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Explainer : पीजीआई में स्पाइन सर्जरी का ट्रेंड क्यों बदला, मरीजों को क्या फायदा हुआ, जानिए क्या है वजह

PM-JAY Impact : रीढ़ की बीमारी या गंभीर चोट किसी भी परिवार के लिए सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं होती, यह आर्थिक और मानसिक परीक्षा भी बन जाती है। स्पाइन सर्जरी को लंबे समय से ऐसा इलाज माना जाता रहा है,...

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PM-JAY Impact : रीढ़ की बीमारी या गंभीर चोट किसी भी परिवार के लिए सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं होती, यह आर्थिक और मानसिक परीक्षा भी बन जाती है। स्पाइन सर्जरी को लंबे समय से ऐसा इलाज माना जाता रहा है, जो महंगा है, जटिल है और आम आदमी की पहुंच से बाहर है। कई परिवार इलाज के नाम पर जमीन, गहने या कर्ज तक का सहारा लेने को मजबूर हुए हैं।

लेकिन चंडीगढ़ स्थित पीजीआई से सामने आए एक नए अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। अध्ययन बताता है कि आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जय) ने जटिल और महंगी स्पाइन सर्जरी तक पहुंच को पहले से कहीं अधिक आसान बनाया है। यह एक्सप्लेनर इसी बदलाव को आसान भाषा में समझाने की कोशिश है।

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यह अध्ययन क्यों अहम है

पीजीआई के ऑर्थोपेडिक सर्जरी विभाग द्वारा किया गया यह अध्ययन जनवरी 2023 से दिसंबर 2024 तक की अवधि में की गई स्पाइन सर्जरी पर आधारित है। इसका शीर्षक है ‘उत्तर भारत के एक तृतीयक स्वास्थ्य केंद्र में स्पाइन सर्जरी तक पहुंच पर आयुष्मान भारत (पीएम-जय) का प्रभाव: एक रेट्रोस्पेक्टिव विश्लेषण’।

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यह शोध जर्नल ऑफ क्लिनिकल ऑर्थोपेडिक्स एंड ट्रॉमा के 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। इसका उद्देश्य यह देखना था कि पीएम-जय के विस्तार के बाद मरीजों के इलाज के तरीके, भुगतान के स्रोत और पहुंच में क्या बदलाव आया।

स्पाइन सर्जरी को अध्ययन के लिए इसलिए चुना गया, क्योंकि यह आधुनिक चिकित्सा की सबसे महंगी और तकनीकी प्रक्रियाओं में से एक मानी जाती है।

पहले इलाज इतना मुश्किल क्यों था

स्पाइन सर्जरी में केवल ऑपरेशन ही महंगा नहीं होता।

इसमें

  • महंगे इंप्लांट
  • उन्नत इमेजिंग जांच
  • लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती
  • बाद की फिजियोथेरेपी और पुनर्वास

    शामिल होता है।

इन्हीं कारणों से

  • कई मरीज इलाज टाल देते थे
  • कुछ मरीज अधूरा इलाज कराते थे
  • कई परिवार आर्थिक संकट में चले जाते थे

ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के मरीजों के लिए यह इलाज अक्सर सपना ही रह जाता था।

पीएम-जय के आने से क्या बदला

अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि पीएम-जय ने इस स्थिति में बड़ा बदलाव किया है। दो वर्षों में पीजीआईएमईआर में कुल 410 स्पाइन सर्जरी की गईं। इनमें

  • 276 सर्जरी पीएम-जय के तहत हुईं
  • 110 सर्जरी स्वयं भुगतान से कराई गईं

2023 में पीएम-जय के तहत सर्जरी का अनुपात 58.7 प्रतिशत था।

2024 में यह बढ़कर 73.5 प्रतिशत हो गया।

वहीं स्वयं भुगतान वाली सर्जरी

  • 2023 में 37.8 प्रतिशत
  • 2024 में घटकर 18.9 प्रतिशत

    रह गईं।

यह बदलाव सांख्यिकीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण पाया गया, यानी यह संयोग नहीं, बल्कि ठोस रुझान को दर्शाता है।

इसका सीधा मतलब क्या है

  • ज्यादा मरीज अब सरकारी बीमा के भरोसे इलाज करा पा रहे हैं
  • परिवारों को अपनी जेब से भारी रकम खर्च नहीं करनी पड़ रही
  • इलाज का फैसला बीमारी की जरूरत के आधार पर हो रहा है, पैसे के आधार पर नहीं

यही कारण है कि डॉक्टर इसे स्वास्थ्य समानता की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं।

किन मरीजों को सबसे ज्यादा फायदा

अध्ययन के मुताबिक

  • 46.1 प्रतिशत मरीज रीढ़ के अपक्षयी रोगों से पीड़ित थे
  • 33.4 प्रतिशत मरीज सड़क हादसों या गिरने से हुई स्पाइनल चोटों के थे

इन मरीजों में

  • डीकंप्रेशन
  • स्टेबलाइजेशन
  • जटिल इंस्ट्रूमेंटेड फ्यूजन

    जैसी सर्जरी की गईं।

ये वही प्रक्रियाएं हैं, जिन्हें आम तौर पर बेहद महंगा माना जाता है।

क्या पीएम-जय सिर्फ साधारण सर्जरी तक सीमित है

अध्ययन बताता है कि ऐसा नहीं है।

पीएम-जय के तहत

  • ट्रॉमा
  • डिफॉर्मिटी
  • ट्यूमर
  • संक्रमण
  • रिवीजन स्पाइन सर्जरी

    तक की गईं।

यह दिखाता है कि तय पुनर्भुगतान पैकेज के भीतर भी उन्नत स्पाइन केयर संभव हो पा रही है और संस्थानों का भरोसा योजना पर बढ़ा है।

अब मरीज इलाज से नहीं घबरा रहे : प्रो. विवेक लाल

पीजीआईएमईआर के निदेशक प्रो. विवेक लाल के अनुसार, ‘आयुष्मान भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि जटिल स्पाइन सर्जरी तक पहुंच अब भुगतान क्षमता पर निर्भर नहीं रहे।’उन्होंने कहा कि मरीज अब इलाज से नहीं घबरा रहे हैं।

उनका कहना है कि संस्थान में यह बदलाव साफ नजर आ रहा है, जहां मरीज इलाज के लिए पैसे की चिंता कम और इलाज की जरूरत ज्यादा बता रहे हैं।

पीएम-जय ने बाधाओं को दूर किया : डॉ. विशाल

अध्ययन से जुड़े प्रोफेसर डॉ. विशाल कुमार बताते हैं कि स्पाइन सर्जरी लंबे समय तक उन मरीजों की पहुंच से बाहर रही, जिनके पास आर्थिक संसाधन नहीं थे।

उनके अनुसार

  • महंगे इंप्लांट
  • आधुनिक तकनीक
  • लंबे अस्पताल प्रवास

    इलाज को और कठिन बना देते थे।

पीएम-जय ने इन बाधाओं को काफी हद तक दूर किया है और मरीजों में इलाज को लेकर भरोसा बढ़ाया है।

इंप्लांट और इलाज की गुणवत्ता

अध्ययन में यह भी बताया गया कि पीएम-जय के तहत की गई सर्जरी में

  • पूर्वनिर्धारित पुनर्भुगतान पैकेज
  • स्वीकृत इंप्लांट

    का उपयोग किया गया।

इनमें से अधिकतर इंप्लांट घरेलू स्तर पर निर्मित थे। हालांकि औपचारिक रूप से परिणामों की तुलना इस अध्ययन का हिस्सा नहीं थी, फिर भी शुरुआती पोस्टऑपरेटिव नतीजों में कोई स्पष्ट अंतर नहीं देखा गया।

मरीज के जीवन में क्या बदलाव आता है

समय पर की गई स्पाइन सर्जरी

  • स्थायी न्यूरोलॉजिकल क्षति को रोक सकती है
  • लंबे समय की विकलांगता से बचा सकती है
  • मरीज को दोबारा कामकाज और सामान्य जीवन में लौटने में मदद कर सकती है

इसका असर सिर्फ मरीज तक सीमित नहीं रहता। पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक राहत महसूस करता है।

सामाजिक और आर्थिक असर

शोधकर्ताओं का मानना है कि

  • इलाज से लौटकर मरीज काम पर जाता है
  • परिवार की आय बनी रहती है
  • समाज पर निर्भरता कम होती है

इस तरह पीएम-जय का लाभ व्यक्तिगत इलाज से आगे जाकर सामाजिक स्तर पर दिखता है।

क्या कोई चिंता भी है

अध्ययन में यह भी चेतावनी दी गई है कि

  • कवरेज के विस्तार के साथ निगरानी जरूरी है
  • अनावश्यक सर्जरी से बचाव होना चाहिए
  • साक्ष्य आधारित शल्य संकेतों का पालन हो

साथ ही

  • पुनर्भुगतान पैकेज की नियमित समीक्षा
  • बेहतर डिजिटल एकीकरण
  • पोस्टऑपरेटिव पुनर्वास को बीमा में शामिल करना

    भविष्य की अहम जरूरतें बताई गई हैं।

पीजीआई का अनुभव क्यों महत्वपूर्ण

उत्तर भारत के कई राज्यों से आने वाले मरीजों का इलाज करने वाला पीजीआईएमईआर एक उच्च भार वाला तृतीयक रेफरल केंद्र है।

ऐसे संस्थान में पीएम-जय का प्रभाव यह दिखाता है कि

  • योजना केवल कागजों तक सीमित नहीं है
  • यह जमीनी स्तर पर इलाज की दिशा बदल रही है

पीजीआई के इस अध्ययन से यह साफ संकेत मिलता है कि आयुष्मान भारत पीएम-जय ने स्पाइन सर्जरी जैसे कठिन और महंगे क्षेत्र में भी आम मरीज के लिए रास्ते खोले हैं। यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि सोच का है। इलाज अब इस सवाल पर नहीं रुकता कि मरीज कितना भुगतान कर सकता है, बल्कि इस पर केंद्रित होता है कि मरीज को इलाज की कितनी जरूरत है।

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