Explainer : सड़क पर बहस क्यों थमी ? जानिये क्या हुआ कि चंडीगढ़ ट्रैफिक पुलिस की शिकायतें रह गईं आधी
डिजिटल सिस्टम से भरोसे की वापसी। ट्रैफिक पुलिस से संबंधित 53 प्रतिशत शिकायतें कम हुई
Policing Beyond Challans : शहर की सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस और आम नागरिक के बीच टकराव कोई नई बात नहीं रही है। चालान को लेकर बहस, नियम उल्लंघन पर नाराजगी और शिकायतों की फाइलें लंबे समय तक शहरी अनुभव का हिस्सा बनी रहीं। लेकिन 2025 के दूसरे हिस्से में चंडीगढ़ की सड़कों पर एक खामोश बदलाव दिखा।
1 अगस्त 2025 से 30 दिसंबर 2025 के बीच Chandigarh Traffic Police के खिलाफ दर्ज शिकायतों में 53.12 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। यह आंकड़ा केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह बताता है कि सड़क पर पुलिस और नागरिकों के बीच रोजमर्रा का टकराव अब कम हो रहा है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदला, जिससे शिकायतें आधी से भी कम रह गईं।
जहां से शुरू होता था टकराव
लंबे समय तक ट्रैफिक प्रवर्तन का चेहरा मैनुअल चालान रहा। पुलिसकर्मी सड़क पर खड़ा है, सामने वाहन चालक और नियम उल्लंघन पर तत्काल कार्रवाई। यहीं से बहस जन्म लेती थी। चालक खुद को सही मानता था, पुलिसकर्मी नियम के मुताबिक कार्रवाई करता था। कई बार यह बहस आरोप, असंतोष और अंततः शिकायत में बदल जाती थी। चंडीगढ़ ट्रैफिक पुलिस ने इस रोजमर्रा के टकराव को एक संरचनात्मक समस्या के रूप में देखा, न कि केवल अनुशासन की कमी के तौर पर।
इंसान पीछे, तकनीक आगे ![]()
- समाधान की दिशा तकनीक से निकली। मैनुअल चालान को धीरे धीरे पीछे किया गया और ई चालान प्रणाली को प्राथमिकता दी गई।
- रेड लाइट वायोलेशन डिटेक्शन सिस्टम, स्पीड डिटेक्शन डिवाइस और एएनपीआर आधारित कैमरे अब पुलिस कमांड एंड कंट्रोल सेंटर से जुड़े हैं।
- इसका असर सीधा सड़क पर दिखा। अब नियम उल्लंघन मशीन दर्ज करती है। पुलिसकर्मी और वाहन चालक के बीच मौके पर बहस की जरूरत ही नहीं पड़ती।
- जब चालान कैमरे से कटता है, तो व्यक्तिगत पक्षपात, मनमानी या भेदभाव के आरोप कमजोर पड़ जाते हैं। यही वजह है कि शिकायतों की संख्या में तेज गिरावट दर्ज हुई।
सबूत के सामने बहस फीकी![]()
शिकायतों का एक बड़ा कारण पहले यह रहता था कि चालक को लगता था कि चालान गलत है। ई चालान व्यवस्था में हर उल्लंघन के साथ फोटो या वीडियो साक्ष्य मिलता है। स्थान, समय और नियम उल्लंघन सब साफ दिखता है। जब सबूत सामने हो, तो बहस की गुंजाइश अपने आप कम हो जाती है। स्वीकार्यता बढ़ती है और वही स्वीकार्यता शिकायतों में कमी का बड़ा कारण बनी।
वर्दी के साथ बदला व्यवहार
तकनीक के साथ साथ ट्रैफिक पुलिस ने यह भी समझा कि सड़क पर खड़ा पुलिसकर्मी ही पूरी व्यवस्था का चेहरा होता है। इसी सोच के तहत सेक्टर 29 स्थित ट्रैफिक ऑडिटोरियम में विशेष प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों में 350 ट्रैफिक कर्मियों को संचार कौशल, सॉफ्ट स्किल्स और व्यवहार परिवर्तन का प्रशिक्षण दिया गया।
नियम वही रहे, लेकिन उन्हें लागू करने की भाषा बदली। सख्ती बनी रही, पर संवाद में सम्मान आया। कई बार तनाव शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया।
चालान भरना अब झंझट नहीं
शिकायतें केवल सड़क पर नहीं बनती थीं। चालान कटने के बाद अदालतों के चक्कर, तारीखें और भुगतान की जटिल प्रक्रिया भी लोगों की नाराजगी बढ़ाती थी। इस समस्या को देखते हुए नियमित अदालतों में लंबित करीब 4.25 लाख कंपाउंडेबल चालानों के लिए ऑनलाइन भुगतान सुविधा बहाल की गई। इसके साथ लगभग 4 लाख नॉन कंपाउंडेबल चालान भी वर्चुअल कोर्ट प्रणाली से जोड़े गए। एसएमएस के जरिए लोगों को भुगतान की याद दिलाई गई। जब प्रक्रिया आसान हुई, तो गुस्सा कम हुआ और शिकायतों की जरूरत भी घटती चली गई।
सेफ ड्राइव अभियान भी चलाए
सेवा पखवाड़ा और सेफ ड्राइव अभियानों के दौरान ट्रैफिक पुलिस का एक अलग रूप सामने आया। 18 सितंबर से 1 अक्तूबर 2025 तक चले इन अभियानों में पुलिस ने चालान काटने के साथ साथ संवाद को भी प्राथमिकता दी। ड्राइवरों, पैदल यात्रियों, छात्रों और वरिष्ठ नागरिकों से सीधे बातचीत कर यह समझाया गया कि नियम केवल जुर्माने के लिए नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा के लिए हैं। जब नागरिकों को नियमों के पीछे का तर्क समझ आता है, तो टकराव की जगह सहयोग लेता है।
बच्चों से घर तक पहुंचा संदेश
रोड सेफ्टी क्लबों के जरिए सड़क सुरक्षा की सोच स्कूलों तक पहुंची। अब तक 187 सरकारी और निजी स्कूलों के 3786 छात्र इन क्लबों से जुड़े हैं। इन बच्चों को हेलमेट, सीट बेल्ट, सुरक्षित पैदल चलने और ट्रैफिक नियमों की जानकारी दी गई।
जब बच्चे घर जाकर नियमों की बात करते हैं, तो परिवार में भी नियम पालन को लेकर सकारात्मक सोच बनती है। यह सोच सड़क पर व्यवहार में बदलती है और टकराव को कम करती है।
चलती वैन, चलता संवाद
2 जनवरी 2025 को शुरू की गई रोड सेफ्टी एग्जीबिशन वैन इस बदलाव की चलती फिरती मिसाल बनी। यह वैन स्कूलों, बाजारों, रिहायशी इलाकों और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर जाकर ऑडियो विजुअल माध्यमों से लोगों को जागरूक कर रही है। जब जानकारी सीधे और सरल भाषा में पहुंचती है, तो गलतफहमियां कम होती हैं और वही गलतफहमियां पहले शिकायतों की बड़ी वजह थीं।
ब्लैक स्पॉट से लेकर सड़क सुधार तक
15 जनवरी 2025 को आयोजित रोड सेफ्टी डायलॉग कम वर्कशॉप में शहर के पांच ब्लैक स्पॉट और पांच प्रमुख जाम बिंदुओं की समीक्षा की गई। विशेषज्ञ टीमों ने मौके पर जाकर सुधार के सुझाव दिए। इसके साथ रोड इंजीनियरिंग सर्वे कर धुंधली रोड मार्किंग, खराब साइन बोर्ड और अपर्याप्त रोशनी जैसी कमियों को चिन्हित किया गया। जब सड़कें बेहतर होती हैं, तो नियम उल्लंघन और उसके बाद होने वाला टकराव भी अपने आप कम होता है।
53.12 प्रतिशत की कमी क्या बताती है
शिकायतों में 53.12 प्रतिशत की गिरावट किसी एक फैसले या एक अभियान का नतीजा नहीं है। यह तकनीक आधारित प्रवर्तन, बेहतर व्यवहार, आसान प्रक्रियाओं और लगातार संवाद का संयुक्त असर है। सबसे अहम बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में सड़क पर पुलिस और नागरिकों के बीच सीधा टकराव कम हुआ।
चंडीगढ़ का अनुभव बताता है कि ट्रैफिक व्यवस्था केवल सख्ती से नहीं सुधरती। जब इंसानी टकराव घटाया जाए, नियमों को पारदर्शी बनाया जाए और नागरिकों को प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए, तो शिकायतें अपने आप कम हो जाती हैं। 53.12 प्रतिशत की कमी इसी बदले हुए रिश्ते की कहानी है। कम बहस, कम तनाव और ज्यादा भरोसा। यही वह बदलाव है, जिसने चंडीगढ़ की सड़कों को न सिर्फ सुरक्षित, बल्कि ज्यादा नागरिक अनुकूल बनाने की दिशा दिखाई है।

