Green Hydrogen Ecosystem : ग्रीन हाइड्रोजन पर चंडीगढ़ में बनी बड़ी रणनीति, उत्तर भारत के लिए क्या है प्लान?
पहली नॉर्दर्न स्टेकहोल्डर कन्वर्जेंस में सरकार, उद्योग और वैज्ञानिक एक मंच पर आए; पांच संस्थानों से एमओयू, शोध से तकनीक और कौशल विकास तक सहयोग पर जोर
Green Hydrogen Ecosystem : उत्तर भारत में ग्रीन हाइड्रोजन का मजबूत इकोसिस्टम विकसित करने की दिशा में चंडीगढ़ से नई पहल शुरू हुई है। पंजाब यूनिवर्सिटी में आयोजित पहली नॉर्दर्न स्टेकहोल्डर कन्वर्जेंस में सरकार, उद्योग, वैज्ञानिकों, शोध संस्थानों और शिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधि एक मंच पर आए। इसमें ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, तकनीक, बुनियादी ढांचे, निवेश और कौशल विकास को एक-दूसरे से जोड़ने पर चर्चा हुई। सम्मेलन में पांच संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापन यानी एमओयू भी किए गए।
यह कार्यक्रम पीयू-आईआईटी रोपड़ रीजनल एक्सेलेरेटर फॉर होलिस्टिक इनोवेशंस (पीआई-राही) फाउंडेशन के नॉर्दर्न रीजन एसएंडटी क्लस्टर ने पंजाब एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी (पेडा), इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएनएसटी), मोहाली और अटल इनक्यूबेशन सेंटर-इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (एआईसी-आईएसबी) के सहयोग से आयोजित किया। इसे रूसा 2.0 का समर्थन मिला।
ग्रीन हाइड्रोजन के लिए साथ काम क्यों जरूरी ?![]()
कार्यक्रम की अध्यक्षता पंजाब यूनिवर्सिटी की कुलपति प्रो. मीनाक्षी गोयल ने की। उन्होंने ऊर्जा और टिकाऊ विकास से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के बीच सहयोग और नवाचार की जरूरत बताई। उन्होंने ग्रीन हाइड्रोजन के इकोसिस्टम को आगे बढ़ाने में नई तकनीकों की भूमिका पर भी जोर दिया।
सीआईआई चंडीगढ़ के चेयरमैन एवं स्प्रे इंजीनियरिंग डिवाइसेज लिमिटेड के प्रबंध निदेशक विवेक वर्मा ने उत्तर भारत में ग्रीन हाइड्रोजन की मांग और उद्योग में इसके इस्तेमाल की संभावनाओं पर उद्योग का दृष्टिकोण रखा। हीरो फ्यूचर एनर्जीज के उपाध्यक्ष संदीप गुप्ता ने तकनीक अपनाने और भारत के टिकाऊ ऊर्जा की ओर बढ़ने में उद्योग की भूमिका पर विचार साझा किए।
क्या है हाइड्रोजन वैली मॉडल ?
सम्मेलन में हाइड्रोजन वैली मॉडल पर विशेष चर्चा हुई। सरल शब्दों में इसे ऐसे क्षेत्रीय इकोसिस्टम के रूप में समझा जा सकता है, जहां हाइड्रोजन के उत्पादन, भंडारण, परिवहन और इस्तेमाल से जुड़ी गतिविधियों को आपस में जोड़ा जाता है।
पुणे हाइड्रोजन वैली के सीईओ डॉ. विष्णु बुडामा ने भारत में हाइड्रोजन वैली इकोसिस्टम की संभावनाओं पर जानकारी दी। आईआईटी मंडी के प्रो. प्रेम फेलिक्स सिरिल, आरवीसीई बेंगलुरु के डॉ. उज्ज्वल मेडा, प्लाक्षा यूनिवर्सिटी के डॉ. विशाल गर्ग, पंजाब यूनिवर्सिटी के डॉ. संजीव गौतम और आईआईटी रोपड़ के प्रो. प्रसेनजीत मंडल ने शोध, बुनियादी ढांचे और तकनीकी एकीकरण पर विचार रखे।
पेडा के अतिरिक्त निदेशक सुपिंदर सिंह और मनी खन्ना तथा यूटी प्रशासन के राजनिश शर्मा, आईएफएस और हरदयाल, आईएफएस भी चर्चा में शामिल हुए। इस दौरान उत्तर भारत में आपस में जुड़ी हाइड्रोजन वैल्यू चेन विकसित करने की संभावनाओं पर विचार किया गया।
ग्रीन हाइड्रोजन हब कहां और कैसे बनेंगे ?
तकनीकी सत्र में भारत में ग्रीन हाइड्रोजन हब विकसित करने के लिए डेटा आधारित रणनीति तैयार करने पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता, उद्योगों की जरूरत, संभावित मांग, बुनियादी ढांचे और तकनीकी क्षमता जैसे पहलुओं का आकलन जरूरी है।
डब्ल्यूआरआई इंडिया के अनुराग नल्लापनेनी, आईआईटी बॉम्बे के प्रो. प्रकाश घोष, सीएसआईआर-सीएसआईओ की वैज्ञानिक-एफ डॉ. पूजा देवी, एन्वीकैटलिस्ट वसुंधरा के तकनीकी निदेशक अजय भारत अरोड़ा और नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के रजत भटनागर ने इस विषय पर विचार रखे।
हाइड्रोकार्बन सेक्टर स्किल काउंसिल के पूर्व सीईओ एस.के. बोस ने उत्तर भारत के लिए ग्रीन हाइड्रोजन कॉरिडोर की अवधारणा पर चर्चा की। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा, सरकारी नीतियों और उद्योग को जोड़कर क्षेत्रीय स्तर पर ग्रीन हाइड्रोजन के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया गया।
एआई और नई तकनीक पर भी चर्चा
इंडस्ट्री टेक्नोलॉजी फायरसाइड चैट में ग्रीन हाइड्रोजन तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने की संभावनाओं पर चर्चा हुई। इसमें तकनीकी समाधान, तकनीक को अपनाने, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तरीकों और नए कारोबारी मॉडल पर विचार साझा किए गए।
गोडावरी बायोरिफाइनरीज लिमिटेड की कार्यकारी निदेशक डॉ. संगीता श्रीवास्तव, जिंदल स्टील लिमिटेड के प्रशांत द्विवेदी, ट्रूआरई-ओरियाना पावर लिमिटेड के आशीष चौहान, रेज पावर इंफ्रा लिमिटेड के टेक्नोलॉजी उपाध्यक्ष डॉ. धीरेंद्र दुबे और सारथी ग्रीन (एसजीटी) हाइड्रोएज के निदेशक आलोक कुमार ने चर्चा में हिस्सा लिया। ब्रिटेन की कोरिजांस से विन प्रिचर्ड और सुरेश रुक्मांगथन ने भी अंतरराष्ट्रीय अनुभव साझा किए।
पांच संस्थानों के साथ एमओयू
कार्यक्रम में पीआई-राही ने पांच संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इनमें पंजाब बायोटेक्नोलॉजी इनक्यूबेटर, मोहाली; इंटेलिजेंट मैटेरियल्स प्राइवेट लिमिटेड (नैनोशेल), डेराबस्सी; आर.वी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, बेंगलुरु; हस्केज इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड, आईआईटी रोपड़ और उद्जन सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा शामिल हैं।
इन साझेदारियों का उद्देश्य शोध, तकनीकी विकास, नवाचार, क्षमता निर्माण और तकनीक को प्रयोगशाला से व्यावहारिक इस्तेमाल तक ले जाने में सहयोग बढ़ाना है। स्वच्छ ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन से जुड़े संभावित अनुप्रयोगों पर भी संयुक्त रूप से काम किया जाएगा।
अब पायलट प्रोजेक्ट और निवेश पर जोर
कार्यक्रम के अंतिम सत्र में सरकार, उद्योग, अकादमिक जगत, एक्सेलेरेटर और नवोन्मेषकों ने उत्तर भारत के लिए आगे की दिशा पर चर्चा की। इसमें संयुक्त शोध, पायलट प्रोजेक्ट, बुनियादी ढांचे का विकास, निवेश जुटाने, तकनीक अपनाने और कौशल विकास को प्रमुख क्षेत्र के रूप में सामने रखा गया।
पीआई-राही के अनुसार, नॉर्दर्न रीजन एसएंडटी क्लस्टर के माध्यम से वैज्ञानिक शोध और औद्योगिक जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल बनाने, तकनीक आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देने और ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र के लिए प्रशिक्षित कार्यबल तैयार करने पर काम किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य ग्रीन हाइड्रोजन पर चर्चा तक सीमित रहने के बजाय शोध, उद्योग, सरकार, निवेश और प्रशिक्षित मानव संसाधन को एक साझा इकोसिस्टम से जोड़ना है।

