Education Reform : सिलेबस बदला, स्कूल बदले, फिर भी 'काबिल' क्यों नहीं बन रहे बच्चे? वो एक वजह जो हुनर की राह में है सबसे बड़ा रोड़ा
नई किताबों और सुधारों के बड़े दावों के बीच परीक्षा प्रणाली की वो कड़वी हकीकत, जो छात्रों के भविष्य और रचनात्मक सोच की राह में सबसे बड़ी दीवार
Education Reform : दुनिया भर की शिक्षा व्यवस्था में इन दिनों एक नई हलचल है। अफ्रीका से लेकर एशिया तक, लगभग हर देश अपने पुराने ढर्रे को छोड़कर ऐसे पाठ्यक्रम (Curriculum) अपना रहा है, जो बच्चों में आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking) और समस्या सुलझाने के कौशल (Problem-Solving Skills) विकसित कर सकें। इन सुधारों को 'योग्यता-आधारित पाठ्यक्रम' कहा जाता है, जिसका उद्देश्य छात्रों को रटंत विद्या से निकालकर असल जिंदगी की चुनौतियों के लिए तैयार करना है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन तमाम बदलावों और करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी जमीन पर नतीजे क्यों नहीं दिख रहे? आखिर वो कौन सी ताकत है जो बच्चों को उपयोगी हुनर सीखने से रोक रही है? पीटीआई (PTI) की एक विस्तृत रिपोर्ट और 'डिस्कवर एजुकेशन' में प्रकाशित शोध के अनुसार, इस संकट की सबसे बड़ी जड़ हमारी 'परीक्षा प्रणाली' है।
जब हम शिक्षा सुधार की बात करते हैं, तो अक्सर ध्यान शिक्षकों की ट्रेनिंग या बेहतर स्कूल इमारतों पर होता है। लेकिन अध्ययन बताते हैं कि असली समस्या 'टीचिंग' और 'टेस्टिंग' के बीच का बड़ा अंतर है। पाठ्यक्रम तो आधुनिक हो गए हैं, लेकिन उन्हें परखने का पैमाना आज भी दशकों पुराना है।
योग्यता बनाम रटने का खेल
आज के नए 'योग्यता-आधारित पाठ्यक्रम' इस बात पर जोर देते हैं कि छात्र जो कुछ भी सीख रहे हैं, उसे व्यवहार में कैसे लाएं। उदाहरण के तौर पर, विज्ञान के छात्र को केवल बीमारियों की परिभाषा याद नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे यह समझना चाहिए कि बीमारियां कैसे फैलती हैं और उन्हें रोकने के व्यावहारिक उपाय क्या हैं।
हालांकि, समस्या तब आती है जब छात्र परीक्षा देने बैठता है। वहां उससे व्यवहारिक समझ के बजाय किताबों में लिखी पंक्तियों को ज्यों का त्यों दोहराने की उम्मीद की जाती है। जब तक परीक्षाओं का स्वरूप नहीं बदलेगा, तब तक बच्चों के सीखने की दिशा भी नहीं बदलेगी।
शिक्षकों की दोहरी मुसीबत: रटवाएं या सिखाएं?
इस व्यवस्था ने शिक्षकों के सामने एक 'दोहरी चुनौती' (Double Bind) पैदा कर दी है। एक तरफ नीति-निर्माता उनसे कहते हैं कि बच्चों को रचनात्मक बनाएं, उन्हें रटवाएं नहीं। दूसरी तरफ, बोर्ड परीक्षाओं और स्कूल के नतीजों का ऐसा दबाव होता है कि शिक्षक चाहकर भी नया प्रयोग नहीं कर पाते। उन्हें पता है कि अंत में छात्र की सफलता केवल उसके अंकों से मापी जाएगी, और अंक रटने से आते हैं।
जब परीक्षा ही बन जाए असली पाठ्यक्रम
घाना, केन्या और वियतनाम जैसे देशों के डेटा का विश्लेषण करने पर एक खतरनाक पैटर्न सामने आया है। वहां की बोर्ड परीक्षाएं न केवल छात्रों की याददाश्त को पुरस्कृत करती हैं, बल्कि वे यह भी तय करती हैं कि कक्षा में क्या पढ़ाया जाएगा। प्रभावी रूप से, परीक्षा का 'क्वेश्चन पेपर' ही असली पाठ्यक्रम बन गया है। शिक्षक केवल वही पढ़ाते हैं जो परीक्षा में पूछा जाना है, और छात्र केवल वही पढ़ते हैं जिससे उन्हें 'ए-ग्रेड' मिल सके। इस चक्कर में वह हुनर और व्यवहारिक ज्ञान कहीं खो जाता है, जिसकी जरूरत रोजगार और वास्तविक जीवन में पड़ती है।
समाधान की राह: क्या है 'लर्न' (LEARN) मॉडल ?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हम वाकई सुधार चाहते हैं, तो हमें 'परीक्षा' शब्द के मायने बदलने होंगे। शोधकर्ताओं ने इस संकट से निकलने के लिए 'लर्न' (LEARN) मॉडल का प्रस्ताव दिया है, जो मूल्यांकन के तरीके को पूरी तरह बदलने की वकालत करता है।
इस मॉडल के पांच प्रमुख सूत्र इस प्रकार हैं:
L (Learner-centred assessment): मूल्यांकन ऐसा हो जो छात्र के सीखने के तरीके को समझे। इसमें रटने वाले सवालों के बजाय ज्ञान के प्रयोग वाले कार्यों को महत्व दिया जाए।
E (Evidence of competence): यह देखा जाए कि बच्चा क्या 'कर' सकता है, न कि उसे क्या 'याद' है। योग्यता के सबूतों को प्राथमिकता दी जाए।
A (Adaptive to context): परीक्षा प्रणाली लचीली हो, ताकि वह अलग-अलग क्षेत्रों और परिवेश के बच्चों की प्रतिभा को सही ढंग से परख सके।
R (Reflective and feedback oriented): मूल्यांकन डराने के लिए नहीं, बल्कि सुधार के लिए हो। छात्र को पता चले कि उसे कहां बेहतर होना है।
N (Nationally relevant and scalable): ऐसा सिस्टम जो पूरे देश में व्यावहारिक रूप से लागू किया जा सके और जिसकी विश्वसनीयता बनी रहे।
अंकों के पिंजरे से बाहर निकलने का समय
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव केवल नई किताबें छपवाने या टैबलेट बांटने से नहीं आएगा। इसके लिए हमें परीक्षा के पुराने पिंजरे को तोड़ना होगा। जब तक हमारी सफलता का पैमाना केवल 'याददाश्त' रहेगी, तब तक 'कौशल विकास' का सपना अधूरा ही रहेगा।
जरूरत इस बात की है कि हम राष्ट्रीय परीक्षाओं के साथ-साथ प्रोजेक्ट्स, पोर्टफोलियो और व्यवहारिक कार्यों को भी उतना ही महत्व दें। तभी हमारे बच्चे सही मायने में हुनरमंद बन पाएंगे और भविष्य की वैश्विक चुनौतियों का सामना कर सकेंगे।

