Explainer : क्या आपकी सांसें भी खतरे में हैं ? जानिये क्यों सर्दियों की हवा बन जाती है फेफड़ों की सबसे बड़ी दुश्मन
Breath Under Risk : स्मॉग की वजह से लोगों की बिगड़ रही सेहत
Breath Under Risk : अगर आपको सुबह उठते ही खांसी आती है, सीने में भारीपन महसूस होता है या थोड़ी सी सीढ़ियां चढ़ने पर सांस फूलने लगती है, तो इसे केवल मौसम की ठंड समझकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। उत्तर भारत की मौजूदा हवा अब सिर्फ आंखों में जलन या गले में खराश तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह फेफड़ों को अंदर से कमजोर कर रही है।
हरियाणा, पंजाब के कई शहरों में दिसंबर के आखिरी दिनों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 300 से 400 के बीच पहुंच गया है। यानी हवा ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ श्रेणी में है। डॉक्टर साफ कहते हैं कि ऐसी हवा में सांस लेना धीरे-धीरे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है, खासकर सीओपीडी के मरीजों के लिए।
सीओपीडी क्या है और यह क्यों खतरनाक है
सीओपीडी यानी क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज एक ऐसी बीमारी है, जिसमें फेफड़ों में हवा का रास्ता धीरे-धीरे संकरा हो जाता है। मरीज को सांस लेने में दिक्कत, लगातार खांसी, बलगम और सीने में जकड़न महसूस होती है। समस्या यह है कि इसके लक्षण धीरे-धीरे बढ़ते हैं, इसलिए लोग समय रहते डॉक्टर तक नहीं पहुंच पाते।
पार्क अस्पताल की पल्मोनोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. अपारजोत बराड़ बताती हैं कि प्रदूषित हवा में मौजूद पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे बारीक कण सीधे फेफड़ों की गहराई तक चले जाते हैं।
वे कहती हैं, ‘सीओपीडी मरीजों के लिए खराब हवा किसी इमरजेंसी जैसी होती है। इससे अचानक हालत बिगड़ सकती है और अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ सकती है।’
सर्दी में प्रदूषण क्यों ज्यादा नुकसान करता है
सर्दियों में हवा भारी हो जाती है। धुआं और धूल ऊपर नहीं उठ पाते और जमीन के पास ही जमा रहते हैं। इसी से स्मॉग बनता है।
इंटरनल मेडिसिन कंसल्टेंट डॉ. कमलदीप सिंह सोढ़ी बताते हैं, ‘ठंडी हवा फेफड़ों की नलिकाओं को सिकोड़ देती है। जब ऊपर से प्रदूषण जुड़ जाता है, तो सांस लेना और कठिन हो जाता है।’
यही वजह है कि हरियाणा के गुरुग्राम, बहादुरगढ़, फरीदाबाद, अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र और यमुनानगर में, साथ ही पंजाब के औद्योगिक जिलों में, इस समय सांस के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं।
अस्पतालों में क्या स्थिति है
चंडीगढ़ के सेक्टर 32 स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज और पीजीआई चंडीगढ़ में बीते सप्ताह सीओपीडी और अस्थमा के मरीजों की संख्या में करीब 30 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
लुधियाना के सिविल अस्पताल और निजी अस्पतालों में यह संख्या सामान्य दिनों से तीन गुना तक पहुंच गई है। डॉक्टरों के अनुसार, कई मरीज ऐसे हैं जिन्हें पहले कभी गंभीर सांस की समस्या नहीं थी।
पहाड़ों में भी खतरे की आहट![]()
अक्सर माना जाता है कि पहाड़ी इलाकों की हवा हमेशा साफ होती है, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। शिमला, बद्दी, सोलन और परवाणू में भी वायु गुणवत्ता खराब दर्ज की जा रही है।
बद्दी औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाला धुआं स्थानीय लोगों के फेफड़ों पर असर डाल रहा है। सोलन मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर बताते हैं कि सांस की बीमारियों के मामलों में करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है।
भारत में सीओपीडी कितनी बड़ी समस्या है
डॉक्टरों के अनुसार, भारत में करीब 6.3 करोड़ लोग सीओपीडी से पीड़ित हैं। यानी दुनिया के हर तीन सीओपीडी मरीजों में से एक भारत में है।
ग्रामीण इलाकों में लकड़ी और कोयले के चूल्हों का धुआं महिलाओं के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है। शहरों में वाहन और उद्योग इस बीमारी को बढ़ा रहे हैं। हर साल 16 लाख से अधिक मौतें सीओपीडी से जुड़ी जटिलताओं के कारण होती हैं।
किन लक्षणों को हल्के में न लें
अगर ये लक्षण लगातार बने हुए हैं, तो सावधान हो जाइए :
- रोज की खांसी और बलगम
- थोड़ी मेहनत में सांस फूलना
- सीने में जकड़न या घरघराहट
- लगातार थकान
- वजन कम होना या पैरों में सूजन
तीन महीने से ज्यादा समय तक ऐसे लक्षण रहना खतरे की घंटी है।
कोविड के बाद क्यों बढ़ा जोखिम
डॉ. कमलदीप सोढ़ी बताते हैं कि कोविड के बाद कई लोगों के फेफड़े पहले से कमजोर हो चुके हैं। वे कहते हैं, ‘कोविड के दौरान फेफड़ों में जो सूजन और फाइब्रोसिस होता है, वह पूरी तरह ठीक नहीं होता। प्रदूषित हवा इसे फिर से सक्रिय कर देती है।’ रिपोर्टों के अनुसार, कोविड से उबरने के बाद हर तीसरा व्यक्ति सांस से जुड़ी किसी न किसी परेशानी से जूझ रहा है।
आम आदमी क्या करे, कैसे बचे
- एक्यूआई बहुत खराब हो तो सुबह बाहर टहलने से बचें
- एन95 मास्क का इस्तेमाल करें
- घर में हवा का निकास सही रखें, जरूरत हो तो एयर प्यूरिफायर लगाएं
- धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनाएं
- हल्का व्यायाम और गहरी सांस लेने के अभ्यास करें
- साल में एक बार फेफड़ों की जांच जरूर कराएं
डॉ. अपारजोत बराड़ कहती हैं, ‘दवा जरूरी है, लेकिन सबसे जरूरी है प्रदूषित हवा से बचाव।’ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ मरीजों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की चेतावनी है। अगर प्रदूषण पर अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में सीओपीडी एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन सकता है।

