IAF की 75 साल की जगुआर स्क्वाड्रन ‘बुल्स’ की कहानी, 1965 के हवाई मुकाबले से कारगिल तक
भारतीय वायुसेना की पहली जगुआर स्क्वाड्रन के 75 साल : स्पिटफायर से जगुआर तक का सफर; दो भारत-पाक युद्धों और ऑपरेशन सफेद सागर में निभाई अहम भूमिका
IAF No 14 Squadron Platinum Jubilee : भारतीय वायुसेना की पहली जगुआर स्क्वाड्रन नंबर 14 ने 75 साल पूरे होने पर प्लेटिनम जुबली मनाई। ‘बुल्स’ के नाम से पहचानी जाने वाली इस इकाई ने 1951 में स्पिटफायर विमानों के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी। इसके बाद वैम्पायर और हंटर से होते हुए यह जगुआर विमानों तक पहुंची। इस दौरान स्क्वाड्रन ने 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों सहित कई सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया। 1999 के कारगिल संघर्ष में भी इसके जगुआर विमानों ने फोटो टोही और बमबारी मिशन किए।
पश्चिमी वायु कमान की ओर से रविवार को साझा जानकारी के अनुसार, समारोह में स्क्वाड्रन की विरासत और शहीदों के बलिदान को याद किया गया। इस दौरान उड़ान संचालन और युद्धक उपकरणों का प्रदर्शन किया गया। एयर मार्शल जॉर्ज थॉमस, एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, पश्चिमी वायु कमान, पूर्व वायुसेना प्रमुखों, वीरता पुरस्कार विजेताओं, वरिष्ठ अधिकारियों और पूर्व वायु योद्धाओं ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस अवसर पर स्क्वाड्रन पर विशेष प्रथम-दिवस आवरण भी जारी किया गया।
1951 में स्पिटफायर से शुरू हुआ सफर
नंबर 14 स्क्वाड्रन का गठन 1951 में हुआ था। इसके पहले कमांडिंग ऑफिसर स्क्वाड्रन लीडर लेस्ली रिचर्ड डिकिन्सन ब्लंट थे। शुरुआत में इसे सुपरमरीन स्पिटफायर विमान मिले। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चर्चित रहे ये विमान उस दौर के प्रमुख लड़ाकू विमानों में शामिल थे।
अक्टूबर 1957 से अगस्त 1959 तक स्क्वाड्रन ने डी हैविलैंड वैम्पायर विमानों का संचालन किया। इसके बाद इसे हॉकर हंटर विमानों से लैस किया गया। स्क्वाड्रन ने करीब 20 वर्षों तक हंटर विमानों के साथ उड़ान भरी। इसी विमान के साथ इसने 1965 और 1971 के युद्धों में हिस्सा लिया।
चार पीढ़ियों के लड़ाकू विमानों का संचालन करने वाली इस इकाई का इतिहास भारतीय वायुसेना के विमान बेड़े में आए बदलावों और बदलती परिचालन जरूरतों से भी जुड़ा है।
1965 में छह पाकिस्तानी सेबर विमानों से भिड़े दो पायलट
सितंबर 1965 में पूर्वी क्षेत्र में तैनात स्क्वाड्रन के दो पायलटों का छह पाकिस्तानी सेबर लड़ाकू विमानों से सामना हुआ। यह हवाई संघर्ष स्क्वाड्रन के इतिहास की प्रमुख घटनाओं में शामिल है।
फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड कुक ने तीन सेबर विमानों का मुकाबला किया, जबकि उनके विंगमैन फ्लाइंग ऑफिसर एससी ममगैन ने अन्य तीन विमानों को चुनौती दी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, दोनों पायलटों ने कालाइकुंडा के ऊपर दुश्मन के विमानों की संरचना को बिखेर दिया।
इस घटना का एक दिलचस्प पहलू यह था कि पाकिस्तानी सेबर विमान जिस स्क्वाड्रन के थे, उसका नंबर भी 14 था। वह तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में तैनात थी।
वीर चक्र विजेता कुक का स्क्वाड्रन से जुड़ाव
फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड कुक को वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। 2015 में इस हवाई संघर्ष की 50वीं वर्षगांठ पर उन्होंने अंबाला में अपना पदक स्क्वाड्रन को सौंप दिया था, ताकि इसे उसकी विरासत के हिस्से के रूप में सुरक्षित रखा जा सके।
कुक अपनी पूर्व स्क्वाड्रन की प्लेटिनम जुबली में शामिल होने के लिए ऑस्ट्रेलिया से भारत आए थे। हालांकि, समारोह से एक दिन पहले दिल्ली में 87 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनकी मृत्यु चिकित्सकीय कारणों से हुई।
1971 के युद्ध में जेसोर से भी भरे उड़ान
1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान स्क्वाड्रन की कमान विंग कमांडर रामनाथन सुंदरासन के पास थी। पूर्वी मोर्चे पर इसने भारतीय जमीनी सैनिकों को हवाई सहायता देने के साथ पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर हमले किए।
इन अभियानों में पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों, बुनियादी ढांचे, संचार लाइनों और सैनिकों की तैनाती वाले क्षेत्रों को निशाना बनाया गया। स्क्वाड्रन ने कुछ समय के लिए कब्जे में लिए गए पाकिस्तानी एयरबेस जेसोर से भी स्ट्राइक मिशन किए।
इस तरह स्क्वाड्रन ने हवाई हमलों के साथ जमीनी मोर्चे पर भारतीय सैनिकों की सहायता करने में भी भूमिका निभाई।
1979 में अंबाला पहुंची, बनी पहली जगुआर स्क्वाड्रन
अगस्त 1979 में ‘बुल्स’ पूर्वी भारत के कालाइकुंडा से अंबाला स्थानांतरित हुई। यहां इसे सेपेकैट जगुआर विमानों से लैस किया गया। इसके साथ ही यह भारतीय वायुसेना की पहली जगुआर स्क्वाड्रन बनी।
जगुआर विमान गहरे हवाई हमलों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य दुश्मन के क्षेत्र में अंदर तक जाकर निर्धारित सैन्य लक्ष्यों पर हमला करना है।
स्क्वाड्रन पिछले 47 वर्षों से जगुआर विमानों का संचालन कर रही है। इस अवधि में विमानों में कई तकनीकी उन्नयन किए गए हैं। इन बदलावों का उद्देश्य बदलती परिचालन जरूरतों के अनुरूप विमान की क्षमताओं को बनाए रखना है।
कारगिल में ऑपरेशन सफेद सागर का हिस्सा
1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान नंबर 14 स्क्वाड्रन को ऑपरेशन सफेद सागर के तहत तैनात किया गया था। दूसरी जगुआर इकाई नंबर 27 स्क्वाड्रन ‘फ्लेमिंग एरोज’ भी इस अभियान में शामिल थी।
‘बुल्स’ ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) के आसपास फोटो टोही और बमबारी मिशनों में हिस्सा लिया। फोटो टोही के जरिए हवाई तस्वीरों से दुश्मन की तैनाती और गतिविधियों की जानकारी जुटाई जाती है। बमबारी मिशनों में निर्धारित सैन्य लक्ष्यों पर हमले किए जाते हैं।
कारगिल अभियान स्क्वाड्रन के लंबे परिचालन इतिहास का एक और महत्वपूर्ण अध्याय रहा।
वायुसेना के दो पूर्व प्रमुख भी संभाल चुके हैं कमान
नंबर 14 स्क्वाड्रन की कमान संभालने वाले अधिकारियों में ऐसे नाम भी शामिल हैं, जो आगे चलकर भारतीय वायुसेना के शीर्ष पद तक पहुंचे।
विंग कमांडर डेनिस ए. लाफोंटेन ने स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया और बाद में वायुसेना प्रमुख बने। पूर्व वायुसेना प्रमुख शशिंद्र पाल त्यागी ने दिसंबर 1982 से अक्टूबर 1985 तक इसकी कमान संभाली थी।
75 साल की विरासत को किया याद
प्लेटिनम जुबली समारोह पश्चिमी वायु कमान के अधीन एक अग्रिम वायुसेना अड्डे पर आयोजित किया गया। इसमें वर्तमान और पूर्व वायु योद्धाओं ने हिस्सा लिया। स्क्वाड्रन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई और उड़ान संचालन तथा युद्धक उपकरणों का प्रदर्शन किया गया।
इस अवसर पर जारी विशेष प्रथम-दिवस आवरण ने भी स्क्वाड्रन के इतिहास को यादगार बनाने का काम किया। स्पिटफायर से शुरू होकर हंटर और जगुआर तक पहुंची नंबर 14 स्क्वाड्रन की यात्रा भारतीय वायुसेना के बदलते विमान बेड़े और युद्धक भूमिकाओं की कहानी भी है। 1965 और 1971 के युद्धों से लेकर कारगिल अभियान तक, ‘बुल्स’ ने विभिन्न सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया। प्लेटिनम जुबली समारोह इसी लंबे सफर, उसके वायु योद्धाओं और उनके बलिदान को समर्पित रहा।

