Koshi Basin Disaster Risk : कोशी बेसिन में क्यों बढ़ रहा आपदा का खतरा, क्या कहता है नया अध्ययन ?
बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियल झील फटने के साथ संस्थागत समन्वय की कमी भी चुनौती; स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर
Koshi Basin Disaster Risk : कोशी नदी बेसिन बाढ़, भूस्खलन, सूखे और ग्लेशियल झील फटने से आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। जापान के विभिन्न संस्थानों के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में कहा गया है कि प्राकृतिक खतरों के साथ-साथ विभागों और प्रशासनिक स्तरों के बीच कमजोर समन्वय भी आपदा जोखिम बढ़ा रहा है। अलग-अलग संस्थाओं की प्राथमिकताओं में अंतर और स्थानीय तथा वंचित समुदायों की चिंताओं को निर्णय प्रक्रिया में सीमित जगह मिलना भी चुनौती है।
कोशी नदी बेसिन तिब्बत, नेपाल और भारत में फैला है। कोशी नदी करीब 720 किलोमीटर लंबी है। यह तिब्बत में सुन कोसी, अरुण और तमूर नदियों के संगम से निकलती है। इसके बाद यह पूर्वी नेपाल से होते हुए बिहार में प्रवेश करती है और कटिहार जिले में गंगा में मिलती है। कोशी बेसिन में ग्लेशियल झील फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ), अचानक बाढ़, भूस्खलन, सूखा और मलबे का बहाव जैसी घटनाएं होती रहती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, बार-बार आने वाली बाढ़, गाद जमने और शासन से जुड़ी चुनौतियों के कारण आपदाओं का असर लंबे समय तक बना रहता है।
समस्या सिर्फ प्राकृतिक आपदाओं की नहीं
अध्ययन में नेपाल और भारत के कोशी बेसिन वाले हिस्सों में आपदा जोखिम कम करने से जुड़े विभिन्न संस्थानों के कामकाज और उनके बीच समन्वय का अध्ययन किया गया।
शोधकर्ताओं के अनुसार, आपदा जोखिम केवल प्राकृतिक खतरों से तय नहीं होता। संस्थाओं के बीच असमान समन्वय, अलग-अलग प्राथमिकताएं और स्थानीय तथा वंचित समुदायों की चिंताओं को निर्णय प्रक्रिया में सीमित जगह मिलना भी जोखिम बढ़ाता है।
अध्ययन में इसे किसी एक विभाग की समस्या के बजाय व्यवस्था से जुड़ी चुनौती बताया गया है। एक संस्थागत क्षेत्र की कमजोरी का असर दूसरे क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। इससे अलग-अलग जोखिम एक-दूसरे से जुड़कर अधिक गंभीर हो सकते हैं।
स्थानीय अधिकारियों के सामने क्या चुनौती है ?
अध्ययन में स्थानीय सरकारी अधिकारियों के एक साथ कई जिम्मेदारियां संभालने की समस्या भी सामने आई। शोधकर्ताओं ने इसे ‘मल्टी-हैटिंग’ कहा है। इससे काम की प्रक्रिया बिखर सकती है और आपदा के समय प्रतिक्रिया को व्यवस्थित करने में परेशानी हो सकती है।
शोधकर्ताओं ने स्थानीय अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने, आपदा जोखिम कम करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को बेहतर ढंग से काम करने की व्यवस्था देने और कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने का सुझाव दिया है। इससे आपदा के समय प्रतिक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।
भारत-नेपाल सहयोग क्यों जरूरी ?
कोशी बेसिन तिब्बत, नेपाल और भारत में फैला है। भारत और नेपाल के बीच सीमा पार सहयोग के लिए औपचारिक व्यवस्था मौजूद है, लेकिन अध्ययन के अनुसार दोनों देशों के बीच संस्थागत सहयोग की प्रक्रियाएं अभी विकसित हो रही हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा कि सीमा पार सहयोग में स्थानीय सरकारों, आपदा जोखिम कम करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और समुदाय स्तर के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इससे अलग-अलग स्तरों की चिंताओं को सहयोग की प्रक्रिया में जगह मिल सकेगी।
शोधकर्ताओं ने क्या समाधान सुझाया ?
शोधकर्ताओं ने निचले कोशी बेसिन के लिए सिस्टमेटिक रिस्क गवर्नेंस फ्रेमवर्क बनाने का सुझाव दिया है। इसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों और प्रशासनिक स्तरों से जुड़े जोखिमों की पहचान, निगरानी और प्रबंधन को एक साथ जोड़ना है।
इस व्यवस्था के तहत विभिन्न एजेंसियों के बीच नियमित समीक्षा की जा सकती है। इससे अलग-अलग क्षेत्रों के बीच जुड़े जोखिमों की पहचान करने और आपदा जोखिम कम करने वाली संस्थाओं की क्षमता मजबूत करने में मदद मिलेगी।
अध्ययन किसने किया ?
यह अध्ययन जापान की होक्काइडो यूनिवर्सिटी, साप्पोरो; इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल एनवायरनमेंटल स्ट्रेटेजीज, हयामा; और शिबाउरा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, टोक्यो के चार शोधकर्ताओं ने किया है। अध्ययन 2 सितंबर को Elsevier में प्रकाशित हुआ।
कोशी बेसिन में आपदा जोखिम केवल प्राकृतिक खतरों से नहीं बढ़ रहा। कमजोर संस्थागत समन्वय, अलग-अलग प्राथमिकताएं और स्थानीय तथा वंचित समुदायों की सीमित भागीदारी भी जोखिम को बढ़ा रही है। शोधकर्ताओं ने इसके लिए विभिन्न विभागों, प्रशासनिक स्तरों और सीमा पार स्थानीय संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल वाली व्यवस्था बनाने पर जोर दिया है।

