Right To Vote: महात्मा गांधी ने करीब एक सदी पहले की थी सभी के मताधिकार की वकालत, बहस अब भी जारी
1931 में गांधी ने धन और साक्षरता को मतदान के अधिकार का आधार बनाने का किया था विरोध; एसआईआर के बीच फिर गरमाई मताधिकार को लेकर बहस
मतदाता सूची में कौन शामिल हो सकता है और कौन नहीं, इस पर हालिया बहस शुरू होने से लगभग एक सदी पहले ही महात्मा गांधी ने सभी के लिए मताधिकार की पुरजोर वकालत की थी। इसके लगभग डेढ़ दशक बाद, जब आजाद भारत का संविधान तैयार किया जा रहा था, तो इसके निर्माता बी.आर. आंबेडकर और कुछ अन्य नेताओं ने मतदान को मौलिक अधिकार बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन 1947 में संविधान सभा द्वारा गठित एक सलाहकार समिति ने इस विचार को खारिज कर दिया।
अगले कुछ वर्षों में संविधान सभा में इस मुद्दे पर कई बार बहस हुई। तब से यह मुद्दा समय-समय पर चर्चा में रहा है, लेकिन अब निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के कारण इस पर ध्यान और ज्यादा केंद्रित हो गया है। इस प्रक्रिया में करोड़ों नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं और कई अन्य लोगों के नाम हटने का खतरा बना हुआ है।
विशेषज्ञ और राजनीतिक दलों के नेता एक बार फिर मतदान को मौलिक अधिकार बनाने, या कम से कम यह सुनिश्चित करने की वकालत कर रहे हैं कि देश के वास्तविक वयस्क नागरिकों से यह अधिकार छीना न जाए। आठ अक्टूबर, 1931 को अपने साप्ताहिक समाचार पत्र 'यंग इंडिया' में महात्मा गांधी ने लिखा था कि उन्हें यह बात बर्दाश्त नहीं है कि जिस व्यक्ति के पास धन है उसे वोट देने का अधिकार हो, लेकिन जिस व्यक्ति का चरित्र तो अच्छा है पर उसके पास धन या साक्षरता नहीं है, उसे मतदान का अधिकार न हो।
शुक्रवार को देश महात्मा गांधी की 157वीं जयंती मनाएगा। उन्होंने लिखा, ''जो व्यक्ति दिन-रात अपनी मेहनत का पसीना बहाता है और ईमानदारी से काम करता है, उसे सिर्फ गरीब होने के अपराध के कारण वोट देने का अधिकार न मिले, यह बात बर्दाश्त नहीं की जा सकती।'' गांधीजी ने कहा, ''मैं खुद वोट देने का अधिकार छोड़ना ज्यादा पसंद करूंगा, बजाय इसके कि मेरे अस्पृश्य भाई को वोट देने का अधिकार न मिले।''
मतदाता सूचियों के विषय में उन्होंने लिखा कि वह साक्षरता के उस सिद्धांत के पक्षधर नहीं हैं जिसके अनुसार मतदाता को कम से कम 'तीन आर' का ज्ञान होना चाहिए। 'तीन आर' का मतलब पढ़ने, लिखने और अंकगणित के बुनियादी कौशल से है। साक्षरता का संदेश देने के लिए हल्के-फुल्के अंदाज में अलंकारिक रूप से इन तीनों को अंग्रेजी में 'रीडिंग, राइटिंग और रिथमेटिक' कहा गया है।
महात्मा गांधी ने लिखा, ''मैं चाहता हूं कि मेरे लोगों को 'तीन आर' ज्ञान हो, लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि अगर मुझे वोट देने के काबिल बनने के लिए उनके 'तीन आर' सीखने का इंतज़ार करना पड़ा, तो मुझे 'ग्रीक कैलेंडर' (एक ऐसा दिन जो कभी नहीं आता) तक इंतजार करना होगा, और मैं इतने लंबे समय तक इंतजार करने को तैयार नहीं हूं।''
उन्होंने यह भी कहा, ''मैं जानता हूं कि इनमें से लाखों लोग वोट देने में पूरी तरह सक्षम हैं, लेकिन अगर हम उन सभी को मताधिकार देते हैं, तो उन सभी को मतदाता सूची में शामिल करना और प्रबंधन योग्य निर्वाचन क्षेत्र बना पाना अगर पूरी तरह असंभव नहीं भी हो, लेकिन बहुत मुश्किल हो जाएगा।'' उन्होंने इसका एक समाधान भी सुझाया।
महात्मा गांधी ने लिखा, ''हमारे पास यह विकल्प हो सकता है कि जो वोट देना चाहता है, उसे मताधिकार मिले... मुझे लगता है कि इस तरह की योजना मतदाता सूची को संभालने लायक दायरे में रखेगी।'' भारत निर्वाचन आयोग के पूर्व वरिष्ठ प्रधान सचिव के.एफ. विल्फ्रेड ने कहा कि संविधान सभा में शुरू में मतदान को मौलिक अधिकार बनाने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन भारत के मतदाताओं की संख्या जैसे कारणों से इसे शामिल नहीं किया गया।
उन्होंने कहा, ''सैद्धांतिक रूप में, हम यह नहीं कह सकते कि यह अधिकार नहीं होना चाहिए क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण अधिकार है। लेकिन फिर, आबादी के आकार और वोट न दे पाने या किसी और के नाम पर किसी और के वोट देने जैसी वजहों को देखते हुए, पूरी चुनाव प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।''
मतदान को मौलिक अधिकार बनाने का मुद्दा कई बार अदालतों में भी पहुंचा है और यह कहा गया है कि भले ही यह मौलिक अधिकार न हो, लेकिन यह भारत के लोकतंत्र के लिए बुनियादी है। लोकसभा के पूर्व महासचिव और जाने-माने संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने कहा कि मतदान भले ही अभी मौलिक अधिकार न हो, लेकिन यह एक संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि कानून में एसआईआर का कोई ज़िक्र नहीं है, लेकिन मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव का प्रावधान है।

