सिर्फ सेना तक सीमित नहीं रहेगा सैनिक स्कूलों का दायरा ! जानिये क्या अब भविष्य के युद्ध के लिए तैयार किए जाएंगे साइबर वीर ?
देश के 33 सैनिक स्कूलों, राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूलों और आरआईएमसी के छात्रों को भविष्य की युद्ध तकनीक और नवाचार के लिए भी तैयार किया जाएगा। रक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में पाठ्यक्रम में बड़े बदलावों और पर्याप्त बजट आवंटन की वकालत की है।
Sainik Schools Expansion : देश के सैनिक स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों का भविष्य अब केवल सशस्त्र बलों (थल सेना, नौसेना और वायु सेना) तक सीमित नहीं रहेगा। संसद की रक्षा मामलों से जुड़ी स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Defence) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में एक अहम सिफारिश की है।
समिति का कहना है कि इन छात्रों को राष्ट्रीय रक्षा से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे रक्षा अनुसंधान, नवाचार, डिजाइन और चिकित्सा में भी करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
आधुनिक युद्धकला और तकनीक पर फोकस की जरूरत
समिति का मानना है कि अब समय आ गया है जब सैनिक स्कूल, राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल (RMS) और राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कॉलेज (RIMC) के छात्रों को शुरुआती दौर से ही भविष्य की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया जाए। रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा मंत्रालय को इन संस्थानों के जरिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि छात्रों में बचपन से ही एक बड़े उद्देश्य की भावना पैदा की जा सके।
इसके लिए स्कूलों के पाठ्यक्रम में आधुनिक तकनीक और युद्धकला को शामिल करने की तत्काल आवश्यकता है। समिति की इच्छा है कि छात्रों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence - AI), साइबर और अंतरिक्ष युद्ध के कॉन्सेप्ट, ड्रोन जैसे ऑटोनॉमस सिस्टम (Autonomous Systems), डायरेक्टेड एनर्जी, क्वांटम तकनीक और ऊर्जा की भू-राजनीति (Geopolitics of Energy) जैसे विषय विस्तार से पढ़ाए जाएं। इससे छात्र नवीनतम तकनीक से अपडेट रहेंगे और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार एक जिम्मेदार नागरिक व लीडर बन सकेंगे।
क्या है सैनिक स्कूलों का मौजूदा ढांचा और इतिहास?
रक्षा मंत्रालय के समग्र पर्यवेक्षण के अधीन काम करने वाले इन संस्थानों की स्थापना मूल रूप से राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और भारतीय नौसेना अकादमी (Naval Academy) के लिए 'फीडर संस्थान' (छात्रों को तैयार करने वाले संस्थान) के रूप में की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य सशस्त्र बलों के अधिकारी कैडर में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना था।
वर्तमान में देश भर में 33 सैनिक स्कूल हैं, जिन्हें 1961 से केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त उपक्रम के रूप में चलाया जा रहा है। वहीं, 1922 में अंग्रेजों द्वारा स्थापित RIMC और पांच अन्य RMS (जिनमें से पहला 1925 में स्थापित हुआ था) पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा संचालित हैं।
इनके अलावा, सरकार ने गैर सरकारी संगठनों (NGOs), निजी स्कूलों और राज्य सरकारों की साझेदारी में 100 नए सैनिक स्कूल खोलने की योजना भी शुरू की है। इनमें से 86 नए स्कूलों को मंजूरी भी मिल चुकी है।
बजट और बुनियादी ढांचे को लेकर समिति की चिंताएं
समिति ने अपनी रिपोर्ट में सैनिक स्कूलों के सामने आ रही वित्तीय और ढांचागत चुनौतियों का भी विस्तार से जिक्र किया है। रक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधि ने समिति को बताया कि जहां RIMC और RMS बिना किसी बड़ी चुनौती के सुचारू रूप से चल रहे हैं, वहीं सैनिक स्कूलों को कई व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इनमें राज्य सरकारों से मिलने वाले बजटीय समर्थन की कमी, इंफ्रास्ट्रक्चर का रखरखाव और कर्मचारियों के लाभ (Staff Benefits) से जुड़े मुद्दे प्रमुख हैं।
वित्त मंत्रालय से पर्याप्त फंड जुटाने की अपील
सैनिक स्कूलों की इस स्थिति को देखते हुए, संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि रक्षा मंत्रालय को वित्त मंत्रालय पर पर्याप्त बजटीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। समिति ने जोर दिया है कि सभी 33 पुराने सैनिक स्कूलों का समयबद्ध आधुनिकीकरण सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे के विकास हेतु पर्याप्त धन आवंटित किया जाए।
साथ ही, समिति का कहना है कि पुराने और नए स्कूलों को ग्रांट-इन-एड (अनुदान), स्कॉलरशिप (छात्रवृत्ति), प्रोत्साहन राशि, विशेष अनुदान, वार्षिक फीस सहायता और ट्रेनिंग ग्रांट के लिए आवश्यकतानुसार पर्याप्त फंड निर्बाध रूप से दिया जाना चाहिए।

