Explainer : भारत दूध का देश, फिर भी हर पशुपालक दूध नहीं बेचता : जानिये इसके पीछे की असली वजह
देश में संख्या में पशुपालक दूध बेचते ही नहीं। इसके पीछे जमीनी, आर्थिक और सामाजिक वजहें हैं
Rural Reality : सुबह का समय है। गांव में चूल्हा जल चुका है। बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे हैं। आंगन में बंधी गाय या भैंस को चारा दिया जा रहा है। यहां न तो दूध मापने की मशीन लगी है, न कोई टैंकर खड़ा है, न ही बाजार जाने की जल्दबाजी है। दूध घर में इस्तेमाल होगा, गोबर खेत में जाएगा और बैल आने वाली फसल के लिए खेत जोतने को तैयार रहेंगे।
यही वह भारत है, जिसे हम अक्सर डेयरी सेक्टर की चमकदार तस्वीरों में नहीं देख पाते।
जब भी भारत की डेयरी ताकत की बात होती है, चर्चा दूध उत्पादन के रिकॉर्ड, सहकारी समितियों और बाजार तक सीमित रह जाती है। लेकिन इस ‘दूध के देश’ में एक सच्चाई ऐसी भी है, जो पहली नजर में हैरान करती है।
भारत के हर पशुपालक का दूध बाजार तक नहीं पहुंचता। बल्कि बड़ी संख्या में पशुपालक ऐसे हैं, जो दूध बेचते ही नहीं। यह कोई विरोधाभास नहीं है। यह ग्रामीण भारत की उस जमीनी हकीकत का हिस्सा है, जहां पशुपालन सिर्फ आमदनी का जरिया नहीं, बल्कि पोषण, खेती, परंपरा और बदलते मौसम से जूझते जीवन का आधार है।
इसी अनदेखी सच्चाई को सामने लाता है काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) का ताजा अध्ययन, जो बताता है कि भारत में पशुपालन की कहानी दूध से कहीं आगे जाती है।
जब दूध बाजार नहीं, घर की जरूरत होता है
शहरों में आम धारणा यह है कि पशुपालन का मतलब दूध बेचना और उससे रोज की कमाई करना है। लेकिन गांवों में तस्वीर बिल्कुल अलग है।
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन के अनुसार
- 38 प्रतिशत पशुपालक दूध बेचते ही नहीं हैं
- सात प्रतिशत पशुपालक दूध से ज्यादा गोबर, जुताई और मवेशियों की बिक्री जैसे लाभों को अहम मानते हैं
- 74 प्रतिशत पशुपालक गोबर को खाद, ईंधन या अतिरिक्त आय का साधन मानते हैं
इन आंकड़ों का सीधा मतलब है कि पशुपालन लाखों परिवारों के लिए बाजार से जुड़ा कारोबार नहीं, बल्कि जीवन चलाने की व्यवस्था है। दूध पहले घर की जरूरत पूरी करता है। बचा तो बाजार जाता है।
खेती और पशुपालन, एक ही सिक्के के दो पहलू
ग्रामीण भारत में खेती और पशुपालन को अलग करके नहीं देखा जाता। गाय, भैंस या बैल खेत और घर दोनों के लिए जरूरी हैं।
- दूध बच्चों और बुजुर्गों के पोषण का आधार है
- गोबर खेत की मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखता है
- बैल आज भी कई इलाकों में खेती की रीढ़ बने हुए हैं
झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में आधे से अधिक पशुपालक दूध बेचने की बजाय घरेलू खपत और गोबर के उपयोग को प्राथमिकता देते हैं।
हैरानी की बात यह है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े डेयरी राज्यों में भी 30 प्रतिशत से अधिक पशुपालक दूध के अलावा मिलने वाले लाभों को ज्यादा अहम मानते हैं।
यह बताता है कि डेयरी की असली तस्वीर सिर्फ दुग्ध संग्रह केंद्रों और प्रोसेसिंग यूनिट्स तक सीमित नहीं है।
देसी नस्लें और टिकाऊ पशुपालन की सोच
दूध न बेचने वाले पशुपालकों में स्वदेशी नस्लों की मौजूदगी ज्यादा दिखती है। इसकी वजह बेहद व्यावहारिक है।
स्वदेशी नस्लें
- कम चारे में भी टिक जाती हैं
- स्थानीय मौसम के अनुकूल होती हैं
- बीमारियों के प्रति ज्यादा सहनशील मानी जाती हैं
- गोबर और खेती के लिहाज से ज्यादा उपयोगी होती हैं
इसके उलट, ज्यादा दूध देने वाली संकर नस्लों की देखभाल महंगी होती है। उन्हें ज्यादा चारा चाहिए, नियमित इलाज जरूरी होता है और गर्मी का असर भी ज्यादा पड़ता है।
इसीलिए कई पशुपालक ज्यादा दूध के बजाय भरोसेमंद और टिकाऊ पशुपालन को चुनते हैं।
जलवायु परिवर्तन, जो अब रोज की चिंता बन चुका है
सीईईडब्ल्यू का अध्ययन साफ बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की बात नहीं रही।
अध्ययन के अनुसार
- 54 प्रतिशत भैंस पालक
- 50 प्रतिशत संकर नस्ल पालक
- 41 प्रतिशत स्वदेशी नस्ल पालक
मानते हैं कि गर्मी का असर बढ़ा है, बीमारियां ज्यादा हो रही हैं और मवेशियों की मृत्यु दर में भी इजाफा हुआ है। स्वदेशी नस्लें इन हालातों को कुछ हद तक सहन कर लेती हैं, लेकिन अधिक दूध की चाह में संकर नस्लों और भैंसों पर बढ़ती निर्भरता पशुपालन को ज्यादा जोखिम भरा बना रही है।
चारा संकट, जिस पर कम बात होती है
आज पशुपालन के सामने सबसे बड़ी चुनौती चारे की है। सीईईडब्ल्यू के अनुसार चार में से तीन पशुपालक चारे और भूसे की समस्या से जूझ रहे हैं।
- चारा महंगा होता जा रहा है
- चारागाह लगातार सिमट रहे हैं
- चारे की खेती के लिए जमीन कम होती जा रही है
सबसे गंभीर तथ्य यह है कि
- 80 प्रतिशत पशुपालक साइलेज और राशन-संतुलन जैसे उपायों से अनजान हैं
- इन्हें अपनाने की दर सिर्फ पांच प्रतिशत है
यह बताता है कि संकट सिर्फ संसाधनों का नहीं, बल्कि जानकारी और पहुंच का भी है।
छोटे पशुपालक, जिन पर टिका पूरा ढांचा
ग्रामीण भारत में आधे से ज्यादा पशुपालकों के पास केवल एक या दो मवेशी हैं।
ये छोटे पशुपालक
- कुल दूध उत्पादन का 29 प्रतिशत
- कुल दूध बिक्री का 22 प्रतिशत योगदान देते हैं।
बड़े पशुपालक बाजार में ज्यादा दिखते हैं, लेकिन व्यवस्था को जमीनी स्तर पर संभालने का काम छोटे पशुपालक ही करते हैं।
नीति और जमीनी हकीकत के बीच फासला
सीईईडब्ल्यू के विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की डेयरी नीतियां अब भी दूध उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित हैं। जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि पशुपालन एक व्यापक आजीविका तंत्र है, जिसमें दूध सिर्फ एक हिस्सा है।
- हर राज्य, हर गांव और हर पशुपालक की जरूरत अलग है।
- एक जैसी नीतियां इस विविधता को नहीं समझ पातीं।
आगे सोचने की जरूरत
सीईईडब्ल्यू की सिफारिशें साफ संकेत देती हैं कि पशुपालन को सिर्फ डेयरी के नजरिये से देखना अब पर्याप्त नहीं है।
- नीतियां स्थानीय जरूरतों के अनुसार हों
- पशु चिकित्सा सेवाएं अंतिम सिरे तक पहुंचें
- गोबर आधारित खाद और ऊर्जा को बढ़ावा मिले
- स्थानीय चारा समाधान विकसित किए जाएं
- पशुपालन योजनाओं में जलवायु अनुकूलन को जगह दी जाए
भारत का पशुपालन सेक्टर केवल दूध की धार नहीं है। यह बच्चों के पोषण, खेतों की उर्वरता, परंपरा और बदलते मौसम से जूझते ग्रामीण जीवन की साझा कहानी है।
अगर नीतियां इस सच्चाई को समझें और स्वीकार करें, तो पशुपालन न केवल ग्रामीण भारत को संभालेगा, बल्कि आने वाले समय में उसे ज्यादा टिकाऊ और मजबूत भी बनाएगा।

