क्या है शाहजहांपुर का ‘लाट साहब’ जुलूस और इसकी परंपरा, जिसके लिए ढकीं गईं 48 मस्जिद-मजार
Shahjahanpur Lath Sahab procession: होली के मौके पर निकलने वाले ‘लाट साहब’ जुलूस को लेकर प्रशासन ने इस बार व्यापक इंतज़ाम किए हैं। जुलूस मार्ग पर पड़ने वाली 48 मस्जिदों और मजारों को तिरपाल से ढक दिया गया है, 148...
Shahjahanpur Lath Sahab procession: होली के मौके पर निकलने वाले ‘लाट साहब’ जुलूस को लेकर प्रशासन ने इस बार व्यापक इंतज़ाम किए हैं। जुलूस मार्ग पर पड़ने वाली 48 मस्जिदों और मजारों को तिरपाल से ढक दिया गया है, 148 गलियों में अवरोधक लगाए जा रहे हैं और पिछले वर्ष की तुलना में डेढ़ गुना अधिक पुलिस बल तैनात किया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, 200 से अधिक मजिस्ट्रेट स्तर के अफसर ड्यूटी पर रहेंगे।
सुरक्षा व्यवस्था: इस बार क्या अलग?
- 4 अपर पुलिस अधीक्षक, 13 क्षेत्राधिकारी
- 310 दरोगा, 1200 सिपाही, 500 होमगार्ड
- पीएसी की 4 कंपनियां, आरएएफ की 4 कंपनियां
- एनडीआरएफ की टीम तैनात
- 8 किमी के दायरे में निकलने वाले जुलूस पर निगरानी के लिए 100 सीसीटीवी
- 103 मजिस्ट्रेट होलिका दहन स्थलों पर
- पिछले वर्ष कुछ विवादों के मद्देनज़र इस बार एक अतिरिक्त जोन बनाया गया है और एक महीने से शांति समिति की बैठकों का सिलसिला जारी है।
आगामी होली पर्व के दृष्टिगत थाना कोतवाली शाहजहाँपुर में उच्च स्तरीय पीस मीटिंग एवं समीक्षा बैठक सम्पन्न, बड़े लाट साहब के पारंपरिक जुलूस मार्ग का स्थलीय निरीक्षण कर सुरक्षा, यातायात व कानून-व्यवस्था व्यवस्थाओं की गहन समीक्षा के सम्बन्ध मे श्रीमान अपर पुलिस महानिदेशक बरेली जोन,… pic.twitter.com/kNy2xlO2m2
— SHAHJAHANPUR POLICE (@shahjahanpurpol) February 21, 2026
क्या है ‘लाट साहब’ जुलूस?
स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. विकास खुराना के मुताबिक परंपरा की शुरुआत 1728 में नवाब अब्दुल्ला खान की वापसी से जुड़ी मानी जाती है। होली के दिन हिंदू-मुस्लिम समुदाय ने उनके साथ रंग खेला और शहर का चक्कर लगाया यहीं से जुलूस की नींव पड़ी।
1859 में अंग्रेजों के दोबारा कब्जे के बाद जिला प्रशासन इस आयोजन से जुड़ गया। आज़ादी के बाद इसे ‘नवाब साहब का जुलूस’ कहा जाता रहा, लेकिन 1988 में तत्कालीन जिलाधिकारी कपिल देव ने इसका नाम 'लाट साहब का जुलूस' कर दिया।
‘जूतामार होली’ कैसे बनी परंपरा?
समय के साथ जुलूस का स्वरूप बदला। होली के दिन एक व्यक्ति को ‘लाट साहब’ बनाया जाता है, उसे भैंसा गाड़ी पर तख्त पर बैठाकर शहर में घुमाया जाता है। हजारों हुरियारे ‘लाट साहब की जय’ के नारे लगाते हुए प्रतीकात्मक रूप से जूते-चप्पल बरसाते हैं।
जुलूस फूलमती देवी मंदिर से शुरू होकर कोतवाली पहुंचता है, जहां ‘लाट साहब’ सालभर के अपराधों का हिसाब मांगने की प्रतीकात्मक रस्म निभाते हैं, फिर करीब 8 किमी तक शहर में भ्रमण होता है।
प्रशासन ने मस्जिद-मजार क्यों ढकीं?
अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) रजनीश कुमार मिश्रा ने बताया कि एहतितात के तौर पर जुलूस मार्ग पर पड़ने वाली 48 मस्जिदों और मजारों को प्लास्टिक तिरपाल से ढका गया है। इन्हें ढकने का उद्देश्य यह है कि रंग-गुलाल या भीड़ से किसी तरह की क्षति/विवाद न हो। 148 गलियों में अवरोधक लगाकर भीड़ के अचानक उमड़ने की संभावना कम करने की कोशिश की जा रही है।
कानूनी पृष्ठभूमि
1990 में रामनाथ बघेल ने जुलूस रोकने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन अदालत ने इसे पुरानी परंपरा मानते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था। तब से यह आयोजन प्रशासनिक निगरानी में जारी है।
जुलूस शाहजहांपुर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा
‘लाट साहब’ जुलूस शाहजहांपुर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, वहीं ‘जूतामार होली’ के कारण संवेदनशीलता भी जुड़ी रहती है। प्रशासन का दावा है कि इस बार अतिरिक्त सुरक्षा, निगरानी और समुदाय संवाद के जरिए शांति और सौहार्द बनाए रखा जाएगा।

