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Ground Report : कचरे से ऊर्जा तक : पीसीएमसी बनाम डड्‌डूमाजरा....जहां डंपिंग ग्राउंड बना पावरहाउस

बायोमाइनिंग से बिजली तक-एक शहर की सफ़ाई की पूरी साइंस

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शहर का कचरा… जो बदबू, बीमारी और विवाद की वजह था, अब वही कचरा बिजली बनकर शहर को रोशन कर रहा है। सवाल ये नहीं कि कचरा कितना है, सवाल ये है कि उसे संभालने की सोच और तकनीक कितनी आधुनिक है। महाराष्ट्र के पिंपरी चिंचवाड़ में मोशी का वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट बता रहा है कि अगर नीयत, तकनीक और नीति एक साथ चलें, तो लैंडफिल भी लोड नहीं, लोडशेडिंग का समाधान बन सकता है।

चंडीगढ़ का डड्डूमाजरा आज भी आग, धुएं और स्वास्थ्य संकट की सुर्खियों में है, वहीं पीसीएमसी ने कचरे को संसाधन में बदलकर एक नया मॉडल खड़ा किया है। इस खास रिपोर्ट में बताएंगे कि कैसे कचरे से 14 मेगावाट बिजली बन रही है, लीगेसी वेस्ट कैसे लगभग खत्म हो चुका है, और क्यों चंडीगढ़ को अब पीसीएमसी से सबक लेने में देर नहीं करनी चाहिए।

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Waste to Power : भारत के शहरों में कचरा अब केवल सफाई की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह शहरी प्रशासन की सोच, तकनीक और दूरदृष्टि की परीक्षा बन चुका है। कहीं कचरे के पहाड़ आज भी शहरों पर भारी पड़ रहे हैं, तो कहीं वही कचरा बिजली, ऊर्जा और पर्यावरणीय समाधान में बदल रहा है। पुणे का पिंपरी-चिंचवाड़ नगर निगम (सीपीएमसी) और चंडीगढ़ का डड्‌डूमाजरा-ये दोनों उदाहरण भारत में कचरा प्रबंधन की दो अलग यात्राओं को दिखाते हैं।

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पीसीएमसी मोशी वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार-मोशी में लगभग 1,000 टन प्रतिदिन कचरा रीसाइकिल होता है। इसकी बिजली उत्पादन क्षमता 14 मेगावाट (MW) है, इसमें से करीब 2 मेगावाट बिजली प्लांट के आंतरिक संचालन में इस्तेमाल की जाती है, जबकि शेष बिजली नगर निगम की यूटिलिटीज़ को सप्लाई की जाती है। भविष्य में पीएमसीसी की विस्तार योजना है कि दूसरा वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट बनाने की जिससे 27 मेगावाट बिजली तैयार की जा सके।

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पिंपरी-चिंचवाड़ नगर निगम ने मोशी कचरा डिपो पर अत्याधुनिक वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजना स्थापित की है। मोशी प्लांट ने साबित किया है कि यदि योजना स्पष्ट हो और तकनीक मजबूत तो कचरा समस्या नहीं रहती बल्कि संसाधन बन सकती है। यह महाराष्ट्र का पहला ऐसा प्रोजेक्ट है जहां नगर निगम अपने ही शहर के कचरे से पैदा हुई बिजली का इस्तेमाल कर रहा है।

यह परियोजना अक्तूबर 2023 में एंटनी लारा रीन्यूएबल एनर्जी द्वारा बिल्ड ऑपरेट ट्रांसफर मॉडल पर शुरू की गई। 14 मेगावाट क्षमता वाला यह संयंत्र अब तक शहर के कचरे से 16.66 करोड़ यूनिट बिजली पैदा कर चुका है। इस प्रक्रिया में 3,41,111 मीट्रिक टन आरडीएफ (रिफ्यूज ड्राइव्ड फ्यूल) का उपयोग हुआ है। अपनी आंतरिक जरूरतें पूरी करने के बाद 15.57 करोड़ यूनिट बिजली महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी (एमएसईडीसीएल) के ग्रिड को दी जा चुकी है।

लीगेसी वेस्ट से लीगेसी मॉडल तक : वेस्ट टू एनर्जी का फॉर्मूला

मोशी में तैयार होने वाली बिजली का इस्तेमाल ओपन एक्सेस सिस्टम के तहत पीसीएमसी के रावेत और चिखली में स्थित जल शोधन संयंत्रों को किया जा रहा है। इसके अलावा कासरवाड़ी और चारोली के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स तथा थेरगांव अस्पताल में भी यहीं से बिजली सप्लाई होती है। योजना है कि जल्द ही वाईसीएम अस्पताल सहित छह और नगर निगम इकाइयों को भी इससे जोड़ा जाए।

हाल ही में पीआईबी महाराष्ट्र, पीआईबी चंडीगढ़ के साथ गये महिला पत्रकारों के एक डेलीगेशन ने वेस्ट टू एनर्जी प्लांट का दौरा कर इसकी तकनीक को करीब से जाना। पीसीएमसी के मुख्य अभियंता संजय कुलकर्णी कहते हैं कि पीसीएमसी को अब तक करीब 76.57 करोड़ रुपये की बचत हो चुकी है।

संजय कुलकर्णी के मुताबिक मोशी डिपो पर वर्षों से जमा लीगेसी वेस्ट अब लगभग खत्म होने की कगार पर है। उनके अनुसार बायोमाइनिंग की वैज्ञानिक प्रक्रिया और नई तकनीकों की वजह से पुराने कचरे का बड़ा हिस्सा हटाया जा चुका है। फ्लाई ऐश (हवा में उड़ने वाले कण) के प्रबंधन के लिए अपनाई गई नई तकनीक ने पर्यावरण पर पड़ने वाले इसके प्रभाव को खत्म किया है।

सूखा-गीला कचरा, आरडीएफ और बिजली : सफ़ाई की पूरी साइंस

मोशी में कचरा प्रबंधन केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। यहां कचरे को पहले सेग्रीगेट किया जाता है। यानी सूखा और गीला कचरा अलग किया जाता है। इसके लिए बहु-स्तरीय सेग्रीगेशन प्रक्रिया अपनाई गई है, घर और उद्योग स्तर पर अलगाव, कलेक्शन पॉइंट पर दोबारा छंटाई और फिर प्रोसेसिंग यूनिट में होता है इसका अंतिम वर्गीकरण। गीला कचरा बायोगैस और कम्पोस्ट के लिए जाता है, जबकि सूखा कचरा आरडीएफ यानी कचरा-जनित ईंधन में बदलकर बिजली उत्पादन का आधार बनता है।

बायोमाइनिंग इस पूरे मॉडल की रीढ़ है। वर्षों से दबे पड़े कचरे के पहाड़ा खोदकर पुराने कचरे को हवा और धूप की मदद से जैविक हिस्से को सड़ाया जाता है और धातु, प्लास्टिक व अन्य उपयोगी सामग्री को अलग किया जाता है। इससे न केवल जमीन दोबारा उपयोग के योग्य बनती है, बल्कि मिट्टी और भू-जल प्रदूषण भी कम होता है। बायोमाइनिंग से निकला आरडीएफ ऊर्जा उत्पादन में और मिट्टी जैसी सामग्री बागवानी व हरित परियोजनाओं में इस्तेमाल की जा रही है।

डड्डूमाजरा की चुनौती

अगर बात करें चंडीगढ़ के डड्डूमाजरा की तो यह आज भी कचरा प्रबंधन की चुनौती से जूझ रहा है। यह क्षेत्र दशकों से शहर का मुख्य डंपिंग ग्राउंड रहा है। रिहायशी इलाकों के बेहद करीब होने के कारण यहां बदबू, आग और स्वास्थ्य को पहुंचने वाले नुकसान से संबंधित शिकायतें भी आम बात हैं। डड्डूमाजरा में प्राथमिक लक्ष्य कचरे से ऊर्जा बनाना नहीं, बल्कि पुराने कचरे से छुटकारा पाना है।

चंडीगढ़ प्रशासन ने बड़े वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्र की जगह बायोमाइनिंग और बायोगैस/सीबीजी मॉडल को प्राथमिकता दी है। इसके पीछे एक बड़ी वजह जहां पर्यावरण संरक्षण है तो वहीं जनता का दबाव भी बड़ी वजह है। हालांकि अधिकारी कहते हैं कि देश के हर शहर के लिए एक जैसा कचरा प्रबंधन मॉडल काम नहीं कर सकता।

पीसीएमसी का मॉडल एक औद्योगिक शहर के लिए इसलिये भी बेहद उपयुक्त है क्योंकि वहां जमीन उपलब्ध है और ऊर्जा की मांग अधिक है। वहीं चंडीगढ़ जैसी ग्रीन और नियोजित सिटी में प्रदूषण को लेकर लोग बेहद सजग हैं । पीसीएमसी का दीर्घकालिक लक्ष्य पिंपरी-चिंचवाड़ को नेट ज़ीरो सिटी बनाना है, जहां ऊर्जा की जरूरतें कचरे और सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों से पूरी हों।

आखिर में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कचरे से बिजली बने या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या शहर समय रहते सही फैसले ले पा रहे हैं। मोशी का यह मॉडल दर्शाता है कि सही वक्त पर सही निवेश शहर का भविष्य बदल सकता है, जबकि डड्डूमाजरा की कहानी कहती है कि लापरवाही की कीमत पीढ़ियों तक चुकानी पड़ती है।

चंडीगढ़ को पीसीएमसी मॉडल से क्या सीखना चाहिए?

हेल्थ सबसे पहले : पीसीएमसी ने कचरा प्रबंधन को केवल सफ़ाई नहीं, बल्कि पब्लिक हेल्थ इशू की तरह ट्रीट किया। मोशी प्लांट में खुले डंप, जलते कचरे और बदबू को खत्म करने से श्वसन रोग, एलर्जी और जलजनित बीमारियों का जोखिम घटा।

चंडीगढ़ को भी ड्डूमाजरा को सिर्फ़ डंपिंग ग्राउंड नहीं, स्वास्थ्य जोखिम क्षेत्र मानकर काम करना होगा।

लीगेसी वेस्ट पर निर्णायक कार्रवाई

पीसीएमसी में बायोमाइनिंग के ज़रिये वर्षों पुराने कचरे को वैज्ञानिक ढंग से हटाया गया है। मुख्य इंजीनियर संजय कुलकर्णी के अनुसार हम पुराने डंप कचरे को लगभग रीट्रीट कर खत्म कर चुके हैं। इस दिशा में काम करने की इच्छाशक्ति रखते हुए चंडीगढ़ को टालमटोल छोड़कर टाइम-बाउंड बायोमाइनिंग प्लान बनाना होगा।

सेग्रीगेशन सिर्फ़ नारा नहीं, सिस्टम

पीसीएमसी में सूखा-गीला कचरा अलग करने के लिए घर से लेकर प्लांट तक मल्टी-फेज़ प्रोसेस है। चंडीगढ़ में भी सेग्रीगेशन की निगरानी और पेनेल्टी–इंसेंटिव मॉडल और मजबूत करने की जरूरत है।

कचरे से बिजली- पर्यावरण भी अर्थव्यवस्था भी

मोशी वेस्ट टू एनर्जी प्लांट से 14 मेगावाट (MW) बिजली बन रही है, जिसेस उसे 76 करोड़ से अधिक की बचत हो चुकी है, लिहाड़ा चंडीगढ़ को भी कचरे को बोझ नहीं, अर्बन रिसोर्स मानना होगा।

फ्लाईऐश की नई तकनीक

पीसीएमसी ने बची हुई राख के सुरक्षित निपटान के लिए नई तकनीक अपनाई, जिससे मिट्टी और भूजल पर असर कम हुआ। चंडीगढ़ को भी सेकेंडरी पॉल्यूशन पर फोकस बढ़ाने पर काम करना होगा।

पीसीएमसी को लक्ष्य हासिल करने में नेट जीरो सिटी, बीओटी मॉडल, तकनीक और प्रशासनिक स्पष्टता ने मदद दी, वहीं चंडीगढ़ को भी दीर्घकालिक विज़न और प्रोफेशनल मॉडल अपनाना होगा क्योंकि पीसीएमसी उदाहरण है कि समस्या कचरे की नहीं, नीति, नीयत और प्रबंधन की होती है। अगर चंडीगढ़ मोशी मॉडल से सीखे, तो डड्डूमाजरा संकट नहीं, समाधान बन सकता है। बड़ा सवाल है कि क्या चंडीगढ़ अभी पुराने तरीकों पर चलेगा, या पीसीएमसी मॉडल से कुछ सीखकर स्मार्ट सिटी के तौर पर अपनी पहचान बनाएगा ?

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