US Tariff Threat : रूस के तेल पर अमेरिका का दबाव बढ़ा, भारत के लिए क्यों अहम हुई ट्रेड डील
अमेरिकी सीनेट ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ का प्रावधान वाला विधेयक पारित किया; भारत पर अभी टैरिफ लागू नहीं, लेकिन तेल की खरीद प्रभावित हुई तो बढ़ सकता है आयात खर्च
US Tariff Threat : रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की संभावना वाला अमेरिकी विधेयक सीनेट से पारित होने के बाद भारत के सामने एक नई आर्थिक चुनौती खड़ी हो गई है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। ऐसे में यदि अमेरिकी कानून आगे बढ़ता है और रूस से तेल खरीद पर दबाव बढ़ता है तो भारत को दूसरे देशों से तेल खरीदना पड़ सकता है। इससे तेल की लागत बढ़ने पर देश का आयात बिल बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव आ सकता है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस के अनुसार, इस स्थिति में अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर बातचीत भारत के लिए और महत्वपूर्ण हो गई है।
मामला आखिर है क्या ?
अमेरिका रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना चाहता है। इसके पीछे रूस-यूक्रेन युद्ध और रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई का मुद्दा है। अमेरिका का मानना है कि रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देश अप्रत्यक्ष रूप से रूस की अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं।
इसी उद्देश्य से अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को रूस पर नए प्रतिबंधों से संबंधित विधेयक को 86-11 वोट से पारित किया। इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले कुछ देशों के सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की शक्ति देने का प्रावधान है। भारत और चीन उन देशों में शामिल हैं जिन पर इसका असर पड़ सकता है। विधेयक अब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में जाएगा।
क्या भारत पर अभी 100 फीसदी टैरिफ लग गया है?
नहीं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।
सीनेट से विधेयक पारित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर तत्काल 100 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लागू हो गया है। अभी अमेरिकी विधायी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। प्रतिनिधि सभा में विधेयक पर आगे कार्रवाई होनी है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कानून किस अंतिम रूप में आता है और अमेरिकी प्रशासन भारत के खिलाफ इसका इस्तेमाल करता है या नहीं। इसलिए फिलहाल इसे 100 फीसदी टैरिफ का तत्काल बोझ नहीं, बल्कि संभावित टैरिफ का खतरा समझना चाहिए।
रूस का तेल भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई। रूसी तेल कई मौकों पर अन्य स्रोतों की तुलना में छूट पर उपलब्ध रहा। इससे भारतीय रिफाइनरियों के लिए यह खरीद आर्थिक रूप से आकर्षक बनी।
इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जून 2026 में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात करीब 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन रहा और यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 52.4 फीसदी था। यानी उस महीने भारत द्वारा विदेश से खरीदे गए हर दो बैरल कच्चे तेल में लगभग एक बैरल रूस से आया। यही वजह है कि रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव का भारत की ऊर्जा व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
अगर रूस से तेल खरीदना मुश्किल हुआ तो क्या होगा ?
ऐसी स्थिति में भारत को तेल की जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे देशों की ओर देखना होगा। इनमें खाड़ी क्षेत्र के देश और अन्य बड़े तेल उत्पादक शामिल हो सकते हैं। लेकिन तेल खरीदना सिर्फ यह तय करने का मामला नहीं है कि तेल किस देश से आएगा। इसकी कीमत, ढुलाई का खर्च, उपलब्धता और भुगतान की शर्तें भी महत्वपूर्ण होती हैं।
यदि रूस से मिलने वाला अपेक्षाकृत सस्ता तेल कम हो जाता है और उसकी जगह महंगा तेल खरीदना पड़ता है तो भारत को उसी मात्रा में तेल के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ सकता है। यहीं से आयात बिल का सवाल पैदा होता है।
आयात बिल क्या होता है और यह क्यों बढ़ सकता है ?
सरल भाषा में समझें तो भारत विदेश से जितना सामान खरीदता है, उसके लिए जितना पैसा बाहर जाता है, वह देश के आयात खर्च का हिस्सा है। कच्चा तेल भारत के बड़े आयातों में शामिल है। मान लीजिए भारत को पहले एक बैरल तेल 80 डॉलर में मिल रहा था। बाद में उसे किसी दूसरे स्रोत से वही तेल 90 डॉलर में खरीदना पड़ा। तो कीमत में 10 डॉलर का अंतर सीधे आयात खर्च बढ़ाएगा। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत भी बढ़ जाती है और भारत को ज्यादा महंगा तेल खरीदना पड़ता है तो दबाव और बढ़ सकता है।
मदन सबनवीस ने भी इसी संभावित स्थिति की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार, यदि युद्ध बढ़ता है और तेल की आपूर्ति बाधित होती है तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है।
रुपये पर दबाव कैसे आता है ?
यह हिस्सा समझना भी जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का कारोबार मुख्य रूप से डॉलर में होता है। जब भारत को महंगा तेल खरीदना पड़ता है तो उसे ज्यादा डॉलर की जरूरत होती है। अगर देश में डॉलर की मांग बढ़ती है तो रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। आसान शब्दों में कहें तो तेल महंगा होने पर भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं और इससे रुपये की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी विधेयक पारित होते ही रुपया कमजोर हो जाएगा। असर इस बात पर निर्भर करेगा कि रूस से तेल की आपूर्ति कितनी प्रभावित होती है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत क्या रहती है और भारत कितनी जल्दी दूसरे स्रोतों से तेल की व्यवस्था कर पाता है।
अभी तत्काल खतरा कितना है ?
मदन सबनवीस के मुताबिक, फिलहाल तत्काल बड़ी परेशानी नहीं है। उन्होंने कच्चे तेल की कीमत करीब 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास होने का उल्लेख किया है। उनके मुताबिक असली चिंता तब बढ़ेगी जब रूस-यूक्रेन युद्ध फिर तेज हो और तेल की आपूर्ति प्रभावित हो। यानी भारत के लिए सिर्फ अमेरिकी विधेयक ही चिंता का विषय नहीं है। तेल की वैश्विक कीमत और आपूर्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। अगर रूस से तेल की आपूर्ति जारी रहती है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें बहुत ज्यादा नहीं बढ़तीं तो भारत पर तत्काल बड़ा दबाव नहीं पड़ सकता।
चालू खाते के घाटे यानी CAD पर क्या असर ?
मदन सबनवीस ने चालू खाते के घाटे (CAD) पर भी असर की बात कही है। इसे सरल भाषा में ऐसे समझिए—भारत विदेश से जितना कमाता है और जितना खर्च करता है, उसमें अंतर होने पर चालू खाते की स्थिति प्रभावित होती है। तेल आयात पर ज्यादा पैसा बाहर जाने का मतलब है कि देश का विदेशी भुगतान बढ़ रहा है।
यदि कच्चे तेल का आयात महंगा हो जाता है तो यह अंतर बढ़ सकता है। सबनवीस ने कहा कि फिलहाल इसका असर बहुत बड़ा नहीं हो सकता और करीब 0.1 से 0.2 फीसदी जीडीपी के आसपास रह सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (FCNR) जमा कुछ हद तक संतुलन बनाने में मदद कर सकती है। हालांकि, आम पाठक के लिए इसका सीधा मतलब यही है कि भारत के पास कुछ ऐसे विदेशी मुद्रा संसाधन हैं जो बाहरी भुगतान के दबाव को संभालने में मदद कर सकते हैं।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई?
यही इस पूरे मामले का सबसे अहम हिस्सा है।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर पहले से बातचीत चल रही है। टैरिफ इस बातचीत का प्रमुख मुद्दा है। अब रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिकी दबाव भी बढ़ गया है। ऐसे में भारत के लिए अमेरिका के साथ बातचीत से कोई ऐसा रास्ता निकालना महत्वपूर्ण हो गया है जिससे व्यापारिक संबंधों पर अतिरिक्त दबाव कम हो।
मदन सबनवीस ने कहा है कि इस घटनाक्रम के बाद अमेरिका के साथ समझौता करना और भी महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देश किसी समाधान तक पहुंचेंगे।
इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के साथ समझौता करना होगा। भारत के सामने चुनौती यह है कि उसे सस्ती और भरोसेमंद तेल आपूर्ति भी बनाए रखनी है और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को भी संभालना है।
क्या भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा ?
अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
अमेरिकी विधेयक अभी कानून बनने की प्रक्रिया में है। इसके बाद भी यह तय होना बाकी होगा कि भारत के खिलाफ इसका इस्तेमाल किस तरह और कब किया जाता है। दूसरी ओर, भारत के लिए रूस से मिलने वाला तेल महत्वपूर्ण है। इसलिए यदि अमेरिकी दबाव बढ़ता है तो भारत के सामने कई विकल्प होंगे—रूस से खरीद जारी रखने की कोशिश, दूसरे देशों से तेल खरीद बढ़ाना या अलग-अलग स्रोतों के बीच संतुलन बनाना।
कौन-सा रास्ता अपनाया जाएगा, यह आगे की भारत-अमेरिका बातचीत, अमेरिकी कानून के अंतिम स्वरूप, तेल की वैश्विक कीमत और रूस-यूक्रेन युद्ध की स्थिति पर निर्भर करेगा।
आम भारतीय पर इसका क्या असर पड़ सकता है ?
यह सवाल सबसे स्वाभाविक है।
अगर रूस से तेल खरीद में कोई बड़ी बाधा नहीं आती और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें नियंत्रण में रहती हैं तो आम लोगों पर तत्काल कोई बड़ा असर जरूरी नहीं है। लेकिन यदि रूस से आपूर्ति घटती है और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें बढ़ती हैं तो भारत का आयात खर्च बढ़ सकता है। इसके बाद रुपये पर दबाव और अर्थव्यवस्था पर असर की संभावना बढ़ सकती है।
तेल की कीमतों में लंबे समय तक बड़ी वृद्धि होने पर परिवहन और उत्पादन की लागत पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमत कितनी बढ़ती है और भारत दूसरे स्रोतों से कितनी लागत पर तेल हासिल कर पाता है।
अब आगे क्या होगा ?
इस पूरे मामले में आने वाले दिनों में चार चीजें सबसे महत्वपूर्ण रहेंगी।
- पहली : अमेरिकी प्रतिनिधि सभा का रुख। सीनेट के बाद विधेयक की अगली बड़ी परीक्षा प्रतिनिधि सभा में होगी।
- दूसरी :भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता। दोनों देशों के बीच टैरिफ और व्यापार समझौते को लेकर क्या सहमति बनती है, इस पर नजर रहेगी।
- तीसरी : रूस से भारत की तेल खरीद। यदि रूसी तेल की आपूर्ति में बड़ी कमी आती है तो भारत को दूसरे स्रोतों पर निर्भरता बढ़ानी पड़ सकती है।
- चौथी : अंतरराष्ट्रीय तेल कीमत। यदि युद्ध या किसी अन्य कारण से वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो कीमत बढ़ सकती है। इसका सीधा असर भारत के आयात खर्च पर पड़ सकता है।
फिलहाल सबसे जरूरी बात यह है कि अमेरिकी सीनेट के विधेयक से भारत पर 100 फीसदी टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। लेकिन इस विधेयक ने भारत के लिए जोखिम जरूर बढ़ाया है।
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। यदि अमेरिकी दबाव के कारण यह खरीद प्रभावित होती है तो भारत को दूसरे स्रोतों से तेल लेना पड़ सकता है। अगर वहां लागत ज्यादा हुई या वैश्विक तेल कीमत बढ़ी तो देश का आयात बिल बढ़ सकता है। इससे रुपये और चालू खाते पर दबाव आने की आशंका है। इसीलिए मदन सबनवीस के अनुसार भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अब पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है -एजेंसी इनपुट के साथ

