Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
Add Tribune As Your Trusted Source
search-icon-img
Advertisement

दादी ने अखबार पढ़ना सिखाया, उसी आदत ने सिद्धांत जैन को IPS बनने की राह दिखाई

हरियाणा के आईपीएस अधिकारी सिद्धांत जैन बताते हैं कि दादी से मिली अखबार पढ़ने की आदत ने देश-दुनिया को समझने की जिज्ञासा जगाई और कुछ बड़ा करने का सपना मजबूत किया

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

News Paper Reading Habit : एक समय था जब सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ना लाखों घरों की दिनचर्या का हिस्सा हुआ करता था। बच्चे सुर्खियां पढ़ते थे, युवा देश-दुनिया की घटनाओं को समझते थे और बुजुर्ग संपादकीय व सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करते थे। आज खबरें मोबाइल स्क्रीन पर कुछ सेकंड में सामने आ जाती हैं। ऐसे में सवाल है कि सूचना की इस तेज रफ्तार के बीच क्या पढ़ने, समझने और सोचने की आदत पीछे छूट रही है?

हरियाणा के आईपीएस अधिकारी सिद्धांत जैन की कहानी इस सवाल का एक प्रेरक जवाब देती है। वह बताते हैं कि उन्हें अखबार पढ़ने की प्रेरणा अपनी दादी से मिली। अखबार पढ़ते-पढ़ते देश-दुनिया को जानने की जिज्ञासा बढ़ी और कुछ बड़ा करने की इच्छा मजबूत हुई। यही पढ़ने की आदत आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और लक्ष्य का हिस्सा बनी। वर्तमान में सिद्धांत जैन हिसार के एसपी हैं।

Advertisement

दादी की आदत बनी जीवन की प्रेरणा

सिद्धांत जैन का अनुभव बताता है कि जीवन की दिशा बदलने वाली प्रेरणा हमेशा किसी बड़े मंच से नहीं मिलती। कई बार घर का कोई बुजुर्ग एक ऐसी आदत डाल देता है, जिसका असर वर्षों तक रहता है।

Advertisement

दादी के अखबार पढ़ने के लगाव ने सिद्धांत जैन को भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया। अखबार के जरिये उनके सामने देश, समाज, प्रशासन और रोजमर्रा की घटनाओं की दुनिया खुली। खबरों को पढ़ने और समझने की यह आदत धीरे-धीरे जिज्ञासा में बदली।

अखबार की खासियत भी यही है। वह केवल यह नहीं बताता कि क्या हुआ, बल्कि खबर के कारण और उसके संभावित असर को समझने का अवसर भी देता है। एक खबर पढ़कर पैदा हुआ सवाल दूसरी खबर तक ले जाता है और यही प्रक्रिया सोच को विस्तार देती है।

मोबाइल में सूचना की भरमार, लेकिन क्या पढ़ने का समय कम?

मोबाइल फोन ने सूचना की दुनिया को हमारी हथेली तक पहुंचा दिया है। सोशल मीडिया पर हर पल नई खबर, वीडियो और पोस्ट सामने आती है। किसी घटना के बारे में जानने के लिए अगले दिन के अखबार का इंतजार नहीं करना पड़ता।

लेकिन सूचना की अधिकता के बीच ठहरकर पढ़ने और किसी विषय को समझने का समय कितना बचा है, यह बड़ा सवाल है।

सोशल मीडिया पर सामग्री तेजी से बदलती रहती है। एक खबर के बाद दूसरी और एक वीडियो के बाद दूसरा वीडियो सामने आता है। इसके विपरीत अखबार में राजनीति, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, पर्यावरण, न्यायपालिका, खेल, समाज और स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें एक साथ मिलती हैं। पाठक को उन विषयों से भी रूबरू होने का मौका मिलता है, जिन्हें वह शायद खुद कभी खोजने न जाए। यही विविधता सोच का दायरा बढ़ाती है।

प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए क्यों जरूरी है अखबार ?

UPSC, HPSC, SSC, बैंकिंग, रेलवे और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए नियमित अखबार पढ़ना उपयोगी हो सकता है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, सरकारी योजनाएं, अर्थव्यवस्था, न्यायपालिका, विज्ञान, पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों से जुड़े विषयों को समझने में अखबार मदद कर सकता है।

अखबार पढ़ने का फायदा केवल करंट अफेयर्स तक सीमित नहीं है। खबर पढ़ते हुए विद्यार्थी उसके कारण और संभावित प्रभाव पर विचार करना सीखता है। यही विश्लेषण की आदत आगे चलकर निबंध लेखन और साक्षात्कार में उपयोगी हो सकती है।

खबर पढ़ने से आगे, सवाल पूछने की आदत

अखबार पढ़ने वाला पाठक केवल यह जानकर आगे नहीं बढ़ता कि आज क्या हुआ। कई बार खबर उसके मन में नए सवाल भी पैदा करती है—

  1. यह फैसला क्यों लिया गया ?
  2. इस योजना का लाभ किसे मिलेगा ?
  3. किसी नीति का आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा ?
  4. इस समस्या का समाधान क्या हो सकता है ?
  5. प्रशासन को क्या कदम उठाने चाहिए ?

ऐसे सवाल एक सामान्य पाठक को जागरूक नागरिक बनने में मदद करते हैं। लोकतंत्र में सरकार के फैसलों, समाज में हो रहे बदलावों और अपने आसपास की समस्याओं की जानकारी रखना नागरिक जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अखबार भाषा और अभिव्यक्ति का भी शिक्षक

पढ़ने की आदत का असर केवल सामान्य ज्ञान तक सीमित नहीं रहता। नियमित अखबार पढ़ने से शब्द भंडार बढ़ सकता है और विचारों को व्यवस्थित ढंग से व्यक्त करने की क्षमता विकसित हो सकती है।

मोबाइल और सोशल मीडिया पर संक्षिप्त भाषा का इस्तेमाल आम है। ऐसे में समाचार, रिपोर्ट और संपादकीय पढ़ने से बच्चे और युवा शब्दों के सही इस्तेमाल, वाक्य संरचना और अलग-अलग विषयों को प्रस्तुत करने के तरीके से परिचित होते हैं। पढ़ने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे बेहतर समझने, लिखने और अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने की क्षमता विकसित कर सकता है।

स्थानीय खबरों से अपने समाज को समझना

अखबार की अहमियत सिर्फ बड़ी राष्ट्रीय खबरों तक सीमित नहीं है। स्थानीय समाचार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। आपके शहर की सड़कें किस स्थिति में हैं? कहां पानी या बिजली की समस्या है? अस्पतालों में क्या सुविधाएं उपलब्ध हैं? स्कूल और कॉलेज किन समस्याओं से जूझ रहे हैं? प्रशासन कौन-से विकास कार्य कर रहा है? स्थानीय लोगों की प्रमुख समस्याएं क्या हैं?

इन सवालों के जवाब स्थानीय समाचारों में मिलते हैं। अपने आसपास की घटनाओं और समस्याओं से परिचित हुए बिना अपने समाज को समझना मुश्किल है।

मोबाइल को छोड़ना नहीं, पढ़ने की आदत लौटाना जरूरी

आज मोबाइल को पूरी तरह छोड़ना न संभव है और न जरूरी। जरूरत इस बात की है कि मोबाइल के साथ पढ़ने के लिए भी समय निकाला जाए।  घर में रोज 20-30 मिनट अखबार पढ़ने की आदत इसकी शुरुआत हो सकती है। माता-पिता खुद पढ़ेंगे तो बच्चों में भी पढ़ने की रुचि पैदा हो सकती है। घर में खबरों पर चर्चा होगी तो बच्चों को सवाल पूछने और अपनी राय रखने का अवसर मिलेगा।

अखबार पढ़ने से सामान्य ज्ञान और समसामयिक घटनाओं की समझ मजबूत हो सकती है। भाषा और शब्द भंडार बेहतर हो सकता है। लेखन और विश्लेषण की क्षमता विकसित हो सकती है। सबसे बढ़कर, व्यक्ति अपने आसपास और देश-दुनिया में हो रहे बदलावों को समझने की कोशिश करता है।

एक अखबार, एक आदत और बदलती जिंदगी

सिद्धांत जैन की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि उनके लिए अखबार सिर्फ कागज के पन्ने नहीं था। दादी से मिली एक छोटी-सी आदत ने उन्हें पढ़ने, जानने और समझने की दिशा दी। इसी प्रक्रिया में उनके भीतर कुछ बड़ा करने की इच्छा मजबूत हुई और आज वह भारतीय पुलिस सेवा में जिम्मेदारी निभा रहे हैं। हरियाणा पुलिस के रिकॉर्ड में भी सिद्धांत जैन को 2018 बैच के आईपीएस अधिकारी और एसपी हिसार के रूप में दर्ज किया गया है।

आज की युवा पीढ़ी के सामने विकल्प पहले से कहीं अधिक हैं। मोबाइल पर दुनिया की जानकारी एक क्लिक में उपलब्ध है। लेकिन इस तेज सूचना युग में ठहरकर पढ़ना और किसी विषय को समझना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।

रील कुछ सेकंड के लिए ध्यान खींच सकती है, लेकिन एक अच्छा लेख लंबे समय तक सोचने पर मजबूर कर सकता है। मोबाइल खबर दिखा सकता है, लेकिन पढ़ने की आदत उस खबर पर सवाल करने और उसके असर को समझने की क्षमता विकसित कर सकती है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि अखबार बेहतर है या मोबाइल। असली सवाल यह है कि क्या हम सूचना पाने के साथ उसे समझने के लिए भी समय निकाल रहे हैं?

संभव है कि आज अखबार का एक पन्ना पढ़ रहा कोई बच्चा कल IAS, IPS, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या किसी अन्य क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए। सिद्धांत जैन की कहानी कम से कम यह संदेश जरूर देती है कि पढ़ने की एक छोटी-सी आदत भी जिंदगी की दिशा बदल सकती है।

Advertisement
×