किशोर बदल रहा है तो सिर्फ जिद न समझें, मन में कुछ चल भी सकता है
चुप्पी, गुस्सा, अकेलापन और पढ़ाई से दूरी के पीछे हो सकते हैं बचपन के बुरे अनुभव; पीजीआई के विशेषज्ञों ने समय रहते पहचान पर दिया जोर
बेटा पहले दोस्तों के साथ रहता था, अब कमरे से बाहर नहीं निकलता। बेटी पहले पढ़ाई में आगे थी, अब किताब खोलने का मन नहीं करता। छोटी-सी बात पर गुस्सा आता है और परिवार से बातचीत भी कम हो गई है। ऐसे बदलावों को देखकर अक्सर माता-पिता इसे किशोरावस्था की जिद या मूड का हिस्सा मान लेते हैं। लेकिन हर बार वजह इतनी सामान्य नहीं होती। कई बार बच्चे के व्यवहार में बदलाव उसके भीतर चल रही किसी परेशानी का संकेत होता है।
यही सवाल पीजीआईएमईआर के एडवांस्ड पीडियाट्रिक्स सेंटर में आयोजित एक दिवसीय सीएमई में विशेषज्ञों के सामने था—किशोर के बदले व्यवहार को कैसे समझें और कब मदद की जरूरत होती है? कार्यक्रम में उत्तर भारत से करीब 120 शिक्षक, काउंसलर, बाल रोग विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और विद्यार्थी शामिल हुए।
बचपन की एक घटना लंबे समय तक असर डाल सकती है![]()
पीजीआईएमईआर की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. भवनीत भारती ने आईसीएमआर समर्थित स्कूल आधारित अध्ययन की शुरुआती जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि बचपन में मारपीट, उपेक्षा, भावनात्मक चोट, घर में लगातार तनाव या परिवार की गंभीर समस्याओं का असर किशोर के व्यवहार पर पड़ सकता है।
ऐसे अनुभवों को बचपन के प्रतिकूल अनुभव कहा जाता है। इसमें केवल दुर्व्यवहार ही नहीं, बल्कि गरीबी, हिंसा, पढ़ाई में रुकावट और परिवार की कठिन परिस्थितियां भी शामिल हो सकती हैं।
हर बच्चे पर इनका असर एक जैसा नहीं होता। कोई बच्चा बिल्कुल चुप हो जाता है, कोई गुस्सा करने लगता है, कोई दोस्तों से दूरी बना लेता है तो कोई जोखिम भरा व्यवहार शुरू कर सकता है। इसलिए केवल व्यवहार देखकर बच्चे को ‘समस्या वाला’ मान लेना सही नहीं है।
‘बच्चे में क्या खराबी है’ नहीं, ‘उसके साथ क्या हुआ’ पूछें
डॉ. भारती ने कहा कि बच्चे के व्यवहार को सुधारने से पहले उसकी परेशानी समझना जरूरी है। यदि बच्चा अचानक चुप रहने लगे या गुस्सा करने लगे तो उसे डांटने के बजाय बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहिए।
मसलन, ‘तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?’ पूछने के बजाय ‘क्या कोई ऐसी बात है जो तुम्हें परेशान कर रही है?’ जैसे सवाल बच्चे को अपनी बात रखने का मौका दे सकते हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे के बुरे अनुभवों की संख्या को उसकी पहचान नहीं बनाया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य परेशानी की पहचान कर समय पर मदद और सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना है।
किन बदलावों पर ध्यान देना चाहिए?
हर मूड खराब होना चिंता का कारण नहीं है। लेकिन यदि बदलाव लगातार बने रहें या बच्चे के रोजमर्रा के जीवन पर असर डालने लगें तो उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
ध्यान देने योग्य संकेत हैं—
- परिवार या दोस्तों से लगातार दूरी बनाना
- पहले की तुलना में बहुत अधिक चुप रहना
- छोटी बात पर अत्यधिक गुस्सा या चिड़चिड़ापन
- पढ़ाई में अचानक गिरावट
- नींद और दिनचर्या में बड़ा बदलाव
- जोखिम भरे कामों में रुचि बढ़ना
- खुद को नुकसान पहुंचाने की बात या कोशिश करना
इनमें से कोई संकेत दिखने का मतलब यह नहीं कि बच्चे को कोई मानसिक बीमारी है। लेकिन ऐसे बदलाव लगातार रहें तो बच्चे से बात करना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना जरूरी है।
सोशल मीडिया भी बन रहा है नई चुनौती
आज किशोरों की दुनिया का बड़ा हिस्सा मोबाइल और सोशल मीडिया से जुड़ा है। दोस्ती, मनोरंजन, पढ़ाई और अपनी पहचान बनाने का तरीका भी बदल रहा है। ऑनलाइन तुलना, साइबर बुलिंग, सोशल मीडिया का दबाव या ऑनलाइन रिश्ते बच्चे के व्यवहार और मनोदशा को प्रभावित कर सकते हैं।
सीएमई में डॉ. मनजीत सिद्धू, डॉ. मेहराज संधू और डॉ. प्रकरश सिंह ने सोशल मीडिया, डिजिटल जोखिम और मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा की। विशेषज्ञों ने जोर दिया कि माता-पिता बच्चों की ऑनलाइन दुनिया को समझें और उनसे इस विषय पर खुलकर बातचीत करें।
रिश्तों में अस्वीकृति भी कर सकती है परेशान
किशोरावस्था में दोस्ती और साथियों की स्वीकृति बहुत मायने रखती है। किसी दोस्त से दूरी, समूह से अलग कर दिया जाना या रिश्ते में अस्वीकृति बच्चे को भीतर तक प्रभावित कर सकती है।
डॉ. प्रहभजोत मल्ही ने रिश्तों, अस्वीकृति और उससे उबरने की क्षमता पर चर्चा की। उन्होंने किशोरों में खुद को नुकसान पहुंचाने के मुद्दे को भी केस स्टडी के जरिए समझाया।
वेपिंग और नशे की शुरुआत पर नजर जरूरी
किशोरों में वेपिंग, धूम्रपान या नशे की शुरुआत कई बार दोस्तों के दबाव या प्रयोग के तौर पर होती है। डॉ. निधि मल्होत्रा ने धूम्रपान, वेपिंग और नशीले पदार्थों के प्रयोग पर चर्चा की।
वहीं एआईएमएस मोहाली की कम्युनिटी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. अमृत विर्क ने किशोरावस्था को स्वस्थ आदतें विकसित करने का महत्वपूर्ण समय बताया।
स्कूल क्यों बन सकते हैं मदद की पहली जगह ?
किशोर दिन का बड़ा हिस्सा स्कूल में बिताते हैं। शिक्षक और काउंसलर उनके व्यवहार में आए बदलावों को जल्दी देख सकते हैं। इसी उद्देश्य से आईसीएमआर परियोजना के तहत चंडीगढ़ और मोहाली के सरकारी व निजी स्कूलों में किशोरों के बचपन के प्रतिकूल अनुभवों और उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर का अध्ययन किया जाएगा।
कार्यक्रम में मनोसामाजिक आकलन के तरीकों पर भी चर्चा हुई। डॉ. दीपिका लांबा, सुश्री चांदनी, सुश्री दीक्षा जैन और सुश्री शिवानी ने इस संबंध में जानकारी दी। समापन सत्र में अलग-अलग जरूरतों वाले किशोरों के लिए स्कूल और कॉलेज में बेहतर माहौल बनाने पर चर्चा हुई।
माता-पिता के लिए सबसे जरूरी बात
किशोर के व्यवहार में बदलाव दिखे तो सबसे पहले बातचीत बंद न करें। उसकी तुलना दूसरे बच्चों से न करें और हर परेशानी का दोष मोबाइल या दोस्तों पर न डालें। उसे अपनी बात कहने का मौका दें।
यदि बच्चा लगातार अलग-थलग रहने लगे, खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करे या उसके व्यवहार में गंभीर बदलाव दिखाई दे तो विशेषज्ञ की मदद लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।
पीजीआई की सीएमई का संदेश सरल है किशोर को केवल बदलने की कोशिश न करें, पहले उसे समझें। उसकी चुप्पी, गुस्सा या अकेलापन कई बार मदद की पुकार हो सकता है।

