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Explainer : क्यों चल रही है देशभर में मतदाता सूची की खास पड़ताल, जानिए SIR का पूरा सच

देशभर में 3.69 करोड़ नाम हटे, आयोग ने कहा यह सूची की सफाई है, लेकिन नागरिक संगठनों ने उठाए भरोसे के सवाल

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Voter Verification :  देश में मतदाता सूची की अब तक की सबसे सख्त और व्यापक जांच चल रही है। विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) के तहत 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 3.69 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा चुके हैं।  सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही 2.89 करोड़ वोटर्स की प्रविष्टियां ड्राफ्ट सूची से हटा दी गई हैं।

चुनाव आयोग इसे वोटर लिस्ट की सफाई और प्रणाली को पारदर्शी बनाने की कवायद बता रहा है, लेकिन नागरिक समाज और विपक्षी दलों के अनुसार यह प्रक्रिया नागरिक अधिकार और भरोसे की परीक्षा बन गई है। SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण सुनने में भले एक प्रशासनिक शब्द लगे, लेकिन इसके असर और सवाल दोनों गहरे हैं।

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आखिर यह प्रक्रिया क्या है, क्यों चलाई जा रही है और इससे मतदाताओं में असमंजस क्यों बढ़ा है, यह जानना ज़रूरी है।

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SIR क्या है

SIR चुनाव आयोग की वह प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूची का विशेष, गहन और व्यापक पुनरीक्षण किया जाता है। इसका उद्देश्य है कि सूची में दर्ज हर नाम वास्तविक और अद्यतन हो।

इस प्रक्रिया के तहत

• मृत मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं। • एक से अधिक स्थानों पर दर्ज डुप्लीकेट नाम निकाले जाते हैं।

• गलत पते वाले या स्थान बदल चुके मतदाताओं की प्रविष्टियां सुधारी जाती हैं।

• और नए पात्र मतदाताओं को शामिल किया जाता है।

सामान्य वार्षिक पुनरीक्षण के मुकाबले SIR कहीं अधिक सख्त और गहराई में जाकर किया जाता है।

इसमें डोर-टू-डोर सत्यापन, दस्तावेज़ जांच और स्थानीय स्तर पर सत्यापन रिपोर्ट तैयार की जाती है।

SIR कब और क्यों लागू होती है

चुनाव आयोग इसे तब लागू करता है जब उसे किसी क्षेत्र की मतदाता सूची में गड़बड़ी या विसंगति का संदेह होता है।

ऐसे में आयोग तय करता है कि वहां सामान्य वार्षिक पुनरीक्षण से अलग एक गहन जांच आवश्यक है।

यह प्रक्रिया तब शुरू होती है जब

• किसी इलाके में फर्जी मतदाताओं की शिकायतें बढ़ जाती हैं

• मतदाता सूची में संदिग्ध या डुप्लीकेट नाम तेजी से बढ़े हों

• बड़ी संख्या में लोगों का स्थानांतरण हुआ हो या जनसंख्या में बदलाव देखा गया हो

पिछले कुछ वर्षों में असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, राजस्थान, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह प्रक्रिया पहले भी अपनाई जा चुकी है।

हर बार इसका उद्देश्य एक ही बताया गया — वोटर लिस्ट की शुद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना।

विवाद की जड़: दस्तावेज़ और भरोसे की खाई

  1. दस्तावेज़ों की सख्ती : कई जिलों में SIR के दौरान मतदाताओं से जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता से जुड़े रिकॉर्ड और पुराने निवास प्रमाण जैसे दस्तावेज़ मांगे गए।  इससे आम नागरिकों में यह धारणा बनी कि यह केवल सूची का पुनरीक्षण नहीं बल्कि पहचान की जांच बन गया है।
  1. गरीब और प्रवासी मतदाता सबसे प्रभावित : ग्रामीण, झुग्गी-बस्ती और प्रवासी वर्ग के पास स्थायी पते का प्रमाण या पुराने दस्तावेज़ नहीं होते। ऐसे में यह आशंका बढ़ी कि यदि दस्तावेज़ पूरे नहीं हुए तो उनका नाम सूची से हट सकता है। इसी कारण यह प्रक्रिया खास तौर पर कमजोर वर्गों के लिए डर और अनिश्चितता का कारण बनी है।
  1. एनआरसी की यादें : असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का अनुभव अभी भी लोगों की स्मृतियों में ताजा है। भले ही चुनाव आयोग बार-बार कह रहा है कि SIR का नागरिकता निर्धारण से कोई लेना-देना नहीं है,

लेकिन जनता के एक वर्ग में यह आशंका बनी हुई है कि यह उसी दिशा में एक नया कदम हो सकता है।

क्या SIR नागरिकता तय करता है

चुनाव आयोग का जवाब स्पष्ट है-नहीं।

SIR का उद्देश्य केवल मतदाता सूची को अद्यतन करना है, न कि किसी की नागरिकता तय करना।

किसी का नाम हटाने से पहले उसे नोटिस दिया जाता है, जवाब का अवसर दिया जाता है और अपील का अधिकार सुनिश्चित किया जाता है।

फिर भी, ज़मीनी स्तर पर जानकारी के अभाव और नियमों की असमान व्याख्या के कारण भ्रम और अविश्वास बढ़ा है।  कई मतदाता यह समझ नहीं पा रहे कि किन दस्तावेज़ों की जरूरत है और प्रक्रिया कब पूरी होगी।

भरोसे का संकट क्यों बढ़ रहा है

  • कई लोगों को SIR की प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं है

    • हर जिले में नियमों की व्याख्या अलग-अलग की जा रही है

    • गरीब और प्रवासी वर्ग तक सूचना समय पर नहीं पहुंच रही

    • कई जगह BLO के पास प्रशिक्षण और स्पष्ट दिशा-निर्देशों की कमी रही

इन कारणों से यह प्रक्रिया प्रशासनिक पारदर्शिता के बजाय भरोसे की चुनौती बन गई है।

कई संगठनों का कहना है कि प्रक्रिया की जमीनी निगरानी मजबूत की जानी चाहिए ताकि यह किसी भी तरह से मतदाता अधिकारों पर नकारात्मक असर न डाले।

कहां-कहां उठा विरोध

SIR को लेकर असहमति केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रही। कई राज्यों में इसे लेकर खुला विरोध सामने आया है। असम में नागरिक संगठनों और विपक्षी दलों ने कहा कि दोबारा दस्तावेज़ों की मांग NRC जैसी प्रक्रिया को दोहराने का डर पैदा करती है। बिहार में प्रवासी और ग्रामीण मतदाताओं के नाम कटने की आशंका पर विपक्ष ने प्रश्न उठाए थे।

पश्चिम बंगाल में इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बताते हुए विपक्ष ने विरोध दर्ज कराया है।  दिल्ली, मुंबई, सूरत और बेंगलुरु जैसे महानगरों में किराएदारों और असंगठित मजदूरों को स्थानीय पते के दस्तावेज़ देने में कठिनाई आ रही है।

नागरिक संगठनों का कहना है कि अगर मतदाता सूची अत्यधिक दस्तावेज़ आधारित हो गई तो यह लोकतंत्र में भागीदारी को सीमित कर देगी।

क्या कहना है चुनाव आयोग का

आयोग के अनुसार SIR का उद्देश्य किसी को सूची से बाहर करना नहीं, बल्कि सूची को सही और अद्यतन बनाना है।

कई बार सूची में मृत व्यक्ति, स्थानांतरित परिवार या डुप्लीकेट प्रविष्टियां रह जाती हैं, जिससे मतदान केंद्रों पर भ्रम और अनावश्यक मतदाता संख्या बढ़ जाती है। आयोग का कहना है कि SIR पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास है। लेकिन नागरिक संगठनों का कहना है कि जब तक प्रक्रिया में समानता और स्पष्टता नहीं होगी, तब तक भरोसे की खाई बनी रहेगी।

उत्तर प्रदेश में SIR की तस्वीर

देशभर में चल रहे SIR अभियानों में सबसे बड़ा पुनरीक्षण उत्तर प्रदेश में हुआ है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा के अनुसार

  • SIR से पहले प्रदेश में 15 करोड़ 44 लाख मतदाता थे

    • प्रक्रिया के बाद 2.89 करोड़ नाम हटाए गए

इनमें

  • 1.26 करोड़ मतदाता ऐसे हैं जो स्थायी रूप से राज्य से बाहर जा चुके हैं
  • 45.95 लाख मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी थी
  • 23.32 लाख डुप्लीकेट पाए गए
  • 84.20 लाख लापता रहे
  • 9.37 लाख ने सत्यापन फॉर्म नहीं भरा

11 दिसंबर तक आयोग ने बताया था कि 2.91 करोड़ नाम हटाए गए हैं। समय सीमा बढ़ाने के बावजूद केवल दो लाख नाम ही वापस जुड़ पाए। प्रदेश में आयोग ने फॉर्म जमा करने की अंतिम तिथि पहले 4 दिसंबर तय की थी, जिसे बढ़ाकर 11 दिसंबर और फिर 26 दिसंबर किया गया। तीसरी बार समय सीमा बढ़ाने की मांग को आयोग ने अस्वीकार कर दिया।

अब 31 दिसंबर 2025 को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होगी।

31 दिसंबर से 30 जनवरी 2026 तक दावे और आपत्तियां ली जाएंगी।

31 दिसंबर 2025 से 21 फरवरी 2026 तक उनका निस्तारण होगा

और 28 फरवरी 2026 को अंतिम सूची प्रकाशित की जाएगी।

SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण)

11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 3.69 करोड़ वोटर्स के नाम सूची से  हटे

हटाए गए हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि यह केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं बल्कि देशव्यापी मतदाता पुनरीक्षण अभियान है। इसका असर न केवल अगली मतदाता सूची पर बल्कि आने वाले चुनावी समीकरण पर भी पड़ सकता है।

अगर आपका नाम हट जाए तो क्या करें

यदि किसी कारण आपका नाम सूची से हटा दिया गया है या आपको नोटिस मिला है, तो घबराने के बजाय ये कदम उठाएं

  • संबंधित BLO या ERO (Electoral Registration Officer) से संपर्क करें

    • नोटिस का समय पर जवाब दें

    • पहचान और पते से जुड़े दस्तावेज़ (आधार, बिजली बिल, राशन कार्ड, किराया अनुबंध आदि) प्रस्तुत करें

    • यदि संतोषजनक समाधान न मिले तो अपील का अधिकार प्रयोग करें। चुनाव आयोग का कहना है कि किसी भी मतदाता को बिना सूचना या बिना अवसर दिए सूची से नहीं हटाया जा सकता।

आगे क्या होगा

31 दिसंबर को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होने के बाद

• 31 दिसंबर से 30 जनवरी 2026 तक दावे और आपत्तियां ली जाएंगी

• 31 दिसंबर 2025 से 21 फरवरी 2026 तक उनका निस्तारण होगा

• 28 फरवरी 2026 को अंतिम सूची प्रकाशित की जाएगी

यह समयावधि तय करेगी कि कितने नाम वापस जुड़ते हैं और कितने स्थायी रूप से हटे रह जाते हैं। यही तय करेगा कि SIR अपने घोषित उद्देश्य यानी सूची की शुद्धता तक पहुंचा या एक नई लोकतांत्रिक परीक्षा बन गया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में वोट केवल कागज़ पर दर्ज नाम नहीं, बल्कि नागरिक की उपस्थिति का प्रतीक है। SIR की सफलता का असली पैमाना यही होगा कि यह प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष, पारदर्शी और मानवीय साबित होती है। हर मतदाता को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उसकी पहचान, उसका नाम और उसका वोट सुरक्षित हैं।

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