UPSC के 100 साल पूरे : अब AI के दौर में कैसी होगी सिविल सेवा ?
UPSC Centenary Celebrations : ‘मंथन’ में भरोसा, पारदर्शिता और तकनीक पर जोर, AI, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल व्यवस्था से प्रशासन को बेहतर बनाने पर चर्चा
UPSC Centenary Celebrations : देश के लाखों युवाओं के लिए UPSC सिर्फ एक परीक्षा का नाम नहीं है। यह उस रास्ते का नाम है, जिसके जरिए वे देश की प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं। लेकिन UPSC की कहानी केवल परीक्षा, प्रश्नपत्र और परिणाम तक सीमित नहीं है। 1926 में शुरू हुई इसकी यात्रा 100 साल बाद ऐसे मोड़ पर पहुंची है, जहां सवाल अतीत से ज्यादा भविष्य का है। बदलती तकनीक, AI, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल व्यवस्था के बीच आने वाले समय में सिविल सेवा का काम करने का तरीका कितना बदलेगा? इसी सवाल पर नई दिल्ली के भारत मंडपम में शुरू हुए दो दिवसीय शताब्दी समारोह ‘मंथन’ में चर्चा हुई।
UPSC अध्यक्ष अजय कुमार ने आयोग के अगले चरण की दिशा के लिए तीन प्रमुख शब्द सामने रखे, Trust, Transparency और Technology यानी भरोसा, पारदर्शिता और तकनीक। उन्होंने कहा कि बदलती परिस्थितियों के साथ संस्थाओं को खुद को ढालना होगा, लेकिन संवैधानिक सिद्धांतों को कायम रखना भी जरूरी है।
1926 से 1950 तक कैसे बदला UPSC ?
UPSC का सफर 1926 में पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना के साथ शुरू हुआ। वर्ष 1937 में फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन अस्तित्व में आया। संविधान लागू होने के बाद 1950 में आयोग को संवैधानिक संस्था का दर्जा मिला।
100 वर्षों में भर्ती व्यवस्था का स्वरूप भी बदला। सार्वजनिक सेवाओं में चयन को योग्यता, प्रतियोगिता, निष्पक्षता और पारदर्शिता से जोड़ने की व्यवस्था मजबूत हुई। शताब्दी समारोह में UPSC की इस यात्रा को राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका के संदर्भ में भी देखा गया।
UPSC के 100 साल पूरे होने पर ‘मंथन’ क्यों ?
शताब्दी समारोह का नाम ‘मंथन’ रखा गया है। इसका फोकस केवल UPSC की उपलब्धियों पर नहीं, बल्कि भविष्य की प्रशासनिक जरूरतों पर भी है। UPSC अध्यक्ष अजय कुमार ने कहा कि संस्थाओं को समय के साथ बदलना होगा। लेकिन बदलाव का मतलब मूल संवैधानिक मूल्यों से समझौता नहीं है। यही वजह है कि भरोसा, पारदर्शिता और तकनीक को आयोग के अगले चरण की दिशा से जोड़ा गया।
विकसित भारत में अफसर की भूमिका क्या होगी ?
‘मंथन’ के पहले सत्र का विषय था ‘विकसित भारत में सिविल सेवाओं की भूमिका’। UPSC सदस्य सुमन शर्मा के नेतृत्व में हुए सत्र में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि, राज्यसभा सदस्य एवं पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष संजय श्रीनेत शामिल हुए।
सुमन शर्मा ने प्रशासन को परिणाम आधारित बनाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि सरकारी कामकाज की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितना पैसा खर्च हुआ। यह भी देखना होगा कि जमीन पर कितना बदलाव आया। इसका मतलब यह है कि भविष्य में किसी योजना के लागू होने की प्रक्रिया जितनी महत्वपूर्ण होगी, उसका वास्तविक परिणाम भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाएगा।
नियम बताने से आगे समाधान देने की जरूरत
सुमन शर्मा ने ऐसी प्रशासनिक कार्यशैली की जरूरत बताई, जिसमें अधिकारी समस्या आने पर केवल नियम और प्रक्रिया का हवाला देने के बजाय समाधान निकालने की पहल करें। यानी प्रशासन में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि प्रक्रिया पूरी हुई या नहीं। यह भी देखना होगा कि नागरिक की समस्या का समाधान हुआ या नहीं।
तेजी से बदलती दुनिया में कैसा अफसर चाहिए ?
जनरल एनएस राजा सुब्रमणि ने विभागीय दायरों से बाहर निकलने, समझदारी के साथ जोखिम लेने और समय पर निर्णय करने की जरूरत बताई। उन्होंने ऐसे सिविल सेवा तंत्र की जरूरत बताई जो तेजी से बदलती परिस्थितियों में काम कर सके और समस्याओं का समाधान निकाल सके। चर्चा में प्रशासनिक व्यवस्था में चुस्ती, समस्या समाधान और निर्णय लेने की क्षमता को महत्वपूर्ण माना गया।
छोटे शहरों और आकांक्षी जिलों पर क्यों जोर ?
पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला ने सिविल सेवाओं में भर्ती का दायरा व्यापक बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने टियर 2 और टियर 3 शहरों तथा आकांक्षी जिलों से प्रतिभाओं को सिविल सेवा में लाने पर जोर दिया।
उन्होंने युवा उम्मीदवारों की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत भी बताई। चर्चा में अंत्योदय और निष्काम कर्म के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए सार्वजनिक सेवकों की जिम्मेदारी पर जोर दिया गया।
सिर्फ ऊपर से सुधार क्यों काफी नहीं ?
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष संजय श्रीनेत ने प्रशासनिक सुधारों को जमीन पर लागू करने वाली मशीनरी को मजबूत करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक तंत्र का बड़ा हिस्सा ग्रुप ए से नीचे के स्तर पर काम करता है।
इसलिए सुधार केवल शीर्ष स्तर तक सीमित रहने के बजाय उस स्तर तक पहुंचने चाहिए, जहां सरकारी योजनाएं वास्तव में लागू होती हैं। उन्होंने प्रशासन को अधिकार से जवाबदेही की ओर ले जाने और अधिकारियों के वास्तविक अर्थों में ‘सेवक’ के रूप में काम करने की जरूरत बताई।
UPSC कौन कौन सी प्रमुख परीक्षाएं लेता है ?
UPSC का नाम सुनते ही सबसे पहले सिविल सेवा परीक्षा का ख्याल आता है। लेकिन आयोग की जिम्मेदारी इससे कहीं बड़ी है। UPSC प्रशासन, रक्षा, वन, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, आर्थिक और सांख्यिकी समेत कई क्षेत्रों में भर्ती के लिए अलग अलग परीक्षाएं आयोजित करता है।
प्रमुख परीक्षाओं में सिविल सेवा परीक्षा, भारतीय वन सेवा परीक्षा, NDA एवं NA परीक्षा, CDS परीक्षा, इंजीनियरी सेवा परीक्षा, संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल परीक्षा, भारतीय आर्थिक सेवा एवं भारतीय सांख्यिकी सेवा परीक्षा और संयुक्त भू वैज्ञानिक परीक्षा शामिल हैं।
इसके अलावा UPSC विभिन्न विभागीय प्रतियोगी परीक्षाएं भी आयोजित करता है। इनमें CISF सहायक कमांडेंट कार्यकारी सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा तथा अन्य सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षाएं शामिल हैं।
कौन सी परीक्षा किस क्षेत्र के लिए ?
- सिविल सेवा परीक्षा: प्रशासनिक और अन्य केंद्रीय सेवाओं में भर्ती का प्रमुख माध्यम है।
- भारतीय वन सेवा परीक्षा: भारतीय वन सेवा में अधिकारियों के चयन के लिए होती है।
- NDA एवं NA परीक्षा: राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और नौसेना अकादमी के माध्यम से रक्षा सेवाओं में अधिकारी बनने के लिए प्रवेश परीक्षा है।
- CDS परीक्षा: रक्षा सेवाओं में अधिकारी बनने के लिए आयोजित की जाती है।
- इंजीनियरी सेवा परीक्षा: इंजीनियरिंग से जुड़े सरकारी पदों पर भर्ती के लिए होती है।
- संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा: चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े सरकारी पदों पर चयन के लिए आयोजित की जाती है।
- केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल परीक्षा: सहायक कमांडेंट के पदों पर भर्ती के लिए होती है।
- भारतीय आर्थिक सेवा एवं भारतीय सांख्यिकी सेवा परीक्षा: अर्थशास्त्र और सांख्यिकी के क्षेत्र में विशेषज्ञ अधिकारियों के चयन के लिए होती है।
- संयुक्त भू वैज्ञानिक परीक्षा: भू विज्ञान से जुड़े सरकारी पदों पर चयन के लिए होती है।
- यानी UPSC केवल सिविल सेवा परीक्षा लेने वाला आयोग नहीं है। अलग अलग क्षेत्रों के लिए अधिकारियों और विशेषज्ञों के चयन में इसकी भूमिका काफी व्यापक है।
UPSC का काम परीक्षा से कितना बड़ा है ?
बहुत से लोगों के लिए UPSC का मतलब सिविल सेवा परीक्षा है। लेकिन आयोग की भूमिका इससे कहीं व्यापक है। UPSC सरकार को भर्ती नियमों, विभागीय पदोन्नति समितियों के जरिए पदोन्नति, अखिल भारतीय सेवाओं में नियुक्ति और अनुशासनात्मक मामलों में भी सलाह देता है।
वर्ष 2023 24 में आयोग ने पदोन्नति से संबंधित 24,581 अधिकारियों के रिकॉर्ड प्रोसेस किए। इसी अवधि में 532 अधिकारियों को अखिल भारतीय सेवाओं में शामिल किया गया। इससे UPSC की भूमिका का दायरा समझा जा सकता है। आयोग सरकारी सेवाओं में प्रवेश के साथ आगे की प्रशासनिक प्रक्रियाओं में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
UPSC में तकनीक की शुरुआत कब हुई ?
UPSC की तकनीकी यात्रा हाल की नहीं है। आयोग ने 1978 में कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू किया था। इसके बाद तकनीक धीरे धीरे परीक्षा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हिस्सा बनती गई।
अब आयोग डिजिटल व्यवस्था को और मजबूत कर रहा है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और साइबर सुरक्षा पर काम हो रहा है। अधिकारियों को उभरती तकनीकों की ट्रेनिंग दी जा रही है, जिसमें AI भी शामिल है। IT इंफ्रास्ट्रक्चर और साइबर सुरक्षा से जुड़ी जरूरतों के लिए एक हाई लेवल नेटवर्क कमेटी भी गठित की गई है।
AI से क्या बदलेगा ?
‘मंथन’ में AI, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल आर्किटेक्चर की मदद से प्रशासनिक प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने पर चर्चा हुई। इन तकनीकों के जरिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अनावश्यक देरी कम करने और सरकारी सेवाओं की डिलीवरी बेहतर करने की संभावनाओं पर विचार किया गया। इसका अर्थ यह है कि आने वाले समय में तकनीक प्रशासन के काम को तेज करने, जानकारी को बेहतर ढंग से इस्तेमाल करने और सेवाओं तक पहुंच आसान बनाने में मदद कर सकती है।
2026 में परीक्षा व्यवस्था में क्या नया हुआ ?
UPSC ने 2026 में कुछ नए परीक्षा केंद्र भी शुरू किए। सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के लिए भुवनेश्वर, कानपुर और मेरठ में नए केंद्र शुरू किए गए। वहीं NDA एवं NA (II) के लिए अलवर, हिसार और किन्नौर में नए केंद्र शुरू किए गए। आयोग ने प्रोविजनल आंसर की से जुड़े उपाय और QPRep पोर्टल भी शुरू किया है। इसके साथ डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और साइबर सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने पर भी काम किया जा रहा है।
UPSC के सामने भविष्य की चुनौती क्या है ?
UPSC की शताब्दी ऐसे समय में आई है जब प्रशासन तेजी से तकनीक आधारित हो रहा है। AI, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल सिस्टम कामकाज का हिस्सा बन रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ निष्पक्षता, पारदर्शिता, संवैधानिक मूल्यों और जनता के भरोसे को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
‘मंथन’ की चर्चाओं में इसी संतुलन पर जोर दिखाई दिया। भविष्य की सिविल सेवा को तकनीक के साथ आगे बढ़ना होगा, लेकिन उसकी संवैधानिक भूमिका और सार्वजनिक सेवा का मूल उद्देश्य कायम रहना चाहिए।
भविष्य की सिविल सेवा का सवाल
UPSC के 100 साल पूरे हो गए हैं। अब चर्चा उस सिविल सेवा की है जो बदलती जरूरतों के बीच देश की प्रशासनिक व्यवस्था को आगे बढ़ाएगी। ‘मंथन’ में सामने आई तस्वीर में तीन शब्द महत्वपूर्ण रहे, भरोसा, पारदर्शिता और तकनीक। इसके साथ परिणाम आधारित प्रशासन, बेहतर निर्णय, विभागों के बीच तालमेल, छोटे शहरों और आकांक्षी जिलों से प्रतिभाओं की भागीदारी तथा डिजिटल व्यवस्था जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में रहे। भविष्य की प्रशासनिक व्यवस्था में तकनीक की भूमिका बढ़ने के साथ यह भी जरूरी होगा कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों की बुनियाद मजबूत बनी रहे।
100 साल की यात्रा एक नजर में
1926: पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना
1937: फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन का गठन
1950: संविधान के तहत UPSC को संवैधानिक दर्जा मिला
1978: आयोग में कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू हुआ
2023 24: 24,581 अधिकारियों के पदोन्नति संबंधी रिकॉर्ड प्रोसेस किए गए और 532 अधिकारी अखिल भारतीय सेवाओं में शामिल किए गए
2026: सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के लिए भुवनेश्वर, कानपुर और मेरठ में नए केंद्र शुरू हुए
2026: NDA एवं NA (II) के लिए अलवर, हिसार और किन्नौर में नए केंद्र शुरू हुए
2026: 100 वर्ष पूरे होने पर ‘मंथन’ में भविष्य की सिविल सेवा और प्रशासनिक सुधारों पर चर्चा हुई

