ज़हर या किसी जानलेवा दवा का इंजेक्शन देते हैं। नीदरलैंड या स्विट्जरलैंड जैसे कुछ देशों में यह वैध है, लेकिन भारत में यह पूरी तरह से प्रतिबंधित है और इसे भारतीय न्याय संहिता के तहत 'हत्या' माना जाता है।

दुनिया भर में 'इच्छा मृत्यु' के नियम 

समझें कि भारत का कानून दुनिया के अन्य देशों से कितना अलग, संतुलित और सुरक्षित है :

देशकानून का नामसरल भाषा में इसका मतलब
नीदरलैंडसक्रिय (Active)यहां डॉक्टर खुद ज़हरीला इंजेक्शन लगा सकता है। यह इच्छा मृत्यु का सबसे खुला रूप है।
स्विट्जरलैंडसहायता प्राप्त (Assisted)यहां संस्थाएं घातक दवा देती हैं, लेकिन उसे मरीज को खुद अपने हाथ से पीना होता है।
भारतसंतुलित (Passive)यहां जान ली नहीं जाती। केवल मशीनें हटाई जाती हैं ताकि मृत्यु प्राकृतिक रूप से हो सके।

ऐतिहासिक सफर : अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक (2011 से 2026)

भारत में इस कानून की नींव रातों-रात नहीं पड़ी। इसके पीछे एक लंबा दर्दनाक इतिहास है :

  • अरुणा शानबाग (2011) : मुंबई के केईएम अस्पताल की नर्स अरुणा शानबाग के साथ 1973 में क्रूर बलात्कार हुआ, जिसके बाद वह 42 साल तक कोमा में रहीं। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके मामले में पहली बार 'पैसिव यूथेनेशिया' शब्द का जिक्र किया, हालांकि उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली (2015 में उनका प्राकृतिक निधन हुआ)।

  • कॉमन कॉज एनजीओ (2018) : 'कॉमन कॉज' नामक संस्था की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 'लिविंग विल' को कानूनी मान्यता दी और इसे मौलिक अधिकार माना।

  • 2023 का संशोधन : इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन की याचिका पर कोर्ट ने 2018 के सख्त नियमों को सरल बनाया ताकि आम आदमी इसका इस्तेमाल कर सके।

  • हरीश राणा (2026) : यह पहला मामला बना जहां कोर्ट ने 13 साल की लंबी पीड़ा के बाद 'ट्यूब हटाने' की व्यावहारिक और अंतिम इजाजत दी।

प्राचीन भारतीय दर्शन और मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय (KUK) के विधि विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुधीर कुमार इस विषय पर गहराई से प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि यह कोई पश्चिमी अवधारणा नहीं है। भारत में स्वेच्छा से प्राण त्यागने का विचार बहुत पुराना है। जैन धर्म में 'संथारा' (या सल्लेखना) और हिंदू धर्म में 'प्रायोपवेश' (उपवास द्वारा शरीर त्यागना) जैसी प्राचीन परंपराएं रही हैं। डॉ. सुधीर कुमार के अनुसार आधुनिक पैसिव यूथेनेशिया दरअसल हमारे प्राचीन दार्शनिक मूल्यों का ही मेडिकल संस्करण है, जहां मृत्यु को 'डर' के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की 'अंतिम शुद्धि' के रूप में देखा जाता है।

इसके अलावा, भारत का मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 की धारा 5 भी मरीजों को 'अग्रिम निर्देश' का अधिकार देती है। यदि कोई व्यक्ति स्वस्थ रहते हुए यह लिख कर देता है कि उसे भविष्य में कोई विशेष इलाज (जैसे मशीनी जीवन) नहीं चाहिए, तो डॉक्टरों को कानूनी रूप से उसकी उस इच्छा का सम्मान करना ही होगा।

क्या होगा अगर मेडिकल बोर्ड अनुमति न दे ?

यदि किसी मामले में अस्पताल का प्राइमरी या सेकेंडरी बोर्ड मशीनें हटाने की अनुमति देने से इनकार कर दे, तो घबराने की जरूरत नहीं है। मरीज का परिवार या प्रतिनिधि सीधे राज्य के हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकता है। ऐसे मामलों में हाईकोर्ट अपना एक स्वतंत्र विशेषज्ञ डॉक्टरों का बोर्ड गठित करेगा। हरीश राणा के मामले में भी कोर्ट ने साफ किया है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में बिना किसी देरी के त्वरित न्याय मिलना अनिवार्य है।

हरीश राणा की विदाई हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जीवन की सार्थकता सिर्फ सांसें चलने में है, या उसे गरिमा के साथ जीने में!

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