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वायु प्रदूषण बढ़ा सकता है आत्महत्या और आत्मघाती विचारों का जोखिम, अध्ययन में PM2.5, PM10 और NO2 से जुड़ा संबंध

29 अध्ययनों की समीक्षा में सामने आया निष्कर्ष; शोधकर्ताओं ने आत्महत्या रोकथाम को केवल मानसिक स्वास्थ्य नहीं, व्यापक जनस्वास्थ्य के नजरिए से देखने पर दिया जोर

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शनिवार की सुबह नई दिल्ली के मयूर विहार इलाके में लोग घने कोहरे का सामना करते हुए सर्दी की सुबह में भी प्रदूषण से जूझते नजर आए। शनिवार की सुबह दिल्ली के कई हिस्सों में दृश्यता बेहद कम हो गई, घने कोहरे के बीच इमारतें और फ्लाईओवर धुंधले दिखाई देने लगे, क्योंकि राजधानी का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 384 पर पहुंचकर 'गंभीर' श्रेणी के करीब पहुंच गया। पीटीआई फोटो
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वायु प्रदूषकों के संपर्क में रहने से आत्महत्या व आत्मघाती विचारों का जोखिम बढ़ सकता है और पीएम2.5, पीएम10 तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) सबसे अधिक जोखिम वाले प्रदूषक माने गए हैं। अब तक हुए अध्ययनों की समीक्षा से जानकारी मिली।

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि 'जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिटी हेल्थ' में प्रकाशित इस अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि आत्महत्या की घटनाओं को रोकने की रणनीतियां तैयार करते समय पर्यावरण से जुड़े उन जोखिमों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, जिन्हें कम किया जा सकता है।

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ब्रिटेन की 'क्वीन्स यूनिवर्सिटी बेलफास्ट' के अनुसंधान दल ने 29 अध्ययनों के नतीजों का विश्लेषण किया जिनमें वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से आत्महत्या और आत्मघाती विचारों पर पड़ने वाले प्रभाव को देखा गया।

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शोधकर्ताओं ने कहा कि व्यक्तिगत, जैविक और परिस्थितिजन्य कारकों के आपसी मेल को देखते हुए आत्महत्या की घटनाएं रोकने को केवल मानसिक स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का मुद्दा भी माना जाना चाहिए। हालांकि, पर्यावरणीय जोखिमों और अवसाद व चिंता जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बीच संबंध पर काफी शोध हुआ है, लेकिन आत्महत्या के जोखिम में पर्यावरणीय कारकों की भूमिका के बारे में अब तक अपेक्षाकृत कम जानकारी उपलब्ध है।

शोधकर्ताओं ने कहा कि उनके सांख्यिकीय विश्लेषण में पीएम2.5 और पीएम10 के अल्पकालिक संपर्क तथा पीएम2.5 और एनओ2 के लंबे समय तक संपर्क का आत्महत्या, आत्महत्या के प्रयास और आत्मघाती विचारों के बढ़ते जोखिम से महत्वपूर्ण संबंध सामने आया। शोध दल ने कहा कि सल्फर डाइऑक्साइड और ओजोन जैसे कुछ अन्य वायु प्रदूषकों तथा ध्वनि प्रदूषण के मामले में भी ऐसा संबंध हो सकता है।

उन्होंने बताया कि वायु प्रदूषण के साथ-साथ आर्सेनिक, सीसा, लीथियम या नाइट्रेट से प्रदूषित पानी का संबंध भी तंत्रिका तंत्र पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों से पाया गया है जिनमें लंबे समय तक रहने वाली सूजन और तंत्रिका क्षति शामिल है। इससे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है और मनोदशा तथा तनाव से निपटने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।

ऑस्ट्रेलिया के कर्टिन विश्वविद्यालय के 'स्कूल ऑफ पॉपुलेशन हेल्थ' के प्रोफेसर बेन मुलिंस ने कहा कि यह अध्ययन वायु प्रदूषण और आत्महत्या के बीच संबंध की पड़ताल करने वाले शुरुआती व्यापक विश्लेषणों में से एक है। हालांकि, मुलिंस इस अध्ययन में शामिल नहीं रहे।

उन्होंने कहा कि यह पहले से ज्ञात है कि कई वायु प्रदूषक, खासकर कुछ धातुएं तंत्रिका तंत्र पर व्यापक प्रभाव डाल सकती हैं और इनके चलते अवसाद तथा चिंता जैसी समस्याएं हो सकती हैं, ऐसे में वायु प्रदूषण और आत्महत्या समेत मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बीच संबंध सामने आना आश्चर्यजनक नहीं है।

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