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JNPA से VADHVAN तक -भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था की बदलती तस्वीर

Ports, Shipping और Maritime Logistics

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चंडीगढ़ से गई महिला पत्रकारों को जेएनपीए और वाधवां के बारे में जानकारी देतीं जवाहर लाल नेहरू पोर्ट अऑरिटी की जनरल मैनेजर मनीषा जाधव और ट्रैफिक एडवाइजर नागेश अकुडे।-ट्रिन्यू
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देश की विकास गाथा अब सिर्फ ज़मीन पर नहीं लिखी जा रही, अब इसकी एक मज़बूत इमारत समंदर के किनारे  ( JNPA से VADHVAN तक ) भी आकार ले रही है। जहां क्रेनों की गूंज, कंटेनरों की कतारें और लहरों पर चलते जहाज़ डिजिटल स्क्रीन पर चमकते आंकड़ों के साथ देश की आर्थिक दिशा तय कर रहे हैं। केंद्रीय बजट 2026 ने इस हकीकत पर मुहर लगा दी है कि भारत अब बंदरगाहों को सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की रणनीतिक धुरी मान रहा है। ये साफ संकेत है कि सरकार की नज़र अब पूरी तरह ब्लू इकॉनमी पर टिक चुकी है।

ट्रिब्यून की वरिष्ठ पत्रकार कविता राज  PIB महाराष्ट्र और चंडीगढ़ के साथ देश के सबसे बड़े कंटेनर हेंडलिंग और पहले 100 फीसदी लैंडलोर्ड पोर्ट जेएनपी ( जवाहर लाल नेहरू पोर्ट) और पहले सैटेलाइट पोर्ट वाधवां का दौरा कर लौटी हैं। जहां उन्होंने अधिकारियों से बातचीत कर ये जाना कि भारत के बंदरगाह कैसे अर्थव्यवस्था की रीढ़ मजबूत कर रहे हैं, देश का समुद्री भविष्य कैसे नया आकार ले रहा है। पढ़िये ये विशेष रिपोर्ट।--------------

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Ports, Shipping और Maritime Logistics-JNPA से VADHVAN तक

देश के आर्थिक नक्शे में अगर बीते कुछ वर्षों में कोई सेक्टर सबसे तेज़ी से उभरा है, तो वह है बंदरगाह, शिपिंग और मेरीटाइम लॉजिस्टिक्स । ( Ports, Shipping और Maritime Logistics)

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कभी बंदरगाह सिर्फ माल उतारने–चढ़ाने की जगह थे, आज वही बंदरगाह देश का विकास इंजन बन चुके हैं। इस बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर दिखती है देश के सबसे बड़े कंटेनर पोर्ट  जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी, यानी जेएनपीए और उसके भविष्य के विस्तार वाधवां सैटेलाइट पोर्ट में।

जेएनपीए से वाधवां तक
VADHVAN SETTELITE PORT

केंद्रीय बजट 2026 में ₹5,164.8 करोड़ का पोर्ट एंड शिपिंग एलोकेशन किया गया है। कुल केपेक्स बढ़ाकर ₹12.2 लाख करोड़ किया गया है। अगले 5 सालों में 20 नए राष्ट्रीय जलमार्ग बनाने का लक्ष्य है, साथ ही कोस्टल कार्गो प्रमोशन स्कीम, 10,000 करोड़ की कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग योजना को अमलीजामा पहनाने की कोशिश होगी। इसके अलावा इनलैंड शिप रिपेयर हब्स वाराणसी और पटना में बनेंगे। साफ है कि नीति, तकनीक और गति तीनों का संगम बन चुके हैं भारत के बंदरगाह और इसी तरक्की का अगला बड़ा अध्याय है देश का पहला सैटेलाइट पोर्ट वाधवां।

जेएनपीए देश का सबसे बड़ा कंटेनर हेंडलिंग, 100% लैंडलोर्ड पोर्ट

देश में 12 प्रमुख बंदरगाह हैं। इनमें  दीनदयाल बंदरगाह (कांडला) – गुजरात,  मुंबई बंदरगाह न्यास – महाराष्ट्र,  सबेस बड़े कंटेनर हेंडलिंग पोर्ट जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह न्यास (जेएनपीटी / नेवा शेवा) – महाराष्ट्र,  मोरमुगांव बंदरगाह – गोवा,  न्यू मंगलूरु बंदरगाह – कर्नाटक,  श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह (कोलकाता) – पश्चिम बंगाल,  कोचीन बंदरगाह – केरल,  चेन्नई बंदरगाह – तमिलनाडु,  कामराजार बंदरगाह (एन्नोर) – तमिलनाडु के अलावा  पारादीप बंदरगाह – ओडिशा,   विशाखापट्टनम बंदरगाह – आंध्र प्रदेश,  तूतुकुडी / वी.. चिदंबरनार बंदरगाह – तमिलनाडु शामिल हैं। देश के पहले सैटेलाइट पोर्ट के रूप में विकसित हो रहे वाधवां प्रोजेक्ट पर तेज़ी से काम चल रहा है। जेएनपीए की जनरल मैनेजर मनीषा जाधव के मुताबिक इसका पहला चरण 2029 तक पूरा होने की उम्मीद है।

चंडीगढ़ से गई
चंडीगढ़ से गई महिला पत्रकारों को जेएनपीए और वाधवां के बारे में जानकारी देतीं जवाहर लाल नेहरू पोर्ट अऑरिटी की जनरल मैनेजर मनीषा जाधव और ट्रैफिक एडवाइजर नागेश अकुडे।-ट्रिन्यू

पिछले तीन दशकों से JNPA भारत के समुद्री व्यापार की रीढ़ बना हुआ है। यही वह बंदरगाह है जिसने देश को कंटेनर युग में प्रवेश कराया, पश्चिमी भारत को वैश्विक व्यापार से जोड़ा और आयात-निर्यात  के लिए एक भरोसेमंद गेटवे तैयार किया। आज इसकी कंटेनर हैंडलिंग क्षमता  8.4 मिलियन टीईयू  से बढ़कर 10.4 मिलियन टीईयू (TEUs) तक पहुंच चुकी है।

हालांकि मुंबई के बाहर समंदर के अंदर से लिखी जाने वाली विकास की इस इबारत के विस्तार के साथ चुनौतियां भी बढ़ीं । नतीजा 24 घंटे तक इंतज़ार करते ट्रक, टर्मिनल के भीतर खाली स्लॉट, बाहर ट्रैफिक, प्रदूषण, ईंधन की बर्बादी और पार्किंग और ड्राइवरों की समस्या।  यह सब जेएनपीए के सामने खड़ी उस चुनौती का हिस्सा था जिसे बदले बिना आगे बढ़ना संभव नहीं था। इसी समस्या से निजात पाने के लिये   तकनीक के साथ कदमताल करते हुए जेएनपीए फिर सीपीपी, सेंट्रलाइज्ड पार्किंग प्लाजा लेकर आया...

सेंट्रलाइज्ड पार्किंग प्लाजा (सीपीपी)

CPP IN JNPA
CPP IN JNPA

जेएनपीए के ट्रैफिक एडवाइज़र नागेश अकुडे बताते हैं कि सीपीपी (CPP)  ने पूरी लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित कर दिया। सीपीपी एक ऐसा सिस्टम है जो ट्रकों को रोकता नहीं, बल्कि उन्हें सही समय पर, सही क्रम में आगे बढ़ाता है। डिजिटल और आरएफआईडी पर आधारित इस मॉडल के बाद ट्रक के लोड और अनलोड होने का औसत समय 24 घंटे से घटकर 5.5 घंटे रह गया, वहीं पार्किंग की समस्या खत्म हो गई। यहां रीफर कंटेनरों के लिये अलग जोन बनाया गया। सीपीपी में एक साथ 2800 से अधिक कंटेनर लोडेड ट्रकों को  व्यवस्थित तरीके से संभालने की क्षमता ने जेएनपीए की परिचालन दक्षता को पूरी तरह बदल दिया।

ट्रैफिक एडवाइज़र नागेश अकुडे का कहना है कि सीपीपी के बनने से लंबे जाम से मुक्ति मिली,  ईंधन की बर्बादी कम हुई, कार्बन उत्सर्जन घटा और ड्राइवरों के लिए पहली बार कैंटीन और विश्राम जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हुईं। साथ ही करीब दो सौ स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिला।

सीपीपी के एमडी राजेंद्र साल्वे इसे लॉजिस्टिक्स वर्कफ्लो का री-डिज़ाइन कहते हैं। उनके यह वह पक्ष है जो बजट भाषणों में अक्सर नहीं दिखता, लेकिन जमीनी स्तर पर विकास की असली तस्वीर पेश करता है।

हालांकि, वैश्विक व्यापार के बदलते स्वरूप ने यह भी साफ कर दिया कि भविष्य सिर्फ एक मेगा पोर्ट पर नहीं टिका रह सकता। समंदर के अंदर जहाजों की संख्या और आकार दोनों बढ़ रहे हैं। नतीजा डीप ड्राफ्ट की मांग भी बढ़ी है।

JNPA से VADHVAN तक - देश का पहला सैटेलाइट पोर्ट वाधवां

चंडीगढ़ से गई महिला पत्रकारों को जेएनपीए और वाधवां के बारे में जानकारी देतीं जवाहर लाल नेहरू पोर्ट अऑरिटी की जनरल मैनेजर मनीषा जाधव ।-ट्रिन्यू
चंडीगढ़ से गई महिला पत्रकारों को जेएनपीए और वाधवां के बारे में जानकारी देतीं जवाहर लाल नेहरू पोर्ट अऑरिटी की जनरल मैनेजर मनीषा जाधव ।-ट्रिन्यू

महाराष्ट्र के पालघर ज़िले में, मुंबई से लगभग 150 किलोमीटर उत्तर में बन रहा है , देश का पहला सैटेलाइट पोर्ट, वाधवां। इसे  रणनीतिक रूप से इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह जेएनपीए पर बढ़ते लोड को कम कर सके। जनरल मैनेजर मनीषा जाधव बताती हैं कि 2029 में इसका पहला चरण पूरा होगा।

मनीषा जाधव कहती हैं कि वाधवां पोर्ट  देश  का 13वां प्रमुख बंदरगाह है। यह 21वीं सदी का 100% ग्रीन पोर्ट है, जो ऑल-वेदर डीप ड्राफ्ट पोर्ट के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह पोर्ट उन बड़े कंटेनर जहाज़ों को सीधे हैंडल कर सकेगा, जिनके लिए मौजूदा बंदरगाहों पर सीमित गहराई और कम जगह बड़ी चुनौती है।

वाधवां की कंटेनर हेंडलिंग क्षमता होगी 24.5 मिलियन टीईयू

जेएनपीए से वाधवां तक

वाधवां ( Vadhavan Port ) की प्रस्तावित कंटेनर हैंडलिंग क्षमता लगभग 24.5 मिलियन TEUs बताई जा रही है। यानी क्षमता के लिहाज़ से यह पोर्ट न सिर्फ जेएनपीए (JNPA) का सहायक होगा बल्कि भविष्य में दुनिया के टॉप-10 कंटेनर पोर्ट्स में शामिल होने की क्षमता रखेगा। यह भारत के समुद्री व्यापार को एक नया वैश्विक दर्जा दिलाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। खास बात यह है कि वाधवां सिर्फ एक बंदरगाह ही नहीं, एक  ‘टाउनशिप मॉडल’ के तौर पर विकसित हो रहा है।

योजना के अनुसार यहां 4 आधुनिक अस्पताल बनेंगे। स्कूल और स्किल डेवलपमेंट सेंटर बनाए जाएंगे। रिहायशी क्षेत्र के अलावा व्यावसायिक परिसर होगा, लॉजिस्टिक्स पार्क और हरित क्षेत्र के साथ सभी सार्वजनिक सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। इस टाउनशिप का उद्देश्य है पोर्ट से जुड़े कर्मचारियों, तकनीकी विशेषज्ञों और उनके परिवारों को स्थानीय स्तर पर ही पूरी जीवन-व्यवस्था उपलब्ध हो सके।

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समुद्र के नीचे भी तैयारियां

VADHVAN SETTELITE PORT
VADHVAN SETTELITE PORT

वाधवां पोर्ट को डीप-सी पोर्ट के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिसके लिए समुद्र के नीचे बड़े स्तर पर ड्रेजिंग, आधुनिक नेविगेशन चैनल, अंडर-वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है ताकि बड़े से बड़े जहाज़ बिना किसी रुकावट के आ-जा सकें। इसे ‘100% ग्रीन पोर्ट (Green Port) के रूप में  विकसित किया जा रहा है। इसमें रिन्यूएबल एनर्जी का उपयोग होगा, इलेक्ट्रिक उपकरण, पर्यावरणीय प्रबंधन प्रणाली (ISO 14001) जैसे प्रावधान शामिल हैं।

हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि मैंग्रोव संरक्षण, समुद्री जैव-विविधता और स्थानीय मछुआरा समुदाय इस परियोजना की सबसे बड़ी परीक्षा होंगे। साफ है कि जहां  जेएनपीए देश के मौजूदा समुद्री व्यापार की रीढ़ है, वहीं  वाधवां भविष्य की जरूरतों को पूरा करेगा। वाधवां न केवल कंटेनर ट्रैफिक को बांटेगा,जहाज़ों की प्रतीक्षा अवधि घटाएगा और भारत को वैश्विक समुद्री मानचित्र पर और मजबूत करेगा।

हालांकि, इस विकास के साथ एक अहम सवाल भी जुड़ा है। क्या यह परियोजना मैंग्रोव, समुद्री जैव-विविधता और स्थानीय मछुआरा समुदाय के साथ संतुलन बना पाएगी? सरकार और परियोजना से जुड़े अधिकारी वाधवां  को 100 प्रतिशत ग्रीन पोर्ट के रूप में पेश कर रहे हैं, लेकिन असली परीक्षा ज़मीन और समंदर दोनों पर होगी।

समंदर के किनारे भविष्य की इबारत

केंद्रीय बजट 2026 इस पूरी समुद्री रणनीति को मजबूती देता है। कुल पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये किया गया है, जिससे पोर्ट-लिंक्ड सड़क, रेल और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को सीधा लाभ मिलेगा। 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों, कोस्टल कार्गो प्रमोशन स्कीम और 10,000 करोड़ रुपये की कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग योजना से साफ है कि सरकार समुद्री व्यापार को भविष्य की रीढ़ मानकर चल रही है। इन फैसलों का सीधा असर जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी जैसे स्थापित बंदरगाहों पर पड़ेगा और वाधवां जैसे नए पोर्ट्स को राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नेटवर्क से मजबूत तरीके से जोड़ेगा। दरअसल अभी सभी बड़े जहाज़ों को रिपेयर के लिये कोच्चि या विशाखापत्तम का रुख करना पड़ता है।

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जेएनपीए (JNPA) में आधुनिकीकरण और ऑटोमेशन

बजट के नये प्रावधानों के बाद जेएनपीए (JNPA) में आधुनिकीकरण और ऑटोमेशन  बढ़ेगा। इससे देश के पहले सैटेलाइट पोर्ट वाधवां को मजबूत मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी मिलेगी। कंटेनर की क्षमता बढ़ेगी, लॉजिस्टिक्स कॉस्ट ( Logistics cost )और टर्नअराउंड टाइम (turnaround time ) में कमी आएगी। सरकार का आकलन है कि जब देश का 90 फीसदी तक का विदेशी व्यापार समुद्र के रास्ते से हो रहा है तो ऐसे में पोर्ट का कुशल होना बेहद जरूरी है नहीं तो मेक इन इंडिया का सपना अधूरा रह जायेगा।

यह सिर्फ जेएनपीए और वाधवां की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है,जो अपना भविष्य समंदर के किनारे लिख रहा है। जेएनपीए ने देश के विदेशी व्यापार को आधार दिया तो वहीं वाधवां बंदरगाह इस राह को ग्लोबल हाईवे में बदलने जा रहा है। वाधवां एक ऐसा नया अध्याय लिखने जा रहा है जो समुद्री व्यापार को बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए टेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी, लॉजिस्टिक्स और टाउनशिप के साथ  देश को अगले 50 वर्षों के लिए तैयार करेगा।

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