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Explainer : किसी को झूठे केस में फंसाना अब पड़ेगा महंगा! फर्जी गवाही और FIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकारों को नोटिस जारी ; जानिए क्या है पूरा मामला

एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका के बाद कोर्ट ने केंद्र और राज्यों सरकारों को जारी किया नोटिस

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सुप्रीम कोर्ट।
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Perjury Crackdown : देश की अदालतों में लंबित मुकदमों के पीछे अक्सर आपसी रंजिश और 'झूठ' का बड़ा हाथ होता है। किसी निर्दोष को फंसाने और अदालत में फर्जी हलफनामा देने का खेल अब भारी पड़ने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की उस याचिका पर केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है, जो झूठे मुकदमे दर्ज कराने वालों पर नकेल कसने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्याय की शुचिता बनाए रखने के लिए झूठी गवाही (Perjury) पर लगाम कसना अब अनिवार्य हो गया है।

जानिए क्या है 'परजुरी' (Perjury), जिस पर कोर्ट हुआ सख्त?

कानूनी शब्दावली में 'परजुरी' का अर्थ है  कि अदालत में शपथ लेकर जानबूझकर झूठ बोलना। हमारी न्याय प्रणाली 'सत्यमेव जयते' के आदर्श पर टिकी है, जहां गवाह कटघरे में खड़े होकर सच बोलने की शपथ लेता है। न्यायाधीश इन्हीं गवाहों और पेश किए गए सबूतों के आधार पर किसी की स्वतंत्रता या सजा का फैसला सुनाते हैं।

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यदि गवाही ही झूठ की बुनियाद पर टिकी हो, तो न्याय की हत्या होना निश्चित है। याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत 'परजुरी' के खिलाफ कार्रवाई की दर 1% से भी कम है। सजा का खौफ न होने के कारण लोग निजी दुश्मनी निकालने के लिए अदालतों को गुमराह करते हैं। BNS की धारा 229 से 233 के तहत इसमें 7 साल तक की जेल का प्रावधान है, जिसे कड़ाई से लागू करने की मांग अब जोर पकड़ रही है।

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झकझोर देने वाली केस हिस्ट्री

याचिका में उन दर्दनाक और शर्मनाक उदाहरणों का विस्तार से उल्लेख किया गया है, जहाँ कानून के दुरुपयोग और झूठी गवाही ने बेगुनाहों की दुनिया उजाड़ दी।

  • विष्णु तिवारी का 'न्यायिक निर्वासन' (ललितपुर) : संपत्ति के एक विवाद ने विष्णु तिवारी के जीवन के सबसे कीमती 20 साल छीन लिए। एक महिला द्वारा लगाए गए बलात्कार और SC/ST एक्ट के झूठे आरोप में उन्हें उम्रकैद हुई। जब 2021 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें यह कहते हुए बरी किया कि 'एफआईआर केवल रंजिश के कारण थी', तब तक विष्णु सब कुछ खो चुके थे। जेल से बाहर आने पर उन्हें पता चला कि उनके माता-पिता और भाई की मृत्यु हो चुकी है। यह मामला साबित करता है कि झूठी गवाही किसी की हत्या करने से भी बड़ा अपराध है।
  • रईस बनाम उत्तर प्रदेश सरकार : पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के संगीन आरोप में रईस ने 23 साल जेल की सलाखों के पीछे बिताए। फरवरी 2026 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें निर्दोष पाया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाह को 'ट्यूटर' किया गया था, यानी उसे झूठ बोलना सिखाया गया था। 23 साल बाद जब रईस बाहर आए, तो न्याय की जीत तो हुई, पर उनकी बर्बाद जवानी का हिसाब कौन देगा?
  • दहेज कानून (498A) का दुरुपयोग : सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं कई फैसलों में माना है कि दहेज विरोधी कानूनों का इस्तेमाल अब 'कानूनी आतंकवाद' की तरह हो रहा है। रंजिश निकालने के लिए पूरे परिवार, यहाँ तक कि दूर के रिश्तेदारों तक के नाम एफआईआर में लिखवा दिए जाते हैं, जिनका घटना से कोई सीधा संबंध नहीं होता।

जानिए क्या हैं याचिका की 5 बड़ी मांगें, जो बदल देंगी सिस्टम

अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में केवल सजा बढ़ाने की बात नहीं की है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर 5 क्रांतिकारी सुधारों का सुझाव दिया है :

  1. थानों के बाहर 'चेतावनी बोर्ड' की अनिवार्यता : याचिका में मांग की गई है कि हर पुलिस स्टेशन और अदालत के बाहर बड़े 'डिस्प्ले बोर्ड' लगाए जाएं। इन पर स्पष्ट लिखा हो कि झूठी FIR या गलत गवाही देने पर 7 साल तक की जेल होगी। यह मनोवैज्ञानिक रूप से झूठ बोलने वालों में डर पैदा करेगा।

  2. सत्यता का कानूनी शपथ पत्र : अब केवल मौखिक शिकायत से एफआईआर दर्ज नहीं होनी चाहिए। शिकायतकर्ता को एक हलफनामा (Affidavit) देना अनिवार्य हो। यदि बाद में तथ्य गलत पाए जाते हैं, तो शिकायतकर्ता पर सीधे आपराधिक मुकदमा चलाया जाए।

  3. संपत्ति से मुआवजे का प्रावधान : यदि कोई व्यक्ति झूठे केस के कारण जेल जाता है, तो उसकी बर्बादी का मुआवजा राज्य नहीं, बल्कि वह शिकायतकर्ता दे जिसने झूठ बोला था। इसकी वसूली शिकायतकर्ता की संपत्ति कुर्क करके की जाए।

  4. सरकारी नौकरी और चुनाव पर स्थायी रोक : अदालत में झूठा हलफनामा पेश करना 'नैतिक पतन' माना जाए। ऐसे व्यक्ति को भविष्य में किसी भी सरकारी पद, चुनाव लड़ने या लोक सेवा के लिए हमेशा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाए।

  5. BNS की धाराओं का कड़ाई से पालन : भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत 'परजुरी' के मामलों में अदालतों को 'सुओ मोटो' (स्वत: संज्ञान) लेकर कार्रवाई करनी चाहिए ताकि गवाहों में कानून का इकबाल कायम रहे।

अदालतों का बोझ और सामाजिक प्रभाव

भारत की अदालतों में लंबित केसों का एक मुख्य कारण 'फर्जी मुकदमेबाजी' है। जब पुलिस और अदालतें अपना कीमती समय और संसाधन झूठे केसों को सुलझाने में लगाती हैं, तो वास्तविक पीड़ितों के मामले पीछे छूट जाते हैं। इससे न केवल करदाताओं के पैसे की बर्बादी होती है, बल्कि समाज का न्याय प्रणाली से भरोसा भी उठता है। 'तारीख पर तारीख' का सिलसिला तब तक खत्म नहीं होगा जब तक कि झूठ की बुनियाद पर केस दर्ज कराने वालों को तत्काल दंडित नहीं किया जाएगा।

व्यवस्था की जवाबदेही

एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की यह याचिका देश की न्यायिक शुचिता को बनाए रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। न्याय का प्राथमिक उद्देश्य अपराधी को सजा देना है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी निर्दोष की बलि न चढ़े। सुप्रीम कोर्ट का यह नोटिस सरकारों के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि अब कानून को 'निजी दुश्मनी' साधने का जरिया नहीं बनने दिया जाएगा।

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