खामेनेई के बाद कैसा होगा ईरान ? दिल्ली से तेहरान तक टिकी नजरें, भारत की जेब और सुरक्षा पर होगा सीधा असर
तेहरान में नेतृत्व का संकट
IRAN-INDIA DYNAMICS : ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व के उस 'पावर सेंटर' का ढहना है जिसके इर्द-गिर्द पिछले 36 वर्षों से भारत की पश्चिम एशिया नीति घूमती रही है। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 1 मार्च, 2026 की सुबह ईरानी सरकारी मीडिया ने आधिकारिक तौर पर उनके 'शहादत' की पुष्टि की।
भारत के लिए यह क्षण इसलिए भी कूटनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण है क्योंकि ईरान के साथ हमारे संबंध केवल सरकारी समझौतों तक सीमित नहीं, बल्कि 'इंडो-ईरानी' साझी संस्कृति और सदियों पुराने व्यापारिक रास्तों से सींचे गए हैं। 1989 से ईरान की नियति तय करने वाले खामेनेई के बाद अब तेहरान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां से निकलने वाला हर रास्ता न केवल ईरान, बल्कि भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों को गहराई से प्रभावित करेगा।
भारत और ईरान: सदियों पुरानी दोस्ती और 'साझी विरासत'
भारत और ईरान के संबंध दुनिया के उन दुर्लभ उदाहरणों में से हैं, जहां दो प्राचीन सभ्यताएं हजारों साल से एक-दूसरे की पूरक रही हैं।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव
सिंधु घाटी और प्राचीन फारस के बीच व्यापारिक रिश्तों से शुरू हुआ यह सफर मुगलों के दौर में अपनी ऊंचाइयों पर पहुँचा। ऐतिहासिक तथ्यों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फारसी भाषा सदियों तक भारत की आधिकारिक और दरबारी भाषा रही, जिसने हमारी कला, वास्तुकला और आधुनिक हिंदी-उर्दू शब्दावली को जन्म दिया। 1950 में दोनों देशों ने 'मैत्री संधि' पर हस्ताक्षर किए थे और वर्ष 2026 में इनके आधुनिक कूटनीतिक संबंधों के 75 साल पूरे हो रहे हैं। भारत आज भी ईरान को अपना एक 'विस्तारित पड़ोसी' (Extended Neighbour) मानता है।
रणनीतिक स्वायत्तता
भारत ने हमेशा ईरान के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र संबंध बनाए रखे हैं। शीत युद्ध के कठिन दौर से लेकर आज के तनावपूर्ण समय तक, भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद ईरान के साथ ऊर्जा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को प्राथमिकता दी है।
चाबहार पोर्ट : भारत का 'गोल्डन गेटवे'
भारत के लिए ईरान के साथ संबंधों का सबसे आधुनिक और महत्वपूर्ण हिस्सा चाबहार बंदरगाह है। यह परियोजना भारत की 'कनेक्टिविटी' की लाइफलाइन मानी जाती है।
पाकिस्तान को बाईपास : भारत ने चाबहार में भारी निवेश किया है ताकि पाकिस्तान पर निर्भर रहे बिना सीधे अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक पहुंचा जा सके।
चीन को जवाब : मीडिया रिपोर्ट्स और कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह पोर्ट रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चीन द्वारा पाकिस्तान में विकसित किए जा रहे 'ग्वादर पोर्ट' का भारत का करारा जवाब है। यदि ईरान में नया नेतृत्व इस प्रोजेक्ट के प्रति ठंडा रुख अपनाता है, तो भारत का अरबों का निवेश और मध्य-एशिया तक पहुँचने का सपना मुश्किल में पड़ सकता है।
भारत पर प्रभाव: पेट्रोल से लेकर प्रवासियों तक
ईरान में होने वाला कोई भी छोटा सा बदलाव भारत के आम आदमी की जेब और देश की सुरक्षा पर सीधा असर डालता है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतें : दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरता है। आर्थिक जगत की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि ईरान में अस्थिरता बढ़ती है या युद्ध छिड़ता है, तो तेल की सप्लाई बाधित होगी। भारत अपनी जरूरत का 80% तेल आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने का सीधा मतलब है—देश में महंगाई का अनियंत्रित होना।
एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा : संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों में लगभग 1 करोड़ भारतीय रहते हैं। यदि ईरान-इजरायल संघर्ष पूरे क्षेत्र में फैलता है, तो इन भारतीयों की सुरक्षा और उनकी नौकरियों पर भारी संकट आ सकता है। भारत के लिए अपने नागरिकों का सुरक्षित रेस्क्यू करना एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती होगी।
कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा और चीन का फैक्टर
भारत के संबंध इजरायल और ईरान दोनों से गहरे हैं। नई दिल्ली को अब वाशिंगटन, तेल अवीव और नए तेहरान नेतृत्व के बीच एक बारीक संतुलन बनाना होगा। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के लिए सबसे बड़ी कूटनीतिक चिंता यह है कि एक अस्थिर या कमजोर ईरान पूरी तरह से चीन की गोद में जा सकता है। चीन ने पहले ही ईरान के साथ 25 साल के रणनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर कर रखे हैं।
उत्तराधिकार की पहेली: कौन होगा अगला 'सुप्रीम लीडर'?
ईरान में सर्वोच्च नेता का पद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सर्वोच्च सैन्य और राजनीतिक शक्ति का भी केंद्र होता है। वहां राष्ट्रपति से भी ऊपर एक पद है जिसे 'सुप्रीम लीडर' कहते हैं।
चयन प्रक्रिया : अब 88 सदस्यीय 'विशेषज्ञ परिषद' (Assembly of Experts) अगले नेता का चुनाव करेगी। यह परिषद केवल वरिष्ठ शिया धर्मगुरुओं से बनी होती है।
प्रमुख दावेदार : वैश्विक मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, खामेनेई के 56 वर्षीय बेटे मुजतबा खामेनेई का नाम सबसे अधिक चर्चा में है, जिन्हें शक्तिशाली 'रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' (IRGC) का समर्थन प्राप्त है। अन्य नामों में अयातुल्ला अलीरेजा अराफी और सुधारवादी धड़े के प्रिय हसन खुमैनी भी शामिल हैं। वर्तमान में अली लारीजानी को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है।
क्या ईरान-इजरायल तनाव विश्व युद्ध की आहट है ?
खामेनेई के निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नया नेतृत्व इजरायल और अमेरिका के प्रति 'नरम' रुख अपनाएगा या 'आक्रामक'। तेहरान से आ रही मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 28 फरवरी को हुए हमलों के बाद ईरान ने 40 दिनों के शोक और 7 दिनों की राष्ट्रीय छुट्टी की घोषणा की है। इस बीच, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने खाड़ी देशों के अपने समकक्षों से बात कर क्षेत्रीय स्थिरता की अपील की है। जून 2025 में हुए इजरायल-ईरान युद्ध के बाद से ही क्षेत्र में बारूद का ढेर लगा हुआ है।
विदेश मंत्रालय की नजर परिषद के फैसले पर
अगले कुछ दिन ईरान और दुनिया के लिए बेहद नाजुक हैं। भारत के विदेश मंत्रालय की नजरें विशेषज्ञ परिषद के फैसले पर टिकी हैं। भारत की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि ईरान में जो भी नया नेतृत्व आए, उसके साथ हमारे पुराने रणनीतिक और व्यापारिक रिश्ते बरकरार रहें। भारत के लिए 'स्थिर ईरान' उसकी आर्थिक प्रगति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।

