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Explainer : घर से निकले लोग आखिर कहां गुम हो जाते हैं: जानिये क्या है हरियाणा में गुमशुदगी के पीछे छिपा सच

Haryana Missing Trail : हरियाणा में हर दिन औसतन 12 बच्चे लापता हो रहे हैं, जबकि साल 2025 में जनवरी से अब तक गुमशुदगी से जुड़े 17500 से अधिक किए जा चुके हैं मुकदमे दर्ज

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Haryana Missing Trail : घर से निकला कोई व्यक्ति जब वापस नहीं लौटता, तो उसके साथ सिर्फ एक इंसान ही नहीं गुम होता, बल्कि पूरा परिवार अनिश्चितता और डर में जीने को मजबूर हो जाता है। हरियाणा में ऐसे हजारों परिवार आज भी किसी अपने की राह देख रहे हैं। गुमशुदगी की ये घटनाएं अब केवल पुलिस रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहीं। कई मामलों में इनके पीछे मानव तस्करी जैसे संगठित अपराध की कड़ियां सामने आ रही हैं। यही कारण है कि यह समस्या आज कानून व्यवस्था के साथ साथ एक बड़ी सामाजिक चुनौती बन चुकी है।

समस्या की गंभीरता कितनी है

हरियाणा में  5000 से अधिक लोग आज भी लापता हैं। रोजाना करीब 12 बच्चों के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज हो रही है। साल 2025 में जनवरी से अब तक गुमशुदगी से जुड़े 17500 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं।

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इन मामलों में महिलाओं और बच्चियों की संख्या सबसे अधिक है। पुलिस ने करीब 75 फीसदी मामलों को ट्रेस कर लिया है, लेकिन 25 फीसदी केस अब भी अधूरे हैं। यही अधूरे मामले मानव तस्करी जैसे संगठित अपराध की आशंका को और मजबूत करते हैं।

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गुमशुदगी से मानव तस्करी तक की कड़ी

जांच में सामने आया है कि कई लोग प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से काम की तलाश में हरियाणा आए और कुछ समय बाद लापता हो गए। इनमें से कई एजेंसियां फर्जी या पूरी तरह अनियंत्रित पाई गईं।

अब पुलिस इन मामलों को केवल गुमशुदगी मानकर नहीं देख रही, बल्कि इन्हें संगठित अपराध के रूप में जांचा जा रहा है। अंतरराज्यीय नेटवर्क, पैसों के लेनदेन और प्लेसमेंट एजेंसियों की भूमिका को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है।

कम उम्र के बच्चे बढ़ती चिंता

पिछले साल के मुकाबले इस साल करीब 1000 से अधिक लोग लापता हुए हैं। इनमें महिलाओं और कम उम्र की बच्चियों की संख्या अधिक है। लड़कों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है, लेकिन लगातार गायब हो रहे कम उम्र के बच्चे गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं।

भिक्षावृत्ति और बालश्रम की कड़वी सच्चाई

सरकार और पुलिस की कार्रवाई में अब तक 350 से अधिक बच्चों को भिक्षावृत्ति और बालश्रम से मुक्त कराया गया है। इनमें अधिकतर लड़के हैं। चौक चौराहों और धार्मिक स्थलों के आसपास दिखने वाले ये बच्चे अक्सर किसी संगठित नेटवर्क के जरिये यहां लाए जाते हैं।

बिहार, झारखंड और उड़ीसा से जुड़ा नेटवर्क

पुलिस सूत्रों के अनुसार बिहार, झारखंड और उड़ीसा से बच्चों को अभिभावकों को लोभ लालच देकर हरियाणा लाया जाता है। बाद में इन्हें काम पर लगाया जाता है। इनसे होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा प्लेसमेंट एजेंसियां अपने पास रख लेती हैं। अम्बाला और पिंजौर के हालिया मामलों में नाबालिगों की बरामदगी ने इस नेटवर्क की गंभीरता को उजागर किया है।

आपस में जुड़े अपराध

पुलिस का मानना है कि मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, साइबर अपराध और एक्सटॉर्शन अब अलग अलग अपराध नहीं रहे। कई मामलों में इनके नेटवर्क एक दूसरे से जुड़े पाए गए हैं। इसी कारण अधूरे गुमशुदगी मामलों की जांच अब संगठित अपराध के नजरिये से की जा रही है।

हाल ही में पंचकूला में आयोजित दीक्षांत परेड समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इन अपराधों को हरियाणा के लिए बड़ी चुनौती बताया था।

साल 2026 के लिए पुलिस का रोडमैप

हरियाणा पुलिस ने साल 2026 के लिए अपराध नियंत्रण का रोडमैप तैयार किया है। लक्ष्य केवल मुकदमे दर्ज करना नहीं, बल्कि अपराध की जड़ तक पहुंचकर उसे रोकना है।

 पुलिस की नई रणनीति

• संगठित अपराधियों पर कड़ी निगरानी

• ज्यादा मुकदमे वाले अपराधियों की सूची तैयार करना

• गुमशुदगी और मानव तस्करी मामलों में समयबद्ध जांच

• तकनीक के जरिये पहचान और ट्रैकिंग

• पीड़ितों को समय पर सहायता और संरक्षण

• अंतरराज्यीय समन्वय को मजबूत करना

मानव तस्करी और गुमशुदगी अब संगठित अपराध की तरह : डीजीपी

हरियाणा पुलिस के महानिदेशक ने कहा कि मानव तस्करी और गुमशुदगी को अब संगठित अपराध मानकर देखा जा रहा है। पुलिस का लक्ष्य अपराध के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि अपराध को पहले ही रोकना है। इसके लिए मैदानी पुलिसिंग, खुफिया तंत्र और तकनीक को लगातार मजबूत किया जा रहा है। बच्चों और महिलाओं से जुड़े मामलों में किसी भी स्तर पर देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। संदिग्ध प्लेसमेंट एजेंसियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

समाज की भूमिका क्यों जरूरी

पुलिस का मानना है कि यह समस्या केवल कानून के जरिए नहीं सुलझेगी। समाज की जागरूकता, समय पर सूचना और संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्टिंग कई मामलों को शुरुआती स्तर पर ही रोक सकती है।

बाल तस्करी एक गंभीर चुनौती: बड़ौला

स्टेट कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, हरियाणा के पूर्व सदस्य और जिला युवा विकास संगठन के अध्यक्ष परमजीत सिंह बड़ौला ने कहा कि बाल तस्करी आज देश के सामने खड़ी सबसे गंभीर सामाजिक चुनौतियों में शामिल है। यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य, उनकी शिक्षा और समाज की सुरक्षा पर सीधा हमला है। उन्होंने कहा कि तस्करी का शिकार होने वाले अधिकतर बच्चे गरीबी, अशिक्षा और पारिवारिक मजबूरियों के कारण इस जाल में फंसते हैं। बेहतर जीवन, रोजगार या शिक्षा का झांसा देकर बच्चों को दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है और बाद में बाल मजदूरी या भिक्षावृत्ति में धकेल दिया जाता है। बड़ौला के अनुसार बच्चों को मुक्त कराना पहला कदम है, असली चुनौती उनके पुनर्वास, शिक्षा से जोड़ने और मानसिक काउंसलिंग की है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2025 में चंडीगढ़ में 192 बाल विवाह रोके गए और 76 बच्चों को बाल तस्करी से मुक्त कराया गया, जिनमें 30 लड़कियां और 46 लड़के शामिल हैं।

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