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Moon Mission Artemis 2 : चार लाख किमी दूर से कैसा दिखता है चांद? अपोलो-13 का रिकॉर्ड तोड़ आर्टेमिस-2 ने दिखाया 'डार्क साइड' का सच

56 साल बाद नासा के आर्टेमिस-2 ने तोड़ा अपोलो-13 का कीर्तिमान; अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्रमा के रहस्यमयी 'फार साइड' से भेजीं अद्भुत तस्वीरें, भावुक पल में एक क्रेटर को दिया दिवंगत पत्नी का नाम।

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Moon Mission Artemis 2 : अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में आज एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के आर्टेमिस-2 मिशन ने सोमवार रात वह कारनामा कर दिखाया, जिसका इंतजार पूरी मानवता पिछले 56 वर्षों से कर रही थी। चंद्रमा के 'फार साइड' यानी पिछले हिस्से के सन्नाटे को चीरते हुए चार अंतरिक्ष यात्री अब पृथ्वी की ओर लौट रहे हैं, लेकिन अपने पीछे वे एक ऐसा कीर्तिमान छोड़ आए हैं जिसे तोड़ पाना भविष्य के लिए बड़ी चुनौती होगा। यह मिशन न केवल चंद्रमा की दूरी नापने का गवाह बना, बल्कि मानवीय भावनाओं और अदम्य साहस की एक नई कहानी भी कह गया।

56 साल बाद टूटा अपोलो-13 का 'अनचाहा' रिकॉर्ड

आर्टेमिस-2 मिशन ने अंतरिक्ष अन्वेषण में दूरी का एक नया बेंचमार्क सेट किया है। इससे पहले साल 1970 में अपोलो-13 मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी से 4,00,171 किलोमीटर की दूरी पर पहुंचे थे। दिलचस्प बात यह है कि अपोलो-13 का वह रिकॉर्ड एक तकनीकी खराबी के कारण बना था, जब यान को सुरक्षित वापस लाने के लिए चंद्रमा के पीछे से एक लंबा चक्कर काटना पड़ा था।

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लेकिन आर्टेमिस-2 ने योजनाबद्ध तरीके से इस आंकड़े को पार कर लिया है। ओरियन कैप्सूल ने चंद्रमा के पिछले हिस्से से गुजरते हुए मानव इतिहास में पृथ्वी से सबसे अधिक दूरी तय करने का गौरव हासिल किया। करीब सात घंटे का यह सफर इस पूरे मिशन का सबसे संवेदनशील हिस्सा रहा। यह दूरी तय करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भविष्य के मंगल मिशनों के लिए सुरक्षा और संचार प्रणालियों का सबसे बड़ा परीक्षण है।

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जज्बात और विज्ञान का संगम: 'कैरल' को मिला चांद पर स्थान

जब मिशन कंट्रोल ने रिकॉर्ड टूटने की पुष्टि की, तो अंतरिक्ष में एक ऐसा पल आया जिसने दुनिया भर के लोगों का दिल जीत लिया। मिशन कमांडर रीड वाइजमैन और उनकी टीम ने चंद्रमा पर दो नए विशाल गड्ढों (क्रेटर) के नाम रखने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने एक का नाम अपने कैप्सूल के सम्मान में 'इंटेग्रिटी' और दूसरे का नाम कमांडर वाइजमैन की दिवंगत पत्नी की याद में 'कैरल' रखने की अनुमति मांगी।

वाइजमैन की पत्नी कैरल का साल 2020 में कैंसर से निधन हो गया था। इस घोषणा के दौरान कमांडर वाइजमैन भावुक होकर रो पड़े और उनके साथी यात्रियों ने उन्हें गले लगा लिया। अंतरिक्ष की उस अनंत नीरवता में यह क्षण इस बात का प्रमाण बना कि विज्ञान की हर बड़ी खोज के पीछे एक मानवीय प्रेरणा और संवेदना छिपी होती है।

चमकती पहाड़ियां और डार्क साइड का सच

चंद्रमा का वह हिस्सा जो हमेशा पृथ्वी से ओझल रहता है और जिसे 'डार्क साइड' कहा जाता है, वहां का नजारा कैसा होता है? पायलट विक्टर ग्लोवर ने इसका आंखों देखा हाल सुनाया। उन्होंने बताया कि चंद्रमा की कुछ पहाड़ियां इतनी चमकदार और सफेद दिख रही थीं, मानो उन पर ताजी बर्फ जमी हो। चूंकि चंद्रमा पर वायुमंडल नहीं है, इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि यह चमक वहां मौजूद विशेष खनिजों या सौर किरणों के परावर्तन का नतीजा हो सकती है।

कनाडाई अंतरिक्ष यात्री जेरेमी हैनसेन ने कहा, "बिना किसी कैमरे या टेलिस्कोप के, अपनी आंखों से इस परिदृश्य को देखना रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव है। यह अविश्वसनीय है।" उन्होंने यह भी बताया कि एक ही फ्रेम में पृथ्वी और चंद्रमा को देखना इंसान को अपनी लघुता और ब्रह्मांड की विशालता का अहसास कराता है।

विविधता और साहस के चार 'सारथी'

आर्टेमिस-2 मिशन की सफलता के पीछे चार विशिष्ट व्यक्तित्व हैं, जो वैश्विक अंतरिक्ष सहयोग की नई तस्वीर पेश करते हैं:

  1. रीड वाइजमैन (कमांडर): अनुभवी नेतृत्व जिन्होंने इस जटिल मिशन को सफलतापूर्वक संभाला।

  2. विक्टर ग्लोवर (पायलट): चंद्रमा की कक्षा तक पहुंचने वाले पहले अश्वेत व्यक्ति।

  3. क्रिस्टीना कोच (मिशन स्पेशलिस्ट): अंतरिक्ष में सबसे अधिक समय बिताने वाली महिला, जो अब चंद्रमा के सबसे करीब पहुंचने वाली पहली महिला बनी हैं।

  4. जेरेमी हैनसेन (कनाडा): इस मिशन के जरिए कनाडा को अंतरिक्ष की शीर्ष लीग में शामिल करने वाले यात्री।

इन चारों ने न केवल चंद्रमा की परिक्रमा की, बल्कि वहां से हाई-रेजोल्यूशन डेटा और तस्वीरें ह्यूस्टन भेजीं, जो आने वाले समय में चंद्रमा पर स्थायी इंसानी बस्ती बसाने के काम आएंगी।

क्या है अगला पड़ाव? चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव

आर्टेमिस-2 की यह सफलता असल में 'आर्टेमिस-3' की नींव है। नासा का आगामी लक्ष्य अगले दो वर्षों के भीतर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर मनुष्यों को उतारना है। दक्षिणी ध्रुव वह क्षेत्र है जहां पानी के बर्फ के रूप में होने की प्रबल संभावना है। यदि वहां पानी मिलता है, तो इसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़कर रॉकेट ईंधन और पीने का पानी बनाया जा सकेगा। यह उपलब्धि चंद्रमा को मंगल ग्रह की यात्रा के लिए एक 'लॉन्चिंग पैड' के रूप में तैयार करेगी।

वापसी की चुनौती और सुरक्षा तंत्र

अब ओरियन कैप्सूल पृथ्वी की ओर तेजी से बढ़ रहा है। वापसी के दौरान इसे वायुमंडल के घर्षण और लगभग 2700 डिग्री सेल्सियस के भीषण तापमान को सहना होगा। वैज्ञानिकों की टीम लगातार यान की गति और दिशा पर नजर रखे हुए है। अगर सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो अगले कुछ दिनों में यह प्रशांत महासागर में सुरक्षित 'स्प्लैशडाउन' करेगा। यह मिशन यह बताने के लिए काफी है कि इंसान अब सिर्फ चांद को दूर से देखने के लिए नहीं, बल्कि वहां बसने के इरादे से आगे बढ़ रहा है।

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