Ladakh fossils : आज का ठंडा लद्दाख कभी था समुद्री क्षेत्र! न्योमा में मिले 3.4 से 3.8 करोड़ साल पुराने जीवाश्म
सुबाथू फॉर्मेशन के जीवाश्मों से समानता के संकेत, समुद्री परिस्थितियों के पूर्व की ओर विस्तार की संभावना; वैज्ञानिक जांच से स्पष्ट होगा दोनों क्षेत्रों का संबंध
Ladakh fossils : आज का लद्दाख बर्फीले पहाड़ों, ऊंचे दर्रों और ठंडे रेगिस्तान के लिए जाना जाता है। लेकिन करोड़ों वर्ष पहले इस क्षेत्र की परिस्थितियां आज से बिल्कुल अलग थीं। लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र के न्योमा में मिले समुद्री जीवाश्म इस प्राचीन भूगर्भीय इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी सामने ला रहे हैं।
टेथिस फॉसिल म्यूजियम के संस्थापक और भू-विज्ञानी एवं सोलन निवासी डॉ. रितेश आर्या के जारी भूवैज्ञानिक अभियान में न्योमा से समुद्री जीवाश्मों का एक बड़ा संग्रह मिला है। प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार इन जीवाश्मों की आयु करीब 3.4 से 3.8 करोड़ वर्ष हो सकती है। हालांकि, इनकी सटीक उम्र और भू-स्तरीय स्थिति की पुष्टि के लिए विस्तृत वैज्ञानिक जांच की जा रही है।
संग्रह में मुख्य रूप से टुरिटेला प्रकार के गैस्ट्रोपोड, द्विकपाटी जीव और सीप जैसी आकृतियों वाले जीवाश्म शामिल हैं। शुरुआती तुलना में इनकी समानता हिमालय के प्रसिद्ध सुबाथू फॉर्मेशन में मिलने वाले समुद्री जीवाश्मों से दिखाई देती है। इसी आधार पर यह संभावना सामने आई है कि ईओसीन काल में समुद्री परिस्थितियों का विस्तार सुबाथू क्षेत्र से पूर्व की ओर लद्दाख तक रहा हो। इसकी पुष्टि के लिए आगे का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
आखिर न्योमा के जीवाश्म इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं ?
जीवाश्म किसी पुराने जीव के सिर्फ पत्थर में बदल चुके अवशेष नहीं होते। वे उस समय के पर्यावरण और भूगर्भीय परिस्थितियों को समझने का जरिया भी होते हैं। आज जहां न्योमा का इलाका ऊंचे, ठंडे और शुष्क भूभाग के लिए जाना जाता है, वहां समुद्री जीवों के जीवाश्म मिलना इस बात का संकेत है कि करोड़ों वर्ष पहले यहां समुद्री पर्यावरण मौजूद रहा होगा।
समुद्री जीवाश्मों के साथ जीवाश्म हथेलियां, लकड़ी और अन्य वनस्पति अवशेष भी मिले हैं। ये अवशेष उस समय की पर्यावरणीय परिस्थितियों को समझने में वैज्ञानिकों की मदद कर सकते हैं। हालांकि, केवल इन अवशेषों के आधार पर उस समय के तापमान या जलवायु का निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
गैस्ट्रोपोड देखते ही सुबाथू की याद आई
डॉ. रितेश आर्या के अनुसार न्योमा में जब उन्होंने पहली बार इन गैस्ट्रोपोड जीवाश्मों को देखा तो उनकी बनावट ने तुरंत सुबाथू फॉर्मेशन में मिलने वाले जीवाश्मों की याद दिलाई। डॉ. आर्या लंबे समय से सुबाथू क्षेत्र में जीवाश्मों का अध्ययन और संग्रह करते रहे हैं। उनके अनुसार न्योमा में मिले जीवाश्मों में दिखाई देने वाली समानता इस खोज का सबसे दिलचस्प पहलू है।
यहीं से एक बड़ा वैज्ञानिक सवाल सामने आता है कि क्या ईओसीन काल में समुद्री परिस्थितियों का कोई निरंतर या संबंधित क्षेत्र सुबाथू से लेकर लद्दाख के न्योमा तक रहा होगा ? फिलहाल इसका उत्तर निश्चित रूप से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए जीवाश्मों की प्रजातिगत पहचान, उनकी आयु, चट्टानों की परत और भू-स्तरीय संबंधों का विस्तृत अध्ययन जरूरी है।
न्योमा में पहले भी मिल चुके हैं जीवाश्म
न्योमा में जीवाश्म मिलने की बात नई नहीं है। वैज्ञानिक अध्ययनों में इस क्षेत्र के कुक्शो फॉर्मेशन से मछलियों और मोलस्क के जीवाश्म पहले भी दर्ज किए जा चुके हैं। प्रो. अशोक साहनी और अन्य वैज्ञानिकों ने कुक्शो फॉर्मेशन से मीठे पानी की मछलियों और मोलस्क के जीवाश्मों का अध्ययन किया था। इसके अलावा लियान फॉर्मेशन से पौधों और कशेरुकी जीवों के जीवाश्मों के रिकॉर्ड भी सामने आए हैं।
इसलिए मौजूदा अभियान का महत्व इस बात में है कि इसमें समुद्री जीवाश्मों का एक बड़ा संग्रह सामने आया है और इनके सुबाथू फॉर्मेशन के जीवाश्मों से संभावित संबंध की जांच का नया आधार मिला है।
2018 में भी सामने रखे थे समुद्री जीवाश्मों के प्रमाण
डॉ. रितेश आर्या ने वर्ष 2018 में न्योमा से समुद्री जीवाश्म मिलने के प्रमाण देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के एक सम्मेलन में प्रस्तुत किए थे। मौजूदा अभियान में पहले की तुलना में काफी बड़ा जीवाश्म संग्रह मिलने की बात सामने आई है। इससे इस क्षेत्र के भूगर्भीय इतिहास पर आगे विस्तृत अध्ययन की संभावना बढ़ी है।
लियान फॉर्मेशन में मिले जीवों की गतिविधियों के निशान
मौजूदा अभियान के दौरान लियान फॉर्मेशन में ऐसी भू-परत भी दर्ज की गई है, जिसमें प्राचीन जीवों द्वारा बनाए गए बिल या सुरंग जैसे निशान मौजूद हैं। भूविज्ञान में इस तरह के निशानों को जीवों की गतिविधियों के प्रमाण के रूप में अध्ययन किया जाता है। इनसे यह समझने में मदद मिल सकती है कि उस समय तलछट के भीतर और आसपास किस तरह की जैविक गतिविधियां होती थीं।
डॉ. आर्या के अनुसंधानों में कसौली, धर्मशाला, स्टोक मार्खा घाटी, कारगिल और न्योमा सहित हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों से जीवाश्म हथेलियां, जीवाश्म लकड़ी और वनस्पति अवशेष भी सामने आए हैं।
सुबाथू से न्योमा तक क्या है कनेक्शन?
सुबाथू फॉर्मेशन हिमालय के महत्वपूर्ण ईओसीन कालीन भूवैज्ञानिक क्षेत्रों में शामिल है। यहां समुद्री जीवाश्मों के प्रमाण मिलते हैं। अब न्योमा में मिले समान प्रकार के जीवाश्मों ने दोनों क्षेत्रों के बीच संभावित संबंध को लेकर वैज्ञानिक रुचि बढ़ाई है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। जीवाश्मों में समानता मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सुबाथू का समुद्र सीधे न्योमा तक फैला हुआ था। इसके लिए वैज्ञानिकों को दोनों क्षेत्रों की चट्टानों की उम्र, परतों, जीवाश्मों की प्रजातियों और उनके भूगर्भीय संदर्भ की तुलना करनी होगी।
अगर आगे के अध्ययन में मजबूत समानता और भूगर्भीय संबंध की पुष्टि होती है, तो न्योमा की खोज हिमालय के प्राचीन समुद्री इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
प्रो. अशोक साहनी ने की खोज की सराहना
प्रसिद्ध जीवाश्म विज्ञानी प्रो. अशोक साहनी ने भी डॉ. रितेश आर्या की इस खोज की सराहना की है। वे डॉ. आर्या के पीएचडी मार्गदर्शक रहे हैं। प्रो. साहनी ने लद्दाख में समुद्री जीवाश्मों की खोज को डॉ. आर्या की कसौली में की गई महत्वपूर्ण जीवाश्म खोजों के समान उल्लेखनीय बताया है।
वैज्ञानिक जांच से खुलेगा बड़ा रहस्य
अभी इस खोज के कई पहलुओं पर विस्तृत अध्ययन होना बाकी है। वैज्ञानिक जीवाश्मों का जीव-वर्गीकरण करने के साथ उनकी सही आयु और चट्टानों में उनकी भू-स्तरीय स्थिति निर्धारित करने का प्रयास करेंगे।
इसके बाद इनकी तुलना हिमालय के अन्य ईओसीन समुद्री क्षेत्रों, विशेष रूप से सुबाथू फॉर्मेशन से की जाएगी। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि न्योमा के जीवाश्मों का दूसरे हिमालयी समुद्री क्षेत्रों से कितना संबंध है। यही अध्ययन यह समझने में भी मदद करेगा कि करोड़ों वर्ष पहले इस क्षेत्र का समुद्री और स्थलीय पर्यावरण कैसा था।
समुद्र से पहाड़ तक की कहानी
करीब चार करोड़ वर्ष पहले समुद्री जीवों के रहने की परिस्थितियों वाला यह भूभाग आज दुनिया के सबसे ऊंचे और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है। यही बदलाव हिमालय के लंबे भूगर्भीय इतिहास को समझने की कुंजी है।
लद्दाख की चट्टानों में आज भी उस प्राचीन दुनिया के प्रमाण मौजूद हैं। समुद्री जीवाश्म, वनस्पति अवशेष और जीवों की गतिविधियों के निशान मिलकर उस समय की पर्यावरणीय परिस्थितियों की तस्वीर बनाने में मदद करते हैं। टेथिस सागर और हिमालय के निर्माण की कहानी करोड़ों वर्षों में हुए भूगर्भीय बदलावों से जुड़ी है। न्योमा में मिले जीवाश्म इसी लंबी कहानी की एक और कड़ी हो सकते हैं।
अभी सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि लद्दाख में समुद्री परिस्थितियां थीं या नहीं। जीवाश्म इसका संकेत देते हैं। बड़ा सवाल यह है कि उस समुद्री पर्यावरण का विस्तार कितना था और उसका सुबाथू सहित हिमालय के दूसरे ईओसीन समुद्री क्षेत्रों से क्या संबंध था। इसी का जवाब आगे की वैज्ञानिक जांच से मिलेगा।

