रीढ़ की हड्डी की चोट में अब 'ब्लड टेस्ट' बताएगा सच ; जानिये क्या है PGI की वह खोज जो जगाएगी रिकवरी की आस
चिकित्सा जगत में नई उम्मीद : पीजीआई के डॉक्टरों ने खोजी नई तकनीक, खून में मौजूद खास तत्व बताएंगे इलाज की सही दिशा
PGI Spinal Cord Injury Breakthrough : सड़क हादसों या ऊंचाई से गिरने के कारण जब किसी व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी (स्पाइनल कॉर्ड) में गंभीर चोट लगती है, तो मरीज और उसके परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि "क्या मरीज पूरी तरह ठीक हो पाएगा?" रीढ़ की हड्डी की चोट कई बार मरीज को लंबे समय तक बिस्तर पर ला सकती है। अब तक डॉक्टरों के लिए शुरुआत में ही यह बता पाना बहुत मुश्किल होता था कि मरीज की रिकवरी कैसी होगी। लेकिन, चंडीगढ़ स्थित पीजीआईएमईआर (PGIMER) के डॉक्टरों ने एक ऐसा तरीका खोज निकाला है, जिससे खून की एक खास जांच से ही रिकवरी का अंदाजा लगाया जा सकेगा।
जानिये क्या है 'बायोमार्कर' और किन विशेषज्ञों ने किया यह कमाल
पीजीआई के ऑर्थोपेडिक (हड्डी रोग) और बायोकेमिस्ट्री विभाग के साझा शोध में 'बायोमार्कर' (शरीर में मौजूद जैविक संकेतक) की अहम भूमिका सामने आई है। इस ऐतिहासिक शोध को ऑर्थोपेडिक विभाग के डॉ. विशाल कुमार के नेतृत्व में डॉ. दीपी जोमंगईहा, डॉ. सुवदीप सिंह भट्ट, डॉ. दीपक नेराडी और बायोकेमिस्ट्री विभाग से डॉ. अर्नब पाल व डॉ. सचिन परागौड की टीम ने पूरा किया है।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझें कि जैसे बुखार आने पर थर्मामीटर शरीर की स्थिति बता देता है, वैसे ही खून में मौजूद 'न्यूरोफिलामेंट (NF)' और 'एस-100बी (S-100B)' नाम के दो खास तत्व यह बताएंगे कि रीढ़ की हड्डी की चोट का शरीर पर कितना असर हुआ है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन मरीजों के खून में इन तत्वों की मात्रा शुरुआत से ही ज्यादा बनी रहती है, उनके ठीक होने की रफ्तार काफी धीमी होती है या रिकवरी की संभावना कम होती है।
हादसों के शिकार ज्यादातर युवा और पुरुष
यह एक्स्पलेनर इस बात पर भी जोर देता है कि रीढ़ की हड्डी में चोट लगने के सबसे ज्यादा मामले युवाओं के आ रहे हैं, जो समाज के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। शोध के सांख्यिकीय आंकड़ों के मुताबिक:
- औसत उम्र : चोटिल होने वाले मरीजों की औसत उम्र लगभग 38.6 साल पाई गई।
- पुरुषों की संख्या ज्यादा : दुर्घटनाओं का शिकार होने वालों में 82.9 प्रतिशत पुरुष थे, जबकि महिलाएं मात्र 17.1 प्रतिशत थीं।
- चोट के कारण : ऊंचाई से गिरना (37.1 प्रतिशत) सबसे बड़ा कारण रहा, वहीं 31.4 प्रतिशत मामले सड़क हादसों से जुड़े थे।
तीन चरणों में हुई खून की जांच और वैश्विक मान्यता
मरीजों की सटीक स्थिति जानने के लिए डॉक्टरों ने यह शोध 34 गंभीर मरीजों पर किया। मरीजों के खून के नमूने तीन अलग-अलग समय पर लिए गए। पहला अस्पताल में भर्ती होते समय, दूसरा सर्जरी के तुरंत बाद और तीसरा छह हफ्ते बाद फॉलो-अप के दौरान। इन नमूनों की जांच आधुनिक 'एलेक्सिस मॉड्यूलर एनालिटिक्स' और 'एलिसा' जैसी उच्च तकनीक वाली मशीनों से की गई ताकि नतीजे पूरी तरह सटीक मिलें। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक ट्रॉमा केयर (आपातकालीन चिकित्सा) में एक बड़ा क्रांतिकारी बदलाव लाएगी, जिससे डॉक्टरों को पहले दिन से ही सटीक इलाज तय करने में मदद मिलेगी।

