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Turmeric Panjab University Search : हल्दी में ऐसा क्या है, जिसे शरीर तक पहुंचाना मुश्किल ? पीयू ने खोजी नई तकनीक

करक्यूमिन को शरीर तक बेहतर तरीके से पहुंचाने की तकनीक को अमेरिकी पेटेंट, प्रयोगों में सामान्य पाउडर के मुकाबले 900 गुना से ज्यादा बेहतर जैवउपलब्धता

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Turmeric Panjab University Search : हल्दी हमारे घरों में रोज इस्तेमाल होने वाला मसाला है। इसमें करक्यूमिन नाम का एक प्राकृतिक सक्रिय तत्व पाया जाता है। वैज्ञानिक लंबे समय से इसके गुणों पर शोध कर रहे हैं। लेकिन करक्यूमिन की एक बड़ी समस्या है। यह पानी में आसानी से नहीं घुलता और शरीर में इसकी बहुत कम मात्रा उपलब्ध हो पाती है। पंजाब यूनिवर्सिटी की प्रो. इंदु पाल कौर और उनकी टीम ने इसी समस्या को दूर करने की तकनीक विकसित की है। इसे अमेरिका में पेटेंट मिल गया है।

करक्यूमिन क्या है ?

करक्यूमिन हल्दी में पाया जाने वाला प्राकृतिक सक्रिय तत्व है। यह हल्दी के पीले रंग का प्रमुख कारण है। इसके एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गुणों को लेकर कई वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं।

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लेकिन करक्यूमिन में उपयोगी गुण होना ही पर्याप्त नहीं है। वह शरीर में कितनी मात्रा में पहुंचता है, यह भी महत्वपूर्ण है। करक्यूमिन के मामले में यही बड़ी चुनौती है।

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शरीर में कम क्यों पहुंचता है करक्यूमिन ?

सामान्य करक्यूमिन पाउडर पानी में अच्छी तरह नहीं घुलता। इसके अलावा कुछ परिस्थितियों में यह जल्दी टूट भी सकता है। इसलिए इसे लेने के बाद इसकी बहुत कम मात्रा शरीर के लिए उपलब्ध हो पाती है।

यही समस्या दूर करने के लिए पीयू की टीम ने नई तकनीक विकसित की है।

PU ने क्या नया किया ?

शोधकर्ताओं ने करक्यूमिन को बेहद छोटे कणों में बदलकर एक विशेष वसा आधारित पदार्थ के भीतर रखने की तकनीक विकसित की है। इन छोटे कणों को नैनोपार्टिकल कहा जाता है।

इसे आसान भाषा में ऐसे समझें। करक्यूमिन को अकेले शरीर तक पहुंचाने के बजाय उसे बहुत छोटे कणों के भीतर सुरक्षित किया जाता है। इससे वह पानी में आसानी से फैल सकता है और उसे टूटने से बचाने में भी मदद मिलती है।

इस तकनीक को प्रस्तावित तौर पर ‘CurcuAukhadh’ यानी ‘कर्क्यूऑषध’ नाम दिया गया है। यह नाम ‘curcumin’ और ‘aushadhi’ शब्दों को मिलाकर बनाया गया है।

900 गुना ज्यादा का मतलब क्या है ?

यह इस तकनीक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। पीयू की टीम ने करक्यूमिन का 20 मिलीलीटर का एक ओरल शॉट तैयार किया। प्रयोगों में इसकी तुलना सामान्य करक्यूमिन पाउडर से की गई। इन प्रयोगात्मक अध्ययनों में तैयार किए गए करक्यूमिन की रिलेटिव बायोअवेलेबिलिटी 900 गुना से अधिक पाई गई।

अब सवाल है कि बायोअवेलेबिलिटी क्या होती है ?

इसका आसान मतलब है कि किसी पदार्थ को लेने के बाद उसकी कितनी मात्रा शरीर के लिए उपलब्ध हो पाती है  इसलिए 900 गुना का मतलब यह नहीं है कि शॉट में 900 गुना ज्यादा करक्यूमिन था। इसका मतलब है कि प्रयोग की परिस्थितियों में इस तकनीक से तैयार करक्यूमिन शरीर के लिए सामान्य पाउडर की तुलना में कहीं ज्यादा उपलब्ध हुआ। यह परिणाम प्रयोगात्मक अध्ययनों में सामने आया है। इसे मनुष्यों में किसी बीमारी के इलाज का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

सैशे में भी तैयार किया गया

पीयू की टीम ने एक दूसरी तकनीक भी विकसित की है। इसमें करक्यूमिन की अधिक मात्रा को इन छोटे कणों में रखा जा सकता है। इसके आधार पर पानी में मिलाने वाले सैशे तैयार किए गए हैं। प्रयोगों में इन सैशे को पानी में मिलाने के बाद करक्यूमिन की रिलेटिव बायोअवेलेबिलिटी में 890 गुना वृद्धि दर्ज की गई।

करक्यूमिन को खराब होने से भी बचाती है तकनीक

यह तकनीक केवल करक्यूमिन को शरीर तक पहुंचाने के लिए नहीं है। छोटे कण करक्यूमिन को रोशनी और पीएच में बदलाव के कारण खराब होने से बचाने में भी मदद करते हैं।

पीयू के अनुसार, पेटेंट वाली तकनीक में करक्यूमिन को नौ दिन तक धीरे-धीरे उपलब्ध कराने की क्षमता भी बताई गई है।  इसे पाउडर के रूप में भी तैयार किया जा सकता है। इससे भविष्य में इसे अलग-अलग उत्पादों में इस्तेमाल करना आसान हो सकता है।

पानी, दूध या जूस में मिलाया जा सकता है

प्रस्तावित ‘कर्क्यूऑषध’ को इस्तेमाल में आसान बनाने की कोशिश की गई है। इसे ओरल शॉट और पानी में मिलाने वाले सैशे के रूप में तैयार किया गया है।

परियोजना सामग्री के अनुसार, सैशे को पानी, दूध, जूस या किसी दूसरे पेय में मिलाया जा सकता है। इसके स्वाद को भी बेहतर बनाने के लिए काम किया गया है।

क्या इससे बीमारियों का इलाज होगा ?

अभी ऐसा कहना सही नहीं होगा।

शोध टीम ने पशुओं पर दर्द, सूजन, गठिया, संक्रमण, घाव भरने, मुंह के स्वास्थ्य, याददाश्त और कई दूसरे क्षेत्रों में प्रयोग किए हैं। इन प्रयोगों से आगे के शोध की संभावनाएं सामने आती हैं।

लेकिन इन परिणामों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि यह तकनीक मनुष्यों में इन बीमारियों का इलाज करती है या उनसे बचाती है। इसके लिए मनुष्यों पर जरूरी परीक्षण और अन्य नियामकीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी।

अब आगे क्या होगा ?

अमेरिका के अलावा इस आविष्कार को भारत में भी पेटेंट मिल चुका है। यूरोप और कनाडा में इसके आवेदन अभी जांच के दौर में हैं। अब पीयू की टीम इस तकनीक को प्रयोगशाला से बाहर व्यावसायिक स्तर तक ले जाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए लाइसेंसिंग, बड़े स्तर पर उत्पादन और संभावित साझेदारों तथा निवेशकों से बातचीत की जाएगी।

प्रो. इंदु पाल कौर के अनुसार, इस तकनीक पर करीब दो दशक से काम किया जा रहा है। उनका उद्देश्य हल्दी से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ना है।

प्रो. इंदु पाल कौर के नाम 25 पेटेंट

प्रो. इंदु पाल कौर अब तक 25 पेटेंट हासिल कर चुकी हैं। इनमें तीन अमेरिकी पेटेंट शामिल हैं। इसके अलावा 22 पेटेंट आवेदन दाखिल किए गए हैं। पीयू की कुलपति प्रो. मीनाक्षी गोयल ने प्रो. इंदु पाल कौर और उनकी टीम को इस उपलब्धि पर बधाई दी।

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