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Explainer: गोलखाते से व्यक्तिगत खातों तक... उत्तराखंड में चकबंदी की जमीनी जंग

Uttarakhand Land Consolidation Drive: उत्तराखंड आंदोलन के दौरान जान की बाजी लगाने वालों ने इसी उम्मीद से मुहिम वह चलाई थी कि आखिर यहां के लोगों की समस्याओं का यहां की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार समाधान हो सके। राज्य बना,...

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सांकेतिक फोटो।
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Uttarakhand Land Consolidation Drive: उत्तराखंड आंदोलन के दौरान जान की बाजी लगाने वालों ने इसी उम्मीद से मुहिम वह चलाई थी कि आखिर यहां के लोगों की समस्याओं का यहां की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार समाधान हो सके। राज्य बना, सियासतदानों ने मलाई कूटी, लेकिन बड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया। हां इतना जरूर हुआ कि पलायन कर गये लोगों के पास जमीन खरीदारों के फोन आने लगे।

राज्य बनने से पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि यहां के लोग यहां की कमान संभालेंगे और यहां की परिस्थितियों को समझते हुए समस्याओं का समाधान निकालेंगे, लेकिन कई मामलों में लोग जिस मोड़ पर खड़े थे, वहीं रह गये। सुविधाओं की कवायद तो चली, लेकिन अपर्याप्त। अब ताजा मामला है चकबंदी का।

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यूं तो चकबंदी शब्द कोई नया नहीं है, लेकिन उत्तराखंड में इसकी व्यावहारिकता पर अक्सर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। तमाम किंतु-परंतु के बावजूद कुछ लोगों ने इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन बहुतायत को अभी इसमें एकजुट नहीं किया जा सका है। उत्तराखंड के दोनों मंडलों- कुमाऊं और गढ़वाल में चकबंदी मुहिम चल रही है, लेकिन जमीनें बिकने के ज्यादातर केस कुमाऊं क्षेत्र से आये हैं। जानकारों का कहना है कि चकबंदी उन मुहिमों में से एक है जिसके तहत पलायन रोकने या रिवर्स पलायन की कोशिशों को पंख लग सकें।

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इसलिए जरूरी माना जा रहा है जमीनों का एकीकरण

उत्तराखंड के बड़े हिस्से की भौगोलिक परिस्थिति पर गौर करेंगे तो यहां खेत दूर-दूर होते हैं। यानी किसी व्यक्ति का एक खेत कहीं और दूसरा उससे बहुत दूर कहीं। इसे ‘गोलखाते’ में बंटी जमीन कहते हैं। अब खेतों को पास-पास लाने के लिए 'चकबंदी मंच उत्तराखंड' के तहत लोगों को जागरूक किया जा रहा है। इसके लिए एक व्यक्ति को उसके खेत के पास ही दूसरों के खेतों का कानूनी हक उपलब्ध कराया जाएगा, जबकि दूसरी जगह उसके खेत उस व्यक्ति के होंगे जिसने यहां अपना अधिकार छोड़ा है। हालांकि मुहिम में बड़ी दिक्कत यह भी है कि एक जगह चकबंदी के लिए आठ से दस लोगों को तैयार करना पड़ रहा है। ऐसे में कई परिवार ऐसे हैं जो अनेक वर्षों से राज्य से बाहर रह रहे हैं। उनको बुलाना फिर इस कवायद में साथ लेकर चलना थोड़ा 'टेढ़ी खीर' साबित हो रहा है।

फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है

तमाम कठिन परिस्थितियों के बावजूद अनेक समाजसेवी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में किसानों के बिखरे खेतों को एक जगह पर लाने की यानी चकबंदी की मुहिम में लगे हैं। माना जा रहा है कि बंजर होते खेतों और भविष्य में और ज्यादा पलायन को रोकने के लिए यह अभियान कारगर हो सकता है। कहा यह भी जा रहा है कि अभी अलग-अलग खेत होने से भूमाफिया भी इसका फायदा उठा रहे हैं। वह आसपास के खेतों को खरीद ले रहे हैं, फिर बाकी लोगों को भी प्रलोभन देकर या डराकर खेत बेचने के लिए कहा जा रहा है।

आरोप है कि आसपास के कुछ लोग भी खेत बिकवाने में मददगार बन रहे हैं। चकबंदी कार्यकर्ता रानीखेत के पास डढूली ग्राम निवासी अशोक तिवारी बताते हैं कि कुमाऊं क्षेत्र के रानीखेत इलाके में झलोड़ी ग्रामसभा के केवलानंद तिवारी के नेतृत्व में अभी यह अभियान स्थानीय स्तर पर चल रहा है।

तिवारी ने 1985 से लोगों को जागरूक करने का काम शुरू किया था। दावा किया जा रहा है कि उन्हीं की टीम के प्रयासों से वर्ष 2016 में पहाड़ के लिए चकबंदी अधिनियम (एक्ट) पास हुआ। एक्ट लागू होने में भी अड़चन आ गयी क्योंकि मामला अदालत की चौखट तक जा पहुंचा। इसके बाद उन्होंने खुद ही लड़ाई लड़ी। इसके बाद ‘चकबंदी मंच’ बनाया गया।

समाधान के इस तरीके पर जोर

जानकार कहते हैं कि अब ‘चकबंदी मंच’ की ओर से लोगों को समझाया जा रहा है कि पहले सरकार गोलखातो से लोगों की जमीन उनके ब्यक्तिगत खातों में करे। असल में गोलखाते का मतलब है कि आसपास की जमीन का सामूहिक सरकारी कागज। जब जमीन व्यक्तिगत होगी तो इसके बाद लोग अपने बिखरे खेतों को खुद ही चकों में इकट्ठा कर लेंगे।

इसके लिए विशेष दिवस भी मना रहे हैं लोग

इस मुहिम में एक और नाम आता है गणेश गरीब का। उनके जन्मदिवस पर लोग चकबंदी संबंधी चर्चा करते हैं। साथ जुड़े लोगों का कहना है कि सामाजिक प्रयासों को अभी सरकार की तरफ से प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। गणेश गरीब अभियान से जुड़े लोग भी कहते हैं कि 44 सालों से चकबंदी के लिए आवाज उठाई जा रही है।

समस्याएं, समाधान और उम्मीद

कैश क्रॉप्स, पलायन रोकने और भूमाफियाओं से बचने के लिए चकबंदी को जरूरी बताया जा रहा है, लेकिन इस राह में कई समस्याएं भी आड़े आ रही हैं। बेशक भूमि सुधार अधिनियम 2016 लागू है, इसमें ग्राम सभा की सहमति को प्राथमिकता दी गयी है, लेकिन अनेक बार एक व्यक्ति की जमीन दो ग्राम सभाओं में होती है। ऐसे में दो-दो जगह से सहमति और अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने में दिक्कत होती है।

इसके अलावा भौगोलिक जटिलता, सही भूमि रिकॉर्ड की कमी के साथ ही स्थानीय लोगों में छोटे खेतों को छोड़ने या आपस में बदलने की हिचकिचाहट भी चुनौती है। मैदानी इलाकों में तो चकबंदी सफल रही है, लेकिन पहाड़ों में इस राह में कई कठिनाइयां हैं। वैसे चकबंदी कार्यकर्ता इस दिशा में काम कर रहे हैं, कुछ जगह सकारात्मक परिणाम भी दिख रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि लोग इसके लाभों को समझेंगे और चकबंदी के लिए आगे आएंगे। हालांकि पहाड़ में कई जगह लोग खेती-बाड़ी से ज्यादा हिमालयन व्यू पर जोर देते हैं। इसलिए कुछ परेशानियां यहां भी हैं।

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