Explainer : हरियाणा, पंजाब और हिमाचल में नल का पानी कितना भरोसेमंद ? जानिये रिपोर्ट ने क्यों दिखाई खतरे की तस्वीर
जर्जर पाइपलाइन, सीवेज क्रॉस-कनेक्शन और कमजोर टेस्टिंग ने बढ़ाई मुश्किलें ; हजारों लोग प्रभावित
Water Safety Report : हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में पानी अब केवल बुनियादी सुविधा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर खतरा बन गया है। इंटीग्रेटेड हेल्थ डाटा के ताजा विश्लेषण से पता चला है कि पिछले 5 वर्षों में इन राज्यों में जलजनित बीमारियों के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। विशेषज्ञ इसे ‘साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी’ कह रहे हैं।
पंजाब में पिछले पांच सालों में 38,000 से अधिक एक्यूट डायरियल डिजीज (एडीडी) के मामले दर्ज हुए हैं। हरियाणा में टायफाइड के केस लगातार बढ़ते जा रहे हैं, खासकर तेजी से शहरीकरण वाले जिलों जैसे गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत और रोहतक में। हिमाचल प्रदेश में एडीडी के साथ-साथ हेपेटाइटिस-बी के मामलों में भी बढ़ोतरी देखी गई है, जो यह संकेत देता है कि पहाड़ी जलस्रोत अब सुरक्षित नहीं रहे।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ मौसमी उछाल नहीं, बल्कि पानी की गुणवत्ता और वितरण प्रणाली की संरचनात्मक खामियों का नतीजा है। पंजाब के कई ग्रामीण इलाकों में दशकों पुरानी पाइपलाइनें अभी भी इस्तेमाल में हैं। कई जगह पाइपलाइनें सीवेज नेटवर्क के बहुत करीब बिछी हुई हैं। जर्जर पाइपों में मामूली लीकेज भी दूषित पानी को सीधे सप्लाई में मिला देता है। गर्मी और बरसात के मौसम में स्थिति और खराब हो जाती है, और इस दौरान एडीडी के मामलों में अचानक उछाल देखने को मिलता है।
स्वास्थ्य आंकड़ों से क्यों बढ़ी चिंता
रिपोर्टों के अनुसार पिछले 5 वर्षों में इन तीनों राज्यों में एडीडी, टाइफाइड, हेपेटाइटिस और अन्य जलजनित रोगों के हजारों मामले दर्ज किए गए।
पंजाब में 38,000 से अधिक एक्यूट डायरियल डिजीज यानी एडीडी के मामले सामने आए। हरियाणा में टाइफाइड के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई, खासकर तेजी से विकसित होते शहरी जिलों में। हिमाचल प्रदेश में मानसून के बाद दस्त और हेपेटाइटिस से जुड़े मामलों में उछाल देखा गया।
नेशनल सेंटर फार डिसिजिज कंट्रोल की रोग निगरानी प्रणाली बताती है कि जलजनित रोगों में मौसमी बढ़ोतरी सामान्य है, लेकिन लगातार ऊंचे बने रहना आपूर्ति और गुणवत्ता नियंत्रण की कमजोरी की ओर इशारा करता है।
भूजल की गुणवत्ता पर क्या कहती हैं रिपोर्टें
सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड Central Ground Water Board की वार्षिक रिपोर्ट में पंजाब के कई जिलों में यूरेनियम की मात्रा सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई। मीडिया रिपोर्टों में लगभग 62.5 प्रतिशत नमूनों में मानक से अधिक स्तर का उल्लेख किया गया।
सिर्फ यूरेनियम ही नहीं, नाइट्रेट, फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसे तत्व भी कई क्षेत्रों में निर्धारित सीमा से अधिक दर्ज किए गए। इसका अर्थ है कि समस्या केवल बैक्टीरिया से फैलने वाले संक्रमण तक सीमित नहीं है, बल्कि रासायनिक प्रदूषण भी गंभीर स्तर पर मौजूद है।
पाइपलाइन और सीवेज व्यवस्था बनी बड़ी वजह
जमीनी रिपोर्टों में सामने आया कि कई शहरों और गांवों में दशकों पुरानी पाइपलाइनें आज भी उपयोग में हैं। पेयजल और सीवेज लाइनें कई स्थानों पर बेहद नजदीक बिछी हैं। जंग लगे पाइपों में मामूली लीकेज भी दूषित पानी को सीधे सप्लाई में मिला देता है।
हरियाणा के शहरी विस्तार वाले क्षेत्रों में नई कॉलोनियों का दबाव पुरानी व्यवस्था झेल नहीं पा रही। पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में भी पाइपलाइन रखरखाव की कमी सामने आई। मानसून और गर्मी के महीनों में संक्रमण के मामलों में उछाल इसी संरचनात्मक कमजोरी की ओर संकेत करता है।
हिमाचल में भी बदली तस्वीर
पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक जल स्रोतों को पारंपरिक रूप से सुरक्षित माना जाता रहा है, लेकिन भारी वर्षा, भूस्खलन और मिट्टी के बहाव से स्रोत दूषित हो रहे हैं। कई गांवों में मानसून के दौरान पानी के रंग और गंध में बदलाव की शिकायतें दर्ज की गईं।
World Bank की ग्रामीण पेयजल प्रबंधन पर आधारित अध्ययन रिपोर्ट में स्रोत संरक्षण, नियमित सैंपलिंग और सामुदायिक निगरानी की सिफारिश की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी राज्यों में भी वैज्ञानिक निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
योजनाएं और जमीनी हकीकत
जल जीवन मिशन के तहत घर घर नल कनेक्शन दिए जा रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कनेक्शन देना पर्याप्त नहीं है।
- नियमित क्लोरीनीकरण
• पाइपलाइन का समय पर रखरखाव
• मासिक जल गुणवत्ता रिपोर्ट का प्रकाशन
• स्वतंत्र प्रयोगशालाओं द्वारा परीक्षण
इन कदमों के बिना भरोसा कायम नहीं रह सकता। कुछ शहरों में राज्य स्तरीय जल गुणवत्ता प्रयोगशाला स्थापित करने की पहल की गई है, लेकिन व्यापक स्तर पर निगरानी अभी भी चुनौती है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय रहते संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए तो जलजनित रोगों का बोझ बढ़ सकता है। बच्चे, बुजुर्ग और कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
वे सुझाव देते हैं कि
- जर्जर पाइपलाइन का चरणबद्ध पुनर्निर्माण
• सीवेज और पेयजल लाइनों के बीच सुरक्षित दूरी सुनिश्चित करना
• मानसून से पहले जल स्रोतों का वैज्ञानिक ऑडिट
• जल गुणवत्ता डेटा को सार्वजनिक करना
हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में पानी की गुणवत्ता को लेकर उठते सवाल केवल आंकड़ों की कहानी नहीं हैं। यह घर घर तक पहुंचने वाली व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है। पानी दिखने में साफ हो सकता है, लेकिन रिपोर्टों में सामने आए तथ्य संकेत देते हैं कि सतर्कता और सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

