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850 Lok Sabha Seats : 850 सांसदों वाली लोकसभा और महिला आरक्षण का 'मास्टरप्लान': क्या आपके राज्य का दबदबा कम हो जाएगा? जानिए 131वें संशोधन का ए-टू-जेड विश्लेषण

850 Lok Sabha Seats : भारतीय संसदीय लोकतंत्र एक ऐसे मुकाम पर खड़ा है जहां आने वाले समय में देश की राजनीति का नक्शा पूरी तरह बदलने वाला है। 16 अप्रैल, 2026 को केंद्र सरकार ने लोकसभा में तीन महत्वपूर्ण...

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850 Lok Sabha Seats : भारतीय संसदीय लोकतंत्र एक ऐसे मुकाम पर खड़ा है जहां आने वाले समय में देश की राजनीति का नक्शा पूरी तरह बदलने वाला है। 16 अप्रैल, 2026 को केंद्र सरकार ने लोकसभा में तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए, जिन्होंने सियासी गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सरकार द्वारा पेश किए गए विधेयकों में संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक-2026, परिसीमन विधेयक-2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक-2026 शामिल हैं।

इन विधेयकों को लेकर सबसे बड़ी चर्चा लोकसभा सीटों को 550 से बढ़ाकर 850 करने और महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की 'टाइमिंग' को लेकर हो रही है। विपक्ष और कई क्षेत्रीय दलों की आशंकाओं को दूर करने के लिए सरकार ने एक विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया है। आइए, इस एक्सप्लेनर में उन सभी प्रमुख बिंदुओं को विस्तार से समझते हैं जो आपकी सीट, आपके राज्य और देश की संसद के भविष्य से जुड़े हैं।

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1. आखिर क्यों पड़ी इन विधेयकों की जरूरत?

नारी शक्ति वंदन अधिनियम का उद्देश्य महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत भागीदारी देना है। मूल कानून में यह प्रावधान था कि यह आरक्षण अगली जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होगा। सरकार का तर्क है कि यदि वे पुरानी व्यवस्था पर टिके रहते, तो जनगणना और लंबी चलने वाली परिसीमन प्रक्रिया के कारण 2029 के आम चुनाव में भी महिलाओं को आरक्षण नहीं मिल पाता। इसी देरी को खत्म करने के लिए सरकार ने महिला आरक्षण को जनगणना की कड़ी शर्त से डिलिंक (अलग) करने का फैसला लिया है।

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2. 2029 के चुनावों में महिला आरक्षण का रास्ता साफ

सरकार द्वारा लाए गए 131वें संविधान संशोधन का सबसे बड़ा और तत्काल लाभ यह होगा कि अब महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलने के लिए दशक भर का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इस संशोधन के पारित होने के बाद 2029 के लोकसभा चुनाव में ही सदन की एक-तिहाई सीटों पर महिलाएं चुनकर आ सकेंगी। सरकार का मानना है कि देश की आधी आबादी को उनके राजनीतिक अधिकार देने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य था।

3. लोकसभा सीटें 550 से बढ़ाकर 850 क्यों?

भारत में लोकसभा सीटों की अधिकतम सीमा वर्तमान में 550 है, जिसे 1976 में तय किया गया था। उस समय यानी 1971 की जनगणना के अनुसार भारत की आबादी लगभग 54 करोड़ थी। आज हम 140 करोड़ के पार पहुंच चुके हैं। सरकार का कहना है कि आज एक सांसद पर प्रतिनिधित्व का बोझ बहुत अधिक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की आवाज को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए सीटों की संख्या बढ़ाना जरूरी है। इसीलिए सीटों की ऊपरी सीमा को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव दिया गया है।

4. क्या है 'प्रोपोर्शनल एक्सपेंशन' का नया फार्मूला?

सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार ने आनुपातिक विस्तार दृष्टिकोण (प्रोपोर्शनल एक्सपेंशन अप्रोच) अपनाने का निर्णय लिया है। इसके तहत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मौजूदा सीटों में एक समान 50 प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी।

वर्तमान में 543 निर्वाचित सीटें हैं।

50 प्रतिशत की वृद्धि करने पर यह संख्या 815 के करीब पहुंचती है।

भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए इसकी ऊपरी सीमा 850 तय की गई है।

5. दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता और सच्चाई

क्षेत्रीय दलों का सबसे बड़ा डर यह है कि उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारतीय राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है, इसलिए परिसीमन के बाद उनकी सीटें कम हो सकती हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि चूंकि सभी राज्यों में 50 प्रतिशत की समान वृद्धि हो रही है, इसलिए किसी भी राज्य का मौजूदा प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा।

आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में लोकसभा में दक्षिण भारतीय राज्यों की हिस्सेदारी 23.76 प्रतिशत है। नए प्रस्तावों के बाद यह हिस्सेदारी मामूली रूप से बढ़कर 23.87 प्रतिशत हो जाएगी। यानी तमिलनाडु, केरल या कर्नाटक जैसे राज्यों को कोई राजनीतिक नुकसान नहीं होगा, बल्कि उनका अनुपात थोड़ा बेहतर ही होगा।

6. परिसीमन आयोग और राज्यों के चुनाव पर असर

विपक्ष ने सवाल उठाया कि क्या परिसीमन आयोग अधिनियम में कोई राजनीतिक बदलाव किया गया है? सरकार ने साफ किया है कि आयोग की कार्यप्रणाली और कानूनी ढांचे में कोई फेरबदल नहीं किया गया है। आयोग स्वतंत्र रूप से काम करेगा और उसकी सिफारिशों को संसद की मंजूरी और राष्ट्रपति की सहमति के बाद ही लागू किया जाएगा। इसके अलावा, तमिलनाडु या पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में वर्तमान में चल रहे या भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनावों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। 2029 तक की चुनावी प्रक्रियाएं वर्तमान नियमों के तहत ही चलेंगी।

7. अनुसूचित जाति और जनजाति का प्रतिनिधित्व

सीटों की संख्या बढ़ने से अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के प्रतिनिधित्व पर बहुत सकारात्मक असर पड़ेगा। परिसीमन की प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि इन वर्गों के लिए सीटों का आरक्षण आबादी के अनुपात में हो। जब लोकसभा 815 या उससे अधिक सीटों की होगी, तो इन वर्गों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी आनुपातिक रूप से काफी बढ़ जाएगी, जिससे सदन में उनकी आवाज और अधिक मजबूत होगी।

8. जाति जनगणना पर सरकार का रुख

एक आशंका यह भी जताई गई कि क्या यह संशोधन जाति जनगणना को टालने के लिए लाया गया है? सरकार ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि जाति जनगणना के लिए एक समयबद्ध कार्यक्रम पहले ही शुरू किया जा चुका है। जाति आधारित डेटा एकत्र करने की प्रक्रिया को जनसंख्या गणना के चरण के साथ ही पूरा किया जाएगा।

9. मुस्लिम महिला कोटा और धार्मिक आरक्षण

सदन में चर्चा के दौरान कुछ दलों ने मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग कोटे की मांग की। इस पर सरकार ने संवैधानिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत का संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता। आरक्षण की नीतियां केवल सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर ही तय की जा सकती हैं। संविधान के मूल ढांचे के तहत किसी विशेष धर्म के लिए राजनीतिक आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।

10. 2024 के चुनावों में क्यों नहीं लागू हुआ आरक्षण?

अक्सर पूछा जाता है कि यदि 2023 में कानून बन गया था, तो 2024 में इसे लागू क्यों नहीं किया गया? सरकार का स्पष्टीकरण है कि आरक्षण लागू करने के लिए सीटों का परिसीमन (सीमा निर्धारण) अनिवार्य प्रक्रिया है। परिसीमन एक विस्तृत और परामर्श वाली प्रक्रिया है जिसमें भौगोलिक सीमाओं को तय करने में कम से कम दो साल का समय लगता है। इसी समय सीमा और कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए अब ये विधेयक लाए गए हैं ताकि 2029 तक सब कुछ सुचारू रूप से लागू हो सके।

11. 2023 के बिल का महत्व

महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को 2023 में इसलिए पेश किया गया था ताकि आरक्षण के लिए एक मजबूत कानूनी और संवैधानिक ढांचा तैयार किया जा सके। उस समय सदन में इसे मिले व्यापक समर्थन ने यह सिद्ध कर दिया था कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के पक्ष में हैं। अब 2026 के ये विधेयक उसी कानून को जमीन पर उतारने का अगला कदम हैं।

 

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