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Shaurya Squadron : सेना के बेड़े में शामिल हुई नई ड्रोन यूनिट; जानें कैसे 'शौर्य स्क्वाड्रन' से आर्मर्ड रेजीमेंट को मिलेगी अचूक मारक क्षमता

भारतीय सेना की बढ़ी सामरिक ताकत :  उत्तर प्रदेश के बबीना में हुए युद्धाभ्यास 'अमोघ ज्वाला' में सेना ने बख्तरबंद रेजीमेंट के लिए अपनी इस नई ड्रोन यूनिट का सफल परीक्षण किया है। यह अत्याधुनिक तकनीक दुश्मन की पहचान कर उस पर तुरंत हमला करने के समय को घटाकर सैनिकों की सुरक्षा और मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा देगी।

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रणभूमि जैसी वास्तविक परिस्थितियों में परखे गए इस स्क्वाड्रन ने डीप सर्विलांस और क्लोज कॉम्बैट टोही क्षमता के साथ सटीक प्रहार को एक साथ जोड़कर आधुनिक लड़ाकू इकाई के रूप में अपनी ताकत का शानदार प्रदर्शन किया। (फोटो साभार: दक्षिणी कमान)
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Shaurya Squadron :  भारतीय सेना ने भविष्य की युद्ध चुनौतियों से निपटने के लिए तकनीक के मोर्चे पर एक बड़ा कदम उठाया है। इसी कड़ी में सेना ने मार्च के महीने में उत्तर प्रदेश के झांसी के पास स्थित बबीना फील्ड फायरिंग रेंज में अपनी नई और अत्याधुनिक ड्रोन यूनिट का अनावरण किया है। इसे 'शौर्य स्क्वाड्रन' का नाम दिया गया है। 13 दिवसीय 'अभ्यास अमोघ ज्वाला' के दौरान इस स्क्वाड्रन का सफल परीक्षण किया गया। 31 आर्मर्ड डिवीजन द्वारा संचालित इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य बख्तरबंद (आर्मर्ड) रेजीमेंट की सामरिक निगरानी, दुश्मन की टोह लेने और उन पर सटीक मारक क्षमता को परखना था। इस नई ड्रोन यूनिट के शामिल होने से युद्ध के मैदान में सेना की ताकत और चपलता दोनों में जबरदस्त इजाफा होने जा रहा है।

अभ्यास 'अमोघ ज्वाला' में दिखी अचूक ताकत

शौर्य स्क्वाड्रन के इस नए और बेहद घातक कॉन्सेप्ट का पहली बार जमीनी स्तर पर प्रदर्शन 'अभ्यास अमोघ ज्वाला' में किया गया। मुख्यालय दक्षिणी कमान ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि सुदर्शन चक्र कोर के तत्वावधान में व्हाइट टाइगर डिवीजन द्वारा इस आधुनिक सामरिक इकाई का अभ्यास किया गया।

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इस वृहद ड्रिल का उद्देश्य बहु-आयामी (multi-domain) ऑपरेशनों को जाँचना था। इसके तहत आर्मर्ड यूनिट्स, अटैक हेलीकॉप्टर, लड़ाकू विमान और ड्रोन्स को एक साथ मोर्चे पर लगाया गया। युद्ध जैसी वास्तविक परिस्थितियों में रियल-टाइम सर्विलांस, सटीक लक्ष्यीकरण (precision targeting), इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW), हवाई रक्षा और दुश्मन के ड्रोन को मार गिराने (counter-drone) की क्षमताओं का कड़ा परीक्षण हुआ।

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सेंसर-टू-शूटर लूप: अब मिनटों का काम सेकंडों में

शौर्य स्क्वाड्रन को जमीनी स्तर पर तैनात करने का सबसे बड़ा और अहम उद्देश्य 'सेंसर-टू-शूटर लूप' के समय को कम करना है। सैन्य रणनीति में इसका मतलब है कि दुश्मन की पहचान करने (सेंसर) और उस पर फायर करने (शूटर) के बीच लगने वाले समय को मिनटों से घटाकर सेकंडों में लाना।

अब तक दुश्मन की टोह लेने (रेकी) के लिए टैंकों, सैन्य वाहनों या पैदल सैनिकों को ही आगे भेजा जाता था। इसमें उनके दुश्मन के जाल (एंबुश) में फंसने या हताहत होने का भारी जोखिम रहता था। लेकिन अब इस नई ड्रोन यूनिट ने आर्मर्ड रेजीमेंट की 'आंख और कान' का काम संभाल लिया है। ये ड्रोन ऊंचाई से दुश्मन की सटीक लोकेशन का पता लगाएंगे और तुरंत पीछे मौजूद टैंकों और कमांडरों को डेटा भेजेंगे, जिससे बिना पल गंवाए दुश्मन को तबाह किया जा सकेगा।

'अश्नि प्लाटून' की तर्ज पर हुआ है गठन

पैदल सेना के बाद अब बख्तरबंद इकाइयों को भी मिला विशेष ड्रोन्स का सुरक्षा कवच, 25-30 प्रशिक्षित सैनिकों की है टीम। शौर्य स्क्वाड्रन को स्थापित करने का यह कदम भारतीय सेना द्वारा 'अश्नि प्लाटून' बनाए जाने के बाद उठाया गया है। अश्नि प्लाटून पैदल सेना (Infantry) बटालियनों का अभिन्न अंग हैं, जो विभिन्न प्रकार के सर्विलांस और अटैक ड्रोन से लैस होती हैं।

शौर्य (बख्तरबंद इकाइयों के लिए) और अश्नि (पैदल सेना के लिए) दोनों इकाइयों में 25-30 विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक शामिल होते हैं। इन्हें सामरिक स्तर पर और अपने आस-पास के क्षेत्र में ड्रोन तथा दुश्मन के ड्रोन्स को नष्ट करने (काउंटर-ड्रोन) के संचालन की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है।

ड्रोन्स का जखीरा और ऑपरेशनल आजादी

इन यूनिट्स के पास आधुनिक हथियारों और ड्रोन्स का एक खास मिश्रण होता है। इनमें मुख्य रूप से निगरानी ड्रोन, अटैक ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन (हवा में मंडराकर घात लगाकर हमला करने वाले हथियार) शामिल हैं। इन ड्रोन्स की मदद से फ्रंटलाइन कमांडरों को रियल-टाइम टारगेटिंग जानकारी मिलती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लिए उन्हें अपनी 'चेन ऑफ कमांड' में ऊपर बैठे अधिकारियों से हमले की इजाजत मांगने में समय बर्बाद नहीं करना पड़ता, जो उन्हें युद्ध क्षेत्र में शानदार परिचालन स्वतंत्रता (operational independence) देता है।

भारतीय सेना का विशाल बख्तरबंद ढांचा

 इस तकनीक का प्रभाव कितना व्यापक होगा, यह भारतीय सेना के बख्तरबंद ढांचे से समझा जा सकता है। वर्तमान में सेना के पास लगभग 65 आर्मर्ड रेजीमेंट हैं। प्रत्येक रेजीमेंट में लगभग 45 टैंक होते हैं, जिनमें T-72, T-90 और स्वदेश निर्मित 'अर्जुन' टैंक शामिल हैं। इसके अलावा मशीनीकृत बलों में 27 बटालियनों के साथ मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री रेजीमेंट और 23 बटालियनों के साथ ब्रिगेड ऑफ द गार्ड्स शामिल हैं, जो BMP-2/3 जैसे वाहनों से लैस हैं। इस पूरे बेड़े के साथ नई ड्रोन यूनिट का एकीकरण एक बड़ा रणनीतिक बदलाव है।

पुराने T-72 टैंकों का भविष्य: बनेंगे रोबोटिक योद्धा

सैन्य अधिकारियों के अनुसार, शौर्य स्क्वाड्रन का कॉन्सेप्ट अभी लगातार विकसित हो रहा है। अपने पहले फील्ड अभ्यास में इस यूनिट के प्रदर्शन का गहराई से विश्लेषण किया जा रहा है और इसे संस्थागत रूप देने से पहले इसमें आवश्यक सुधार किए जाएंगे।

इसी दिशा में एक और बड़ा कदम सेना के पुराने हो रहे T-72 टैंकों को लेकर उठाया जा रहा है। सेना इन टैंकों को 2030 के बाद रिटायर करने के बजाय इन्हें 'रिमोटली कंट्रोल्ड ऑटोनोमस आर्मर्ड फाइटिंग व्हीकल्स' (मानवरहित बख्तरबंद लड़ाकू वाहन) में बदलने की योजना पर काम कर रही है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन मानवरहित टैंकों को ड्रोन तकनीक के साथ जोड़ दिया जाए, तो यह बिना किसी मानवीय नुकसान के उच्च जोखिम वाले मिशनों को अंजाम दे सकेंगे।  इसके साथ ही, टैंकों को दुश्मन के ड्रोन हमलों से बचाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने टैंकों में एंटी-ड्रोन सिस्टम (सॉफ्ट किल और हार्ड किल) लगाने की दिशा में भी काम शुरू कर दिया है।

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