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Explainer : हर सफर में टोल, हर 45 किलोमीटर पर वसूली… आखिर हरियाणा में ही क्यों टोल इतने पास-पास हैं ? जानिये क्या है पूरा गणित

Haryana Toll Trap : हरियाणा में टोल की संख्या नहीं, दूरी है असली मुद्दा

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Haryana Toll Trap : अगर आप हरियाणा में सुबह घर से निकलते हैं और किसी भी दिशा में गाड़ी मोड़ते हैं, तो बहुत देर नहीं लगती कि सामने एक टोल प्लाजा दिख जाता है। कुछ किलोमीटर आगे बढ़िए, फिर एक और। और फिर एक और। यह अब किसी अपवाद की तरह नहीं, बल्कि यहां की सड़कों की स्थायी पहचान बन चुका है।

यही वजह है कि हरियाणा में सफर करते समय लोगों के मन में एक सवाल बार बार उठता है। क्या देश में सबसे ज्यादा टोल हरियाणा में हैं? इस सवाल का जवाब सीधा नहीं है। असल जवाब यह है कि हरियाणा में टोल सबसे ज्यादा पास पास हैं। यानी संख्या से ज्यादा, दूरी का सवाल है।

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हरियाणा में टोल का असली गणित

देशभर में औसतन एक टोल प्लाजा के बीच की दूरी 60 किलोमीटर या उससे अधिक मानी जाती है। लेकिन हरियाणा में यह औसत घटकर करीब 45 किलोमीटर रह जाता है। यह पूरे देश में सबसे कम है।  इसका सीधा मतलब यह हुआ कि हरियाणा में सफर करने वाला व्यक्ति अपेक्षाकृत कम दूरी में बार बार टोल चुकाने को मजबूर होता है। यही कारण है कि यहां टोल का बोझ लोगों को ज्यादा महसूस होता है, भले ही कुल टोल प्लाजा की संख्या कुछ बड़े राज्यों से कम हो। यानी समस्या टोल की संख्या नहीं, बल्कि टोल का घनत्व है।

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हरियाणा का हाईवे नेटवर्क, ताकत भी और चुनौती भी

हरियाणा का भौगोलिक क्षेत्रफल करीब 44,000 वर्ग किलोमीटर है। यह न तो बहुत बड़ा राज्य है और न ही बहुत छोटा। लेकिन इसके भीतर सड़क नेटवर्क असाधारण रूप से घना है।

राज्य में 34 राष्ट्रीय राजमार्ग हैं, जिनकी कुल लंबाई करीब 2,484 किलोमीटर है। इसके अलावा 29 राज्य राजमार्ग हैं, जिनकी लंबाई लगभग 1,801 किलोमीटर है। अगर पूरे सड़क नेटवर्क को देखा जाए तो यह करीब 26,000 किलोमीटर तक फैल चुका है।

सीमित क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में हाईवे और एक्सप्रेसवे होना अपने आप में एक उपलब्धि है। लेकिन यही उपलब्धि टोल घनत्व की सबसे बड़ी वजह भी बन गई है। कम क्षेत्र, ज्यादा सड़कें और हर सड़क पर टोल की अनुमति। नतीजा यह हुआ कि टोल प्लाजा एक दूसरे के बेहद करीब आ गए।

कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने लोकसभा में उठाया मुद्दा

हाल ही में यह मुद्दा संसद तक पहुंचा। लोकसभा में रोहतक से कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने सरकार से सीधा सवाल किया। उन्होंने कहा कि हरियाणा में करीब 75 टोल प्लाजा हैं। राजस्थान में यह संख्या 160 से ज्यादा है। महाराष्ट्र में 95 और गुजरात में करीब 62 टोल हैं। अगर केवल संख्या देखें तो हरियाणा सबसे ऊपर नहीं है। लेकिन जब दूरी की बात आती है, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।

हरियाणा में औसतन हर 45 किलोमीटर पर टोल है। महाराष्ट्र में यह दूरी करीब 188 किलोमीटर है। गुजरात में 142 किलोमीटर और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में करीब 500 किलोमीटर। यही वह बिंदु है जहां बहस तेज हो जाती है।

हुड्डा ने कहा कि इसका असर केवल यात्रियों की जेब पर नहीं, बल्कि आर्थिक न्याय पर भी पड़ता है। जब विकास पूरे देश के लिए है, तो उसकी कीमत कुछ राज्यों में इतनी ज्यादा क्यों चुकानी पड़ती है।

सरकार का जवाब, सड़कें ज्यादा तो टोल भी ज्यादा

राज्यसभा में नितिन गडकरी। फोटो स्रोत एक्स अकाउंट संसद टीवी
राज्यसभा में नितिन गडकरी। फोटो स्रोत एक्स अकाउंट संसद टीवी

केंद्रीय सड़क, परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इस सवाल का जवाब दिया, लेकिन सरकार का नजरिया अलग था। गडकरी का कहना था कि हरियाणा में टोल इसलिए ज्यादा दिखते हैं क्योंकि यहां सड़कें ज्यादा हैं। उन्होंने कहा कि राज्य बनने के बाद जितना सड़क निर्माण पिछले 12 वर्षों में हुआ है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। उनके मुताबिक हरियाणा और पंजाब में ट्रैफिक डेंसिटी देश में सबसे ज्यादा है। दिल्ली से सटे होने के कारण यहां वाहनों की आवाजाही बेहद भारी है। सरकार का तर्क साफ है। जहां सड़कें होंगी, वहां टोल होगा। जहां सड़कें नहीं होंगी, वहां टोल भी नहीं होगा।

गडकरी ने यह भी बताया कि हरियाणा में इस समय करीब 3 से 4 लाख करोड़ रुपये की सड़क परियोजनाएं चल रही हैं। कटरा हाईवे, ईस्टर्न और वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे और द्वारका एक्सप्रेसवे ने राज्य को एक तरह से हाईवे हब बना दिया है।

पास सिस्टम में भी बदलाव

गडकरी ने बताया कि पहले सालाना पास के लिए करीब 15,000 रुपये चुकाने पड़ते थे। अब 3,000 रुपये में 200 ट्रिप का पास मिलेगा। सरकार का कहना है कि इससे एक टोल की औसत कीमत करीब 15 रुपये रह जाएगी। हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह राहत केवल उन्हीं लोगों को मिलेगी जो पास लेने में सक्षम हैं।

हाईवे हब बनने की कीमत

हाईवे हब बनने का मतलब है बेहतर कनेक्टिविटी, तेज यात्रा और लॉजिस्टिक सुविधा। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। हर नया हाईवे अपने साथ नया टोल लेकर आता है। जब एक ही क्षेत्र में कई कॉरिडोर एक दूसरे को काटते हैं, तो टोल की दूरी अपने आप घट जाती है। यही हरियाणा के साथ हुआ।

एनएच 44, एनएच 48, ईस्टर्न और वेस्टर्न पेरिफेरल और द्वारका एक्सप्रेसवे जैसे मार्ग सीमित क्षेत्र में एक दूसरे के समानांतर या क्रॉसिंग में बने। हर मार्ग पर टोल की अनुमति है, नतीजतन एक यात्री को थोड़े से सफर में कई बार भुगतान करना पड़ता है।

नई टोल नीति, राहत की उम्मीद

सरकार मानती है कि मौजूदा टोल व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। इसी वजह से नई टोल नीति की घोषणा की गई है। इस नीति के तहत टोल नाकों पर रुकने की जरूरत नहीं होगी। गाड़ी की नंबर प्लेट और फास्टैग स्कैन होंगे और जितनी दूरी तय की जाएगी, उतना ही टोल कटेगा। इस व्यवस्था को ‘पे ऐज यू ड्राइव’ मॉडल कहा जा रहा है।

रोजमर्रा के यात्रियों पर सबसे ज्यादा असर

हरियाणा में टोल का असर सबसे ज्यादा उन लोगों पर पड़ता है जो रोजाना सफर करते हैं। गुरुग्राम से दिल्ली, सोनीपत से पानीपत, रोहतक से बहादुरगढ़ या फरीदाबाद से गुरुग्राम जाने वाले हजारों लोग रोज टोल देते हैं। महीने के आखिर में यह रकम हजारों रुपये में बदल जाती है। यह खर्च किसी लग्जरी यात्रा का नहीं, बल्कि नौकरी और रोजी रोटी का हिस्सा बन चुका है।

किसानों और छोटे व्यापारियों की परेशानी

किसानों के लिए भी स्थिति आसान नहीं है।  मंडी, शहर या बाजार तक छोटे सफर में भी टोल देना पड़ता है। इससे खेती की लागत बढ़ती है और मुनाफा घटता है। छोटे व्यापारियों और ट्रांसपोर्टरों के लिए भी यही समस्या है। माल ढुलाई महंगी होती है और उसका असर सीधे उपभोक्ता तक पहुंचता है। इस तरह टोल का प्रभाव केवल सड़क तक सीमित नहीं रहता, बल्कि महंगाई से जुड़ जाता है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

विशेषज्ञ इसे विकास का असमान भार मानते हैं। उनका कहना है कि जहां सड़क नेटवर्क घना है और राज्य छोटा है, वहां लोग अपेक्षाकृत ज्यादा भुगतान करते हैं। बड़े राज्यों में यही बोझ औसत होकर कम महसूस होता है।

वे सुझाव देते हैं कि  60 किलोमीटर के मानक का सख्ती से पालन हो। स्थानीय यात्रियों को विशेष रियायत मिले।
पास पास स्थित टोल प्लाजा की समीक्षा हो। दूरी आधारित और बैरियर मुक्त टोलिंग को प्राथमिकता मिले। वसूली और लागत का सार्वजनिक ऑडिट हो।

पहले व्यवस्था यह थी कि अगर आपने 60 किलोमीटर के टोल सेक्शन में 10 किलोमीटर भी सफर किया, तो पूरा शुल्क देना पड़ता था। नई नीति में केवल उतनी ही दूरी का भुगतान करना होगा, जितनी दूरी तय की गई है। सरकार का दावा है कि इससे रोजाना यात्रा करने वालों को सबसे ज्यादा राहत मिलेगी।

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