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Explainer : जब दुश्मन दिखाई भी न दे, तब कौन देखता है, जानिये क्या है भारतीय वायुसेना की AEW&C रणनीति और बदलते हवाई युद्ध की असली तस्वीर

Eyes in the Sky : हवाई निगरानी बढ़ाने को भारत खरीदेगा छह AEW&C

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Eyes in the Sky : आधुनिक युद्ध अब सीमा रेखाओं पर नहीं लड़ा जाता। असली जंग उस वक्त शुरू हो जाती है, जब दुश्मन का विमान, ड्रोन या मिसाइल रडार पर दिखने से पहले ही पहचान लिया जाए। कौन पहले देखता है, कौन पहले समझता है और कौन पहले फैसला लेता है, यही आज के युद्ध का न सुनिश्चित करता है। इसी बुनियादी सच्चाई के बीच भारतीय वायुसेना ने छह एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल यानी AEW&C विमानों की खरीद की प्रक्रिया शुरू की है।

AEW&C को अक्सर उड़ता हुआ रडार कहा जाता है, लेकिन यह परिभाषा इसकी भूमिका को पूरी तरह नहीं समझा पाती। वास्तव में यह आसमान में मौजूद एक चलता फिरता कमांड सेंटर होता है, जो पूरे हवाई युद्धक्षेत्र पर एक साथ नजर रखता है और जमीन पर बैठे कमांडरों को रियल टाइम जानकारी देता है।

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AEW&C क्या होता है

भारतीय वायुसेना द्वारा जारी सूचना अनुरोध के अनुसार AEW&C एक ऐसा सिस्टम है, जिसमें लंबी दूरी का शक्तिशाली रडार, मित्र और शत्रु की पहचान प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस, संचार सहायता, कमांड एंड कंट्रोल, बैटल मैनेजमेंट सिस्टम और डाटा लिंक के जरिये नेटवर्किंग शामिल होती है।

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सरल शब्दों में यह वह आंख है, जो दुश्मन की हर हवाई गतिविधि को पहले देख लेती है और वह दिमाग है, जो तय करता है कि किस खतरे से पहले निपटना है। दुश्मन का विमान कब उड़ा, किस दिशा में बढ़ रहा है, कितनी ऊंचाई पर है और उसका संभावित लक्ष्य क्या हो सकता है, यह सारी जानकारी AEW&C के जरिये मिलती है।

खरीद की शर्तें क्या बताती हैं

वायुसेना ने जिस तरह की तकनीकी शर्तें रखी हैं, उनसे साफ है कि भविष्य की जंग को ध्यान में रखकर यह खरीद की जा रही है। AEW&C विमान में कम से कम दस घंटे की उड़ान क्षमता या हवा में ईंधन भरने की सुविधा अनिवार्य रखी गई है। इसकी सर्विस सीलिंग 45,000 फीट तक होनी चाहिए और लगभग 10,000 फीट ऊंचाई पर स्थित एयरफील्ड से संचालन की क्षमता भी जरूरी है।

सबसे अहम शर्त मिशन सूट की है। यह 360 डिग्री स्कैन करने में सक्षम होना चाहिए, ताकि छोटे और धीमी गति वाले ड्रोन से लेकर तेज रफ्तार हाइपरसोनिक लक्ष्यों तक की पहचान की जा सके। सैटेलाइट आधारित नेविगेशन, सुरक्षित संचार और आत्मरक्षा प्रणालियां भी इस प्रणाली का अहम हिस्सा हैं।

कौन से प्लेटफॉर्म हो सकते हैं विकल्प

इन शर्तों को देखते हुए दो प्लेटफॉर्म पर सबसे ज्यादा चर्चा है। एक ओर एयर इंडिया से खरीदे गए एयरबस A 320 यात्री विमान हैं, जिन्हें सैन्य जरूरतों के मुताबिक बदला जा सकता है। दूसरी ओर एम्ब्राएर लेगेसी बिजनेस जेट हैं, जिन पर आधारित स्वदेशी AEW&C सिस्टम पहले ही विकसित किया जा चुका है।

एम्ब्राएर लेगेसी के तीन विमानों को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने स्वदेशी रूप से AEW&C में बदला है, जिन्हें नेत्रा नाम दिया गया है। यह प्रणाली पिछले कुछ वर्षों में भारतीय वायुसेना की हवाई निगरानी क्षमता की रीढ़ बनकर उभरी है।

नेत्रा का अगला संस्करण क्या बदलेगा

डीआरडीओ अब नेत्रा के उन्नत संस्करण पर काम कर रहा है। नई मिशन प्रणाली में करीब 15 हवाई उप प्रणालियां और कई ग्राउंड आधारित तत्व शामिल होंगे। इससे रडार की रेंज बढ़ेगी, लक्ष्य पहचान और ज्यादा सटीक होगी और डाटा प्रोसेसिंग तेज होगी।

इसके अलावा डीआरडीओ ने अपने आईएसटीएआर कार्यक्रम के लिए बॉम्बार्डियर ग्लोबल 6500 ट्विन इंजन बिजनेस जेट को प्लेटफॉर्म के रूप में चुना है। यह कार्यक्रम निगरानी, खुफिया जानकारी, लक्ष्य पहचान और टोही को एक साथ जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

भारतीय वायुसेना के पास अभी क्या है

वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास कुल पांच परिचालन AEW&C विमान हैं। इनमें तीन बेरीव A 50 शामिल हैं, जो रूसी IL 76 एयरफ्रेम पर आधारित हैं और इजरायली सेंसर से लैस हैं। इन्हें लगभग दो दशक पहले सेवा में शामिल किया गया था। इसके अलावा दो नेत्रा विमान वायुसेना के बेड़े में हैं, जबकि तीसरा नेत्रा डीआरडीओ के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स के पास है।

संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, वायुसेना को कुल 12 AEW&C विमानों की जरूरत है। इसी आवश्यकता को देखते हुए छह विमानों की दो अलग अलग परियोजनाएं और एक विशेष भूमिका वाले विमान का कार्यक्रम शुरू किया गया है।

पड़ोसी देशों की तुलना क्यों अहम है

यदि क्षेत्रीय परिदृश्य देखें तो भारतीय वायुसेना का AEW&C बेड़ा अभी सीमित है। चीन के पास केजे 500 के करीब 20 विमान, केजे 200 के चार और केजे 2000 के चार विमान हैं। पाकिस्तान के पास चार चीनी जेडडीके 03 कराकोरम ईगल और आठ स्वीडिश साब 2000 एरीआई प्लेटफॉर्म हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एक एरीआई प्लेटफॉर्म के नुकसान की संभावना ने यह साफ कर दिया कि AEW&C केवल निगरानी का साधन नहीं, बल्कि युद्ध में निर्णायक लक्ष्य भी होते हैं।

क्यों निर्णायक है AEW&C रणनीति

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि AEW&C विमानों की संख्या बढ़ने से वायुसेना की प्रतिक्रिया क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। किसी भी हवाई खतरे की पहले पहचान, लड़ाकू विमानों के बीच बेहतर तालमेल और नेटवर्क आधारित युद्ध में यह प्रणाली निर्णायक साबित होती है।

छह नए AEW&C विमानों की प्रस्तावित खरीद को केवल एक रक्षा सौदा नहीं माना जा रहा। यह उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें युद्ध को सीमा तक पहुंचने से पहले ही नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। आने वाले वर्षों में जब ड्रोन, मिसाइल और तेज गति वाले हथियार युद्ध की दिशा तय करेंगे, तब आसमान में मौजूद यही उड़ती आंखें भारत की सबसे मजबूत पहली रक्षा पंक्ति साबित होंगी।

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