Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
Add Tribune As Your Trusted Source
search-icon-img
Advertisement

Satellite Communication : अंतरिक्ष में उपग्रहों की ‘सीधी बातचीत’ कैसे होगी ? भारत बना रहा लेजर लिंक

क्या है ओआईएसएल, यह कैसे काम करता है, रेडियो लिंक से कितना अलग है और भारत के लिए क्यों अहम है?

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
featured-img featured-img
AI द्वारा निर्मित
Advertisement

Satellite Communication :  अंतरिक्ष में उपग्रहों की संख्या लगातार बढ़ रही है और उनके जरिये भेजे जाने वाले डेटा की मात्रा भी बढ़ रही है। ऐसे में उपग्रहों के बीच तेज और भरोसेमंद संचार की जरूरत बढ़ रही है। इसी दिशा में भारतीय डीप-टेक कंपनी एस्ट्रोगेट लैब्स ने स्वदेशी ऑप्टिकल इंटर-सैटेलाइट लिंक (ओआईएसएल) टर्मिनल विकसित करने की घोषणा की है। कंपनी का लक्ष्य इसे 2027 तक उड़ान के लिए तैयार करना है। कंपनी ने बेंगलुरु स्पेस एक्सपो 2026 में अपनी ओआईएसएल क्षमता का प्रदर्शन किया है।

ओआईएसएल क्या है ?

ओआईएसएल का पूरा नाम ऑप्टिकल इंटर-सैटेलाइट लिंक है। आसान भाषा में इसे उपग्रहों के बीच लेजर से बना डेटा कनेक्शन समझ सकते हैं। आज किसी उपग्रह को बड़ी मात्रा में डेटा धरती तक भेजना हो तो उसे ग्राउंड स्टेशन से संपर्क करना पड़ता है। वहां से डेटा आगे दूसरे नेटवर्क या स्थान तक भेजा जाता है। लेकिन अगर दो उपग्रह आपस में सीधे डेटा भेज सकें तो यह प्रक्रिया ज्यादा लचीली हो सकती है।

Advertisement

ओआईएसएल में लेजर बीम का इस्तेमाल कर एक उपग्रह दूसरे उपग्रह से सीधा संपर्क स्थापित करता है। जरूरत के मुताबिक डेटा एक उपग्रह से दूसरे और फिर तीसरे उपग्रह तक पहुंचाया जा सकता है।  यानी अंतरिक्ष में उपग्रहों का ऐसा नेटवर्क बनाया जा सकता है, जिसमें डेटा केवल धरती के रास्ते पर निर्भर न रहे।

Advertisement

लेजर ही क्यों ?

उपग्रहों के बीच संचार के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी आधारित तकनीक लंबे समय से इस्तेमाल होती रही है। लेकिन अंतरिक्ष में डेटा की मांग बढ़ने के साथ रेडियो स्पेक्ट्रम और बैंडविड्थ पर दबाव भी बढ़ता है।

ऑप्टिकल संचार में रेडियो तरंगों के बजाय लेजर प्रकाश का इस्तेमाल किया जाता है। लेजर बीम बहुत दिशात्मक होती है। कंपनी के अनुसार, इससे अधिक बैंडविड्थ और कम विलंबता वाले संचार की क्षमता मिलती है।

इसे ऐसे समझ सकते हैं कि रेडियो संचार में संकेत अपेक्षाकृत व्यापक क्षेत्र में फैल सकते हैं, जबकि लेजर लिंक में बीम को बहुत सटीक दिशा में भेजना होता है। यही इसकी ताकत भी है और चुनौती भी।

यह काम कैसे करेगा ?

मान लीजिए किसी पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ने किसी क्षेत्र की बड़ी मात्रा में तस्वीरें और अन्य डेटा जुटाया। उस समय यदि वह सीधे ग्राउंड स्टेशन के संपर्क में नहीं है तो डेटा को तुरंत धरती पर भेजना संभव नहीं हो सकता।

ओआईएसएल व्यवस्था में वह उपग्रह अपने पास मौजूद डेटा को दूसरे उपग्रह तक लेजर लिंक के जरिये भेज सकता है। दूसरा उपग्रह उसे आगे किसी तीसरे उपग्रह तक पहुंचा सकता है।

इस तरह डेटा अंतरिक्ष में मौजूद कई उपग्रहों के बीच आगे बढ़ सकता है। जब नेटवर्क का कोई उपग्रह उपयुक्त ग्राउंड स्टेशन के संपर्क में आएगा, तब डेटा धरती पर भेजा जा सकता है।  इस व्यवस्था को अंतरिक्ष में बने डेटा हाईवे की तरह समझा जा सकता है।

क्या हर उपग्रह सीधे हर उपग्रह से जुड़ा होगा ?

जरूरी नहीं। ओआईएसएल नेटवर्क की संरचना इस बात पर निर्भर करेगी कि कितने उपग्रह हैं, वे किस कक्षा में हैं और उनके बीच संपर्क की स्थिति कैसी है। एक उपग्रह एक या अधिक दूसरे उपग्रहों से लिंक बना सकता है। कई लिंक मिलकर एक ऑप्टिकल नेटवर्क तैयार कर सकते हैं। इसमें डेटा को उपलब्ध लिंक के आधार पर आगे भेजा जा सकता है।

यही वजह है कि इंटर-सैटेलाइट लिंक केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि भविष्य के बड़े उपग्रह नेटवर्क की संचार व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

भारत ने अभी क्या हासिल किया है ?

एस्ट्रोगेट लैब्स ने बेंगलुरु स्पेस एक्सपो 2026 में अपनी ओआईएसएल क्षमता का प्रदर्शन किया है। कंपनी का लक्ष्य अपने ओआईएसएल टर्मिनल को 2027 तक उड़ान के लिए तैयार करना है।  कंपनी ने एक्सपो में एस्ट्रोलिंक माइक्रो नामक 10 जीबीपीएस लेजर संचार टर्मिनल का लाइव प्रदर्शन भी किया। यह स्पेस-टू-ग्राउंड लेजर संचार के लिए विकसित किया गया है।

कंपनी के अनुसार, उसके स्पेस-टू-ग्राउंड लेजर संचार टर्मिनल टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल (टीआरएल) 8 तक पहुंच चुके हैं। कंपनी ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को स्वदेश में विकसित सैटेलाइट-टू-ग्राउंड लेजर संचार टर्मिनल उपलब्ध कराने की भी जानकारी दी है।

ग्राउंड स्टेशन के साथ भी किया परीक्षण

एस्ट्रोगेट लैब्स के अनुसार, उसने यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के टेरानेट मोबाइल ऑप्टिकल ग्राउंड स्टेशन के साथ क्रॉस-कम्पैटिबिलिटी परीक्षण पूरा किया है। इसका मतलब है कि कंपनी ने अपनी तकनीक की अंतरराष्ट्रीय ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ अनुकूलता की भी जांच की है।

ओआईएसएल की सबसे बड़ी चुनौती क्या है ?

लेजर लिंक की सबसे बड़ी खूबियों में से एक इसकी सटीकता है, लेकिन यही इसकी बड़ी तकनीकी चुनौती भी है।  दो उपग्रह अंतरिक्ष में बहुत तेज गति से अपनी-अपनी कक्षाओं में घूम रहे होते हैं। ऐसे में एक उपग्रह से दूसरे उपग्रह की ओर बेहद संकीर्ण लेजर बीम को सटीकता से निर्देशित करना पड़ता है।

इसके लिए पॉइंटिंग, एक्विजिशन एंड ट्रैकिंग (पीएटी) प्रणाली महत्वपूर्ण होती है। इसे आसान भाषा में लेजर लिंक की ‘निशाना साधने और संपर्क बनाए रखने’ वाली व्यवस्था कहा जा सकता है।

एस्ट्रोगेट लैब्स के सह-संस्थापक एवं मुख्य तकनीकी अधिकारी जयरामन योगेश्वरन के अनुसार, कंपनी के स्पेस-टू-ग्राउंड टर्मिनल में पीएटी सिस्टम, ऑप्टिकल मॉडेम, स्थिर कोर्स ट्रैकिंग जिम्बल और सिस्टम-स्तरीय एकीकरण जैसे प्रमुख घटक पहले ही विकसित और मान्य किए जा चुके हैं। कंपनी का कहना है कि इन्हीं तकनीकों को इंटर-सैटेलाइट लिंक के लिए आगे इस्तेमाल किया जा रहा है।

रेडियो और लेजर लिंक में क्या अंतर है?

पहलूरेडियो फ्रीक्वेंसी लिंकऑप्टिकल/लेजर लिंक
संकेतरेडियो तरंगेंलेजर प्रकाश
बीमअपेक्षाकृत व्यापकबेहद दिशात्मक
बैंडविड्थसीमित स्पेक्ट्रम पर निर्भरअधिक डेटा क्षमता की संभावना
विलंबतानेटवर्क पर निर्भरकम विलंबता की क्षमता
सटीकतातुलनात्मक रूप से कम चुनौतीबहुत अधिक सटीक पॉइंटिंग जरूरी
उपयोगलंबे समय से व्यापकतेजी से विकसित होती तकनीक

इसका रक्षा क्षेत्र में क्या महत्व है? 

कंपनी ओआईएसएल तकनीक के लिए रक्षा उपग्रह समूहों को भी एक संभावित बाजार के रूप में देख रही है। ऐसे नेटवर्क में उपग्रहों के बीच सीधे डेटा का आदान-प्रदान होने से अंतरिक्ष आधारित संचार व्यवस्था को अधिक लचीला बनाया जा सकता है। खासकर ऐसे नेटवर्क में जहां बड़ी मात्रा में डेटा को अलग-अलग उपग्रहों के बीच भेजना हो।

हालांकि, किसी विशिष्ट रक्षा प्रणाली में इस तकनीक का वास्तविक इस्तेमाल किस तरह होगा, यह संबंधित मिशन और प्रणाली की आवश्यकताओं पर निर्भर करेगा।

सैटेलाइट इंटरनेट में इसका क्या फायदा हो सकता है ?

ओआईएसएल का एक संभावित इस्तेमाल बड़े उपग्रह समूहों में हो सकता है। जब अंतरिक्ष में बड़ी संख्या में उपग्रह एक नेटवर्क का हिस्सा हों तो हर उपग्रह को हर बार सीधे धरती से संपर्क करने की जरूरत कम हो सकती है।

एक उपग्रह दूसरे से डेटा ले सकता है और नेटवर्क के भीतर उसे आगे भेज सकता है। इससे अंतरिक्ष में डेटा के लिए वैकल्पिक रास्ते तैयार हो सकते हैं।  एस्ट्रोगेट लैब्स इस तकनीक को सैटेलाइट बैकहॉल के लिए भी लक्ष्य कर रही है।

कक्षा में कंप्यूटिंग से इसका क्या संबंध है?

भविष्य में कुछ कंप्यूटिंग और डेटा प्रोसेसिंग कार्य अंतरिक्ष में ही किए जाने की संभावना पर काम हो रहा है। ऐसे में उपग्रहों के बीच तेज डेटा ट्रांसफर की जरूरत बढ़ सकती है।

कंपनी ने ऑर्बिटल कंप्यूट को भी अपने ओआईएसएल टर्मिनल के लक्षित बाजारों में शामिल किया है। अगर उपग्रहों के बीच तेज ऑप्टिकल कनेक्शन उपलब्ध होता है तो अंतरिक्ष में मौजूद अलग-अलग कंप्यूटिंग संसाधनों के बीच डेटा का आदान-प्रदान आसान हो सकता है।

दुनिया में यह तकनीक कितनी आगे है ?

इंटर-सैटेलाइट लेजर लिंक केवल भारत तक सीमित तकनीक नहीं है। एस्ट्रोगेट लैब्स ने स्पेसएक्स के स्टारलिंक नेटवर्क का उदाहरण दिया है। कंपनी के अनुसार, स्टारलिंक में हजारों द्विदिशीय लेजर लिंक ऑप्टिकल नेटवर्क के रूप में काम कर रहे हैं।

इससे पता चलता है कि उपग्रहों के बीच लेजर आधारित नेटवर्क अब केवल प्रयोगशाला की अवधारणा नहीं है। चुनौती यह है कि इस तकनीक को अलग-अलग मिशनों और बड़े नेटवर्क के लिए विश्वसनीय, किफायती और व्यापक स्तर पर इस्तेमाल योग्य बनाया जाए।

भारत के लिए 2027 का लक्ष्य क्यों अहम है ?

एस्ट्रोगेट लैब्स का 2027 तक ओआईएसएल टर्मिनल को उड़ान के लिए तैयार करने का लक्ष्य भारत के अंतरिक्ष संचार क्षेत्र में अगला कदम हो सकता है।  कंपनी पहले ही स्पेस-टू-ग्राउंड लेजर संचार तकनीक पर काम कर रही है और इसरो को टर्मिनल उपलब्ध कराने की जानकारी दे चुकी है। अब उसका लक्ष्य उसी तकनीकी आधार को उपग्रह-से-उपग्रह संचार तक ले जाना है।

अगर यह तकनीक सफलतापूर्वक उड़ान परीक्षण तक पहुंचती है तो भारत के पास भविष्य के उपग्रह नेटवर्क के लिए स्वदेशी ऑप्टिकल संचार तकनीक का एक और विकल्प होगा।

एक लाइन में समझें

स्पेस-टू-ग्राउंड लिंक में उपग्रह और धरती के बीच लेजर से डेटा जाता है, जबकि ओआईएसएल में दो उपग्रह सीधे लेजर के जरिये एक-दूसरे से डेटा साझा कर सकते हैं। -एजेंसी इनपुट के साथ्

Advertisement
×