जिस ज़हर से डॉक्टर भी जूझते रहे, PGI ने उसी पर निकाला इलाज का रास्ता
सल्फास ज़हर अब पूरी तरह लाइलाज नहीं
उत्तर भारत के कृषि इलाकों में जिस ज़हर का नाम सुनते ही डॉक्टर भी आशंकित हो जाते थे, उसी ‘सल्फास’ के इलाज में अब निर्णायक मोड़ आ गया है। दशकों से एल्यूमिनियम फॉस्फाइड ज़हरखुरानी को भारत में सबसे घातक और लगभग लाइलाज माना जाता रहा है। गांवों, कस्बों और जिला अस्पतालों में इस ज़हर के मामलों का मतलब अक्सर एक ही होता था, बेबस इलाज, सीमित विकल्प और बेहद कम बचने की संभावना।
लेकिन चंडीगढ़ स्थित पीजीआई के डॉक्टरों ने इस डरावनी धारणा को चुनौती देने वाली बड़ी वैज्ञानिक सफलता हासिल की है। आंतरिक चिकित्सा विभाग द्वारा किए गए नियंत्रित क्लिनिकल अध्ययन में यह पहली बार वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है कि इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन थेरेपी सेल्फोस ज़हर से पीड़ित गंभीर मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकती है। यह शोध न केवल इलाज की दिशा बदलता है, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए भी उम्मीद की नई राह खोलता है, जो हर साल इस ज़हर की चपेट में आते हैं।
इस अध्ययन का मार्गदर्शन डीन (अकादमिक) और आंतरिक चिकित्सा विभाग के प्रमुख संजय जैन ने किया। गंभीर मरीजों के इलाज में उनके क्लिनिकल नेतृत्व और अनुभव ने इस शोध को व्यावहारिक और भरोसेमंद आधार दिया। इस परियोजना को पीजीआईएमईआर की मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च सेल (एमईआरसी) से वित्तीय सहयोग मिला, जो संस्थान की समाजोपयोगी और मरीज-केंद्रित शोध के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
रैंडमाइज्ड क्लिनिकल स्टडी के प्रमुख अन्वेषक डॉ. मंदीप सिंह भाटिया रहे, जबकि डॉ. सौरभ चंद्रभान शारदा सह-अन्वेषक के रूप में शामिल रहे। आंतरिक चिकित्सा विभाग के अन्य चिकित्सकों ने भी इस शोध में सक्रिय योगदान दिया।
पहली बार वैज्ञानिक प्रमाण के साथ प्रभावी इलाज
पीजीआईएमईआर के आंतरिक चिकित्सा विभाग द्वारा किए गए इस नियंत्रित क्लिनिकल अध्ययन में यह स्पष्ट रूप से सामने आया है कि इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन थेरेपी सेल्फोस ज़हर के मरीजों में केवल सहायक उपचार नहीं, बल्कि निर्णायक जीवनरक्षक भूमिका निभा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह इस विषय पर दुनिया का पहला ऐसा नियंत्रित अध्ययन है, जिसमें इस थेरेपी के लाभों को ठोस वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर प्रमाणित किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित शोध
इस शोध के नतीजे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल यूरोपियन रिव्यू ऑफ मेडिकल एंड फार्माकोलॉजिकल साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं। इससे न केवल पीजीआईएमईआर को वैश्विक स्तर पर पहचान मिली है, बल्कि भारत में सेल्फोस ज़हर से जुड़ी गंभीर चिकित्सकीय चुनौती भी अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनी है।
नतीजों ने बदली इलाज की दिशा
अध्ययन के दौरान मरीजों को दो समूहों में विभाजित किया गया। एक समूह को पारंपरिक इलाज दिया गया, जबकि दूसरे समूह को पारंपरिक इलाज के साथ इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन थेरेपी भी दी गई।
तुलनात्मक विश्लेषण में सामने आया कि
• मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई
• गंभीर मेटाबॉलिक एसिडोसिस में तेजी से सुधार हुआ
• ब्लड प्रेशर और हृदय की कार्यक्षमता अधिक स्थिर रही
• शॉक और हृदय संबंधी जटिलताओं से जूझ रहे मरीजों में बेहतर रिकवरी देखी गई
डॉक्टरों के अनुसार, यदि यह थेरेपी ज़हर लेने के शुरुआती घंटों में शुरू कर दी जाए, तो मरीज के बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
गांव और जिला अस्पतालों के लिए राहत
इस खोज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन कोई दुर्लभ या महंगी दवा नहीं है। यह पहले से ही देश के अधिकांश सरकारी और निजी अस्पतालों में उपलब्ध है। इसका अर्थ यह है कि जिला अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में भी, जहां सेल्फोस ज़हर के सबसे अधिक मामले सामने आते हैं और आईसीयू सुविधाएं सीमित होती हैं, वहां इस इलाज को व्यवहारिक रूप से अपनाया जा सकता है।
कृषि राज्यों की पुरानी चुनौती
पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों में अनाज संरक्षण के लिए सेल्फोस का उपयोग आम है। इसके चलते आत्मघाती और आकस्मिक ज़हरखुरानी के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। ऐसे में एक सस्ता, सुरक्षित और प्रमाण-आधारित इलाज इन राज्यों के लिए जनस्वास्थ्य के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।

