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Sleep Apnea : खर्राटों को न समझें मामूली, सोते समय अचानक रुक सकती है सांस; पीजीआई की इस स्वदेशी मशीन में छिपा है आपकी सुरक्षा का राज

पीजीआई और थापर इंस्टीट्यूट की Sleep Apnea पर साझा उपलब्धि: स्वदेशी तकनीक से महंगी जांच और अस्पताल के चक्करों से मिलेगी राहत

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Sleep Apnea : अगर आपके घर में कोई सोते समय बहुत तेज़ खर्राटे लेता है और अचानक उसकी सांस रुकने जैसी स्थिति बनती है, तो सावधान हो जाएं। यह सिर्फ गहरी नींद की निशानी नहीं, बल्कि 'स्लीप एप्निया' (Sleep Apnea) नामक एक गंभीर बीमारी हो सकती है।

चिकित्सा जगत के लिए एक बड़ी खुशखबरी यह है कि अब इस खतरनाक बीमारी की पहचान के लिए आपको महंगे और जटिल टेस्टों के लिए अस्पताल की कतारों में नहीं खड़ा होना पड़ेगा। पीजीआईएमईआर (PGIMER) चंडीगढ़ और थापर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, पटियाला के विशेषज्ञों ने मिलकर एक ऐसा स्वदेशी पोर्टेबल डिवाइस तैयार किया है, जो घर के बिस्तर पर ही आपकी सेहत का पूरा लेखा-जोखा तैयार कर देगा।

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क्या है स्लीप एप्निया और क्यों है यह खतरनाक ?

स्लीप एप्निया नींद से जुड़ी एक ऐसी समस्या है जिसमें सोते समय ऊपरी श्वास मार्ग (Airway) में बार-बार रुकावट आने के कारण सांस कुछ सेकंड के लिए थम जाती है। इससे शरीर में ऑक्सीजन का स्तर ($SpO_2$) तेजी से गिरता है। अगर इसका समय पर इलाज न हो, तो यह हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर और यहाँ तक कि नींद में हार्ट अटैक का कारण बन सकता है। अब तक इसकी जांच के लिए 'पॉलीसॉम्नोग्राफी' (PSG) टेस्ट होता था, जिसके लिए मरीज को भारी-भरकम मशीनों और तारों के बीच अस्पताल में रात गुजारनी पड़ती थी, जो न केवल खर्चीला था बल्कि असहज भी।

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कैसे काम करता है यह नया स्वदेशी डिवाइस?

एआई द्वारा निर्मित।
एआई द्वारा निर्मित।

पीजीआई के ईएनटी विभाग के प्रोफेसर डॉ. संदीप बंसल और थापर इंस्टीट्यूट के सहायक प्रोफेसर डॉ. हरप्रीत सिंह के मार्गदर्शन में विकसित यह तकनीक बेहद आधुनिक है। इस डिवाइस में उन्नत सेंसर्स (MAX30102) और 'बायो-एम्प' तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।

इसकी कार्यप्रणाली के मुख्य बिंदु :

  • मल्टी-सेंसर अप्रोच: यह रीयल-टाइम में मरीज की ईसीजी (ECG) और ऑक्सीजन लेवल की निगरानी करता है।
  • स्मार्ट प्रोसेसिंग: इसमें लगा रास्पबेरी पाई (Raspberry Pi) और विशेष सॉफ्टवेयर जैविक संकेतों को पकड़कर उनका विश्लेषण करते हैं।
  • नॉन-इनवेसिव डिज़ाइन: जांच के दौरान मरीज को शरीर पर कोई सुई या जटिल तार लगाने की जरूरत नहीं होती, जिससे प्राकृतिक नींद में बाधा नहीं आती।

एआई और क्लाउड मॉनिटरिंग का संगम

शोधकर्ताओं की टीम इस मशीन को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग जोड़ने पर काम कर रही है। इससे आने वाले समय में मशीन खुद ही सांस की रुकावट के पैटर्न को पहचान कर डॉक्टरों को सटीक डेटा उपलब्ध कराएगी।

यही नहीं, इस प्रोजेक्ट का अगला चरण 'वायरलेस क्लाउड मॉनिटरिंग' है। इसके तहत मरीज का डेटा सीधे डॉक्टर के डैशबोर्ड पर पहुँच जाएगा। इसका सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को होगा जो दूरदराज के इलाकों में रहते हैं और बार-बार अस्पताल नहीं आ सकते। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्वदेशी तकनीक न केवल सस्ती होगी बल्कि देश में स्लीप एप्निया के इलाज की दिशा में एक बड़ी क्रांति साबित होगी।

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