Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

IAF की ताकत में इजाफा : मिग-29 और जगुआर अब 'किलर' मिसाइलों से लैस, दुश्मनों का बचना नामुमकिन

पुरानी मिसाइलों की होगी छुट्टी, 25 किमी दूर से ही दुश्मन के ड्रोन और विमानों को खाक कर देंगे भारतीय योद्धा; रक्षा मंत्रालय ने अपग्रेड के लिए जारी की निविदा

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
featured-img featured-img
IAF का किलर अपग्रेड: अब मिग-29 और जगुआर से बचना नामुमकिन, नई मिसाइलों से बढ़ी मारक क्षमता। फोटो क्रेडिट: भारतीय वायुसेना (IAF)
Advertisement

Indian Air Force :भारतीय वायुसेना (IAF) अपनी हवाई सुरक्षा और मारक क्षमता को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए रणनीतिक कदम उठा रही है। वायुसेना के दो सबसे भरोसेमंद योद्धा मिग-29 (MiG-29) और जगुआर (Jaguar) अब नई पीढ़ी की एडवांस्ड एयर-टू-एयर मिसाइलों से लैस होने जा रहे हैं। रक्षा मंत्रालय (MoD) ने इन विमानों को आधुनिक 'हीट-सीकिंग' मिसाइलों के अनुकूल बनाने के लिए भारतीय उद्योगों से बोलियां आमंत्रित की हैं। इस अपग्रेड के बाद ये विमान न केवल अधिक घातक होंगे, बल्कि ड्रोन जैसे छोटे और रडार की पकड़ में न आने वाले खतरों को भी पलक झपकते ही मिट्टी में मिला देंगे।

मिग-29 : अब 'ASRAAM' से होगा अचूक निशाना

भारतीय वायुसेना अपने 56 सोवियत मूल के मिग-29 लड़ाकू विमानों के बेड़े को मॉडिफाई करने की योजना पर तेजी से काम कर रही है। इसमें 8 दो सीटों वाले ट्रेनर विमान भी शामिल हैं। इन विमानों में अब यूरोपीय रक्षा दिग्गज MBDA द्वारा निर्मित 'एडवांस्ड शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल' (ASRAAM) को एकीकृत किया जाएगा।

Advertisement

रेंज और मारक क्षमता में बड़ा बदलाव

वर्तमान में मिग-29 विमान रूसी मूल की R-63 हीट-सीकिंग मिसाइल का उपयोग करते हैं। इस मिसाइल की 'किल प्रोबेबिलिटी' यानी दुश्मन को मार गिराने की क्षमता लगभग 15 किलोमीटर तक सीमित है। इसके विपरीत, नई ASRAAM मिसाइल इस रेंज को सीधे 25 किलोमीटर तक ले जाएगी। यह 10 किलोमीटर का अतिरिक्त फासला हवाई युद्ध में 'गेम चेंजर' साबित होता है, क्योंकि यह पायलट को दुश्मन के करीब आए बिना उसे निशाना बनाने की सुविधा देता है।

Advertisement

अत्याधुनिक तकनीक से लैस

ASRAAM एक हाई-स्पीड, इन्फ्रारेड गाइडेड मिसाइल है। इसकी सटीकता और रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे अमेरिकी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान F-35 और यूरोपीय टाइफून जैसे आधुनिक विमानों में मुख्य हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। भारत के स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान 'तेजस' के लिए भी इसे पहले ही अपनाया जा चुका है।

जगुआर : विंग्स के ऊपर से बरसेगी मौत

वायुसेना के 74 जगुआर लड़ाकू विमानों को भी एक बड़े बदलाव की प्रक्रिया से गुजारा जा रहा है। इन विमानों को 'नेक्स्ट-जेनरेशन क्लोज कॉम्बैट मिसाइल' (NGCCM) और 'हेलमेट माउंटेड डिस्प्ले सिस्टम' (HMDS) के साथ अपग्रेड किया जा रहा है।

अनोखा मिसाइल कॉन्फ़िगरेशन

जगुआर की दुनिया भर में अपनी एक अलग पहचान है, खासकर भारतीय बेड़े की। आमतौर पर लड़ाकू विमानों में मिसाइलें पंखों के नीचे (Under-wing) लगाई जाती हैं, लेकिन भारतीय जगुआर में ये 'ओवर-द-विंग' यानी पंखों के ऊपर बने पायलोन पर लगाई जाती हैं। यह विशेष डिजाइन इसलिए बनाया गया था ताकि पंखों के नीचे की जगह का इस्तेमाल भारी बमों और एयर-टू-सरफेस हथियारों के लिए किया जा सके। नई मिसाइलें पुराने फ्रांसीसी 'मात्रा मैजिक' (Matra Magic) मिसाइलों की जगह लेंगी, जो अब आधुनिक खतरों के सामने पुरानी पड़ चुकी हैं।

क्यों जरूरी है यह अपग्रेड? आधुनिक खतरों का सामना

पिछले कुछ वर्षों में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। अब खतरा केवल बड़े लड़ाकू विमानों से नहीं है, बल्कि छोटे ड्रोन (Drones), यूएवी (UAVs) और ऐसे हवाई प्लेटफॉर्म से है जिनका 'रडार सिग्नेचर' बहुत कम होता है।

  • ड्रोन हंटर : नई मिसाइलें इन्फ्रारेड गाइडेड तकनीक पर आधारित हैं, जो दुश्मन के इंजन की गर्मी को पहचानकर उसका पीछा करती हैं। यह छोटे ड्रोन्स को नष्ट करने में बेहद प्रभावी हैं।
  • काउंटर-मेजर रेजिस्टेंस : आधुनिक युद्ध में विमान 'फ्लेयर्स' और अन्य तकनीकों का उपयोग करके मिसाइलों को चकमा देते हैं। नई पीढ़ी की मिसाइलें इन बाधाओं को पार करने और लक्ष्य पर टिके रहने में अधिक सक्षम हैं।
  • कम दृश्यता वाले लक्ष्य : रडार की पकड़ में न आने वाले 'स्टील्थ' खतरों को भी ये 'हीट-सीकिंग' मिसाइलें आसानी से ट्रैक कर सकती हैं।

इतिहास और भविष्य का संतुलन : सेवा के चार दशक

भारतीय वायुसेना में जगुआर विमानों को 1979 में शामिल किया गया था, जबकि मिग-29 विमानों का बेड़ा 1986 से देश की रक्षा कर रहा है। पिछले चार दशकों में इन विमानों ने लगभग हर प्रमुख सैन्य अभियान में अपनी भूमिका निभाई है। 1999 के कारगिल युद्ध से लेकर 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक और 2025 के ऑपरेशन सिंदूर तक, इन विमानों ने अपनी स्ट्राइक क्षमता का लोहा मनवाया है।

वायुसेना की योजना के अनुसार, इन विमानों को अगले दशक (2030 के बाद) के अंत तक धीरे-धीरे सेवामुक्त (Retire) किया जाना है। हालांकि, तब तक इन्हें आधुनिक हथियारों और मिसाइलों से लैस रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि भारतीय आकाश की सुरक्षा में कोई 'गैप' नहीं आना चाहिए।

Advertisement
×