उत्तरकाशी प्रलय : जब आसमान से बारिश ही नहीं हुई, तो कहां से आया तबाही का वो सैलाब? ISRO ने ढूंढा पहाड़ की चोटी पर छिपा 'अदृश्य हत्यारा'
अगस्त 2025 की भीषण आपदा पर इसरो के विशेषज्ञों का सबसे बड़ा खुलासा
Uttarkashi Flash Flood 2025 : 5 अगस्त 2025 की उस मनहूस दोपहर उत्तरकाशी की हर्षिल घाटी और धराली में जो कुछ हुआ, उसे पूरी दुनिया ने 'बादल फटना' (Cloudburst) मान लिया था। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस दिन आसमान से सिर्फ 2.7 mm (नाममात्र) बारिश हुई, उस दिन 60 फीट ऊंचे मलबे का सैलाब कहां से आ गया ? भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिकों की एक ताजा और सनसनीखेज रिपोर्ट ने अब इस रहस्य से पूरी तरह पर्दा उठा दिया है।
इसरो के पांच शीर्ष विशेषज्ञों की टीम ने सेटेलाइट डेटा और डिजिटल एलीवेशन मॉडल के जरिए जो सच खोजा है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरकाशी की उस प्रलय का असली गुनहगार बादल नहीं, बल्कि पहाड़ की चोटी पर छिपा एक 'अदृश्य हत्यारा' था, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'आइस-पैच' कहा जाता है। यह रिपोर्ट 28 फरवरी 2026 को अंतर्राष्ट्रीय जर्नल 'स्प्रिंगर नेचुरल हजार्ड्स' (Springer’s Natural Hazards) में प्रकाशित हुई है।
पहेली: जब बारिश नहीं थी, तो प्रलय कैसे आई ?
आमतौर पर माना जाता है कि पहाड़ों में अचानक आने वाली बाढ़ तभी आती है जब बादल फटते हैं। लेकिन इसरो की यह स्टडी एक नए और कम पहचाने गए खतरे की ओर इशारा करती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि तबाही की शुरुआत श्रीकंठ ग्लेशियर के उस खतरनाक हिस्से से हुई जिसे 'निवेशन जोन' (Nivation Zone) कहा जाता है।
मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि आपदा के समय वहां कोई बड़ी मौसमी हलचल नहीं थी। बादल फटने के लिए कम से कम 100 mm प्रति घंटा की बारिश का पैमाना होता है, जबकि धराली में उस दिन नाममात्र की बूंदाबांदी थी। फिर भी, खीर गंगा (Kheer Gad) ने अचानक ऐसा रौद्र रूप धारण किया कि देखते ही देखते करोड़ों की संपत्ति और दर्जनों जिंदगियां मलबे में समा गईं।
क्या होता है 'निवेशन जोन' और 'आइस-पैच'?
इसरो के विशेषज्ञोंजो विभिन्न रिमोट सेंसिंग केंद्रों से जुड़े है। उन्होंने भौगोलिक घटना को विस्तार से समझाया है:
निवेशन जोन : यह ऊंचे हिमालयी पहाड़ों का वह हिस्सा है जो मुख्य ग्लेशियर से सटा होता है। यहाँ साल भर बर्फ के जमने, पिघलने और फिर से जमने की प्रक्रिया चलती रहती है। इस लगातार चक्र की वजह से पहाड़ की चट्टानें अंदर ही अंदर कमजोर और खोखली हो जाती हैं, जिससे कटोरे के आकार के गहरे बेसिन बन जाते हैं।
आइस-पैच : ये बर्फ के वे टुकड़े होते हैं जो मुख्य ग्लेशियर का हिस्सा नहीं होते, बल्कि ढलानों पर स्वतंत्र रूप से टिके रहते हैं। ये पैच देखने में स्थिर लगते हैं, लेकिन तापमान बढ़ने पर ये किसी 'टाइम बम' की तरह व्यवहार करते हैं।
कैसे आई तबाही? इसरो ने डिकोड की 'घटना की क्रोनोलॉजी'
इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) ने Cartosat-2S और Cartosat-3 जैसे आधुनिक सैटेलाइट्स की तस्वीरों का गहराई से विश्लेषण किया और पाया कि उस दिन असल में क्या हुआ था:
बर्फ का अचानक ढहना (Ice-Patch Collapse) : श्रीकंठ ग्लेशियर की खड़ी उत्तर और उत्तर-पूर्वी ढलान पर टिका एक विशाल 'आइस पैच' अपनी पकड़ छोड़ बैठा। यह हिस्सा पूरी तरह से खुला हुआ (Exposed) था और पिछले कई महीनों से पतला हो रहा था।
गुरुत्वाकर्षण की घातक मार : ढलान इतनी खड़ी थी कि बर्फ का वह टुकड़ा मलबे और पत्थरों को समेटते हुए गोली की रफ्तार से नीचे आया। ढहते समय इसकी गुरुत्वाकर्षण ऊर्जा इतनी ज्यादा थी कि इसने रास्ते में आने वाली हर चीज को उखाड़ फेंका।
मलबे का सैलाब : जैसे-जैसे यह मिश्रण नीचे आया, इसने पहाड़ की मिट्टी और ढीली चट्टानों को भी अपने साथ ले लिया। नीचे पहुंचते-पहुंचते यह पानी से ज्यादा 'कीचड़, पत्थरों और मलबे का पहाड़' बन गया। यही वजह थी कि संगम क्षेत्र में देखते ही देखते 20 हेक्टेयर का इलाका मलबे के नीचे दफन हो गया।
सेटेलाइट तस्वीरों ने पकड़ी 'चोरी': पहले वहां बर्फ थी, अब सिर्फ गहरे जख्म
वैज्ञानिकों ने आपदा से पहले (Pre-event) और आपदा के बाद (Post-event) की तस्वीरों का मिलान किया, तो ठोस सबूत मिले। जून और जुलाई 2025 की तस्वीरों में चोटियों पर सफेद बर्फ के पैच साफ नजर आ रहे थे। ये पैच धीरे-धीरे अपना आकार खो रहे थे, जो ग्लोबल वार्मिंग का संकेत था। घटना के तुरंत बाद की तस्वीरों में वे सफेद पैच पूरी तरह गायब थे और उनकी जगह पहाड़ पर 'ईरोज्नल स्कार्स' (गहरे कटाव के निशान) नजर आए। इससे साफ हो गया कि वह पूरी बर्फ ढहकर मलबे के साथ नीचे बह गई थी।
68 जिंदगियां और करोड़ों का हुआ था नुकसान
अगस्त 2025 की उस आपदा की भयावहता का अंदाजा धराली और हर्षिल की हालत देखकर लगाया जा सकता था।
मलबे का राज : धराली बाजार में 40 से 60 फीट तक मलबा जमा हो गया था। होटल, दुकानें और घर ताश के पत्तों की तरह मलबे में समा गए। कई दो-मंजिला इमारतें तो पूरी तरह जमीन के अंदर दफन हो गई थीं।
जनहानि: आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कम से कम 68 लोग लापता हुए थे। सामरिक रूप से संवेदनशील हर्षिल घाटी में सेना का एक कैंप और हेलीपैड भी इस सैलाब की चपेट में आकर पूरी तरह नष्ट हो गया था।
5,200 मीटर की ऊंचाई भी अब सुरक्षित नहीं
इसरो के शोधकर्ताओं ने एक बहुत ही चिंताजनक तथ्य सामने रखा है। उन्होंने पाया कि गढ़वाल हिमालय में अब 5,200 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर भी ग्लेशियर सुरक्षित नहीं हैं। तापमान में वृद्धि की वजह से ग्लेशियर अब ऊपर से नीचे की ओर तेजी से पतले हो रहे हैं। जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, पहाड़ों की ढलानें अस्थिर (Destabilize) हो रही हैं। यह भविष्य में बड़ी आपदाओं को जन्म दे सकती है।
अब बादलों पर नहीं, 'बर्फ के पैच' पर रखनी होगी नजर
इसरो की यह रिपोर्ट नीति-निर्माताओं के लिए एक 'वेक-अप कॉल' है। अब तक हमारा पूरा ध्यान 'बादल फटने' या 'ग्लेशियर झील फटने' (GLOF) पर रहता था, लेकिन यह स्टडी बताती है कि छोटे-छोटे 'आइस पैच' भी महाप्रलय ला सकते हैं। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि अब बादलों के साथ-साथ इन 'निवेशन जोन्स' की भी सैटेलाइट मॉनिटरिंग जरूरी है। यदि हम समय रहते इन अदृश्य खतरों पर नजर नहीं रखेंगे, तो भविष्य में ऐसी तबाही फिर से हमें चौंका सकती है।

