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NDA Success-Women In Defence : कभी एनडीए में लड़कियों की 'नो-एंट्री' थी, आज रोपड़ की बेटी है नंबर 1... आखिर कैसे तय हुआ आसमान तक पहुंचने का यह सफर?

हौसले की उड़ान: रक्षा क्षेत्र में आधी आबादी का पूरा दम : सब हेड: 1954 से जहां लड़कियों की एंट्री बैन थी, वहां आज पंजाब के किसान की बेटी ने टॉप किया है। पढ़ें एनडीए में महिलाओं के संघर्ष, चुनौतियों और मोहाली के उस संस्थान की कहानी, जो बदल रहा है सेना की तस्वीर

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महकप्रीत कौर (बाएं) और कोमलप्रीत कौर।
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NDA Success-Women In Defence : पंजाब के रूपनगर यानी रोपड़ जिले के एक छोटे से गावं पपराली की बेटी महकप्रीत कौर ने वायु सेना अकादमी की मेरिट लिस्ट में ऑल इंडिया रैंक 1 हासिल कर पूरे देश में अपनी प्रतिभा का डंका बजाया है। यह कामयाबी महज एक प्रतियोगी परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सैन्य व्यवस्था में शीर्ष पर पहुंचने की कहानी है, जहां महिलाओं के लिए जगह आज भी नाममात्र है। ऐसे में पंजाब, हरियाणा और ट्राईसिटी (चंडीगढ़, पंचकूला औरर मोहाली) के उन लाखों परिवारों के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित सैन्य परीक्षा की तैयारी कैसे होती है, मोहाली का माई भागो एएफपीआई इसमें कैसे मदद कर रहा है और सेना में बेटियों के भविष्य की राह कितनी चुनौतीपूर्ण और शानदार है।

एनडीए क्या है और इसका रास्ता कितना कठिन?

राष्ट्रीय रक्षा अकादमी महाराष्ट्र के पुणे स्थित खड़कवासला में है, जो थल सेना, नौसेना और वायु सेना के लिए कैडेट्स तैयार करती है। 12वीं के बाद सीधे सेना में अधिकारी बनने का यह सबसे बेहतरीन और प्रतिष्ठित रास्ता है। संघ लोक सेवा आयोग साल में दो बार इसकी परीक्षा लेता है।

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चयन प्रक्रिया और चुनौतियां

चयन प्रक्रिया बेहद कठिन है। कुल 1800 अंकों की इस प्रक्रिया में 900 अंकों की लिखित परीक्षा और 900 अंकों का पांच दिवसीय एसएसबी इंटरव्यू शामिल होता है। एसएसबी में मानसिक चुस्ती, नेतृत्व क्षमता और शारीरिक फिटनेस की कड़ी परख होती है। वायु सेना में जाने वाली महकप्रीत जैसी बेटियों को एक और बाधा पार करनी होती है, जिसे कंप्यूटराइज्ड पायलट सिलेक्शन सिस्टम टेस्ट कहते हैं। इसे जिंदगी में सिर्फ एक बार ही दिया जा सकता है।

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सेना में महिलाओं को अवसर इतनी आसानी से नहीं मिले हैं। संघ लोक सेवा आयोग ने एनडीए-2 के लिए कुल 394 रिक्तियां निकालीं, जिनमें महिलाओं की हिस्सेदारी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। असल में, साल 1954 में बने एनडीए में महिलाओं की एंट्री सालों तक बैन थी। वे केवल शॉर्ट सर्विस कमीशन के जरिए जा सकती थीं, स्थायी कमीशन के दरवाजे उनके लिए बंद थे।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

अगस्त 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इस नीति को मानसिकता की समस्या और लिंग के आधार पर भेदभावपूर्ण मानते हुए महिलाओं को एनडीए परीक्षा में बैठने का ऐतिहासिक अंतरिम आदेश दिया। इसके बाद सरकार ने महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित कीं, जैसे थल सेना में 10, नौसेना में 3 और वायु सेना फ्लाइंग ब्रांच में 2 सीटें। इतनी कम सीटों के बीच ऑल इंडिया रैंक 1 लाना एक असाधारण उपलब्धि है।

माई भागो एएफपीआई: जहां तराशे जा रहे हैं देश के 'हीरे'

महकप्रीत की इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे मोहाली स्थित माई भागो आर्म्ड फोर्सेज प्रिपरेटरी इंस्टीट्यूट फॉर गर्ल्स की बड़ी भूमिका है। पंजाब सरकार का यह अपनी तरह का इकलौता संस्थान है। साल 2023 में यहां विशेष एनडीए प्रिपरेटरी विंग शुरू किया गया, जहां 40 लड़कियों को एनडीए के लिए तैयार किया जाता है।

सुविधाएं और अवसर

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के नाम पर बने इसके 2.46 करोड़ रुपये के हॉस्टल में इनडोर शूटिंग रेंज से लेकर साइबर लैब और बेहतरीन फिटनेस सुविधाएं मौजूद हैं। 10वीं पास या 11वीं में पढ़ने वाली पंजाब निवासी लड़कियां यहां आवेदन कर सकती हैं और इसका पूरा खर्च राज्य सरकार उठाती है। इस संस्थान की तीन पूर्व छात्राएं पहले ही वायु सेना में फ्लाइंग ऑफिसर और एक छात्रा नौसेना में सब-लेफ्टिनेंट बन चुकी हैं।

मेरिट लिस्ट से वर्दी तक: कैसा होता है सफर?

चयन के बाद का सफर और भी रोमांचक होता है। कैडेट्स तीन साल के लिए खड़कवासला या एझिमाला जाते हैं। यहां उन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन की डिग्री और कड़ी सैन्य ट्रेनिंग मिलती है।

ट्रेनिंग और कमीशन

इसके बाद कैडेट्स अपनी-अपनी अकादमियों में जाते हैं। वायु सेना कैडेट्स को डेढ़ साल की फ्लाइंग ट्रेनिंग दी जाती है। एक साल बाद प्रोविजनल कमीशन और छह महीने बाद स्थायी कमीशन मिलता है। ट्रेनिंग के दौरान कैडेट्स को 56,100 रुपये प्रति माह का स्टाइपेंड भी दिया जाता है।

महकप्रीत कौर अब वायु सेना अकादमी हैदराबाद जाएंगी, जबकि ऑल इंडिया रैंक 18 हासिल करने वाली कोमलप्रीत कौर खड़कवासला जाएंगी। इन बेटियों ने साबित कर दिया है कि अगर सही अवसर और तैयारी मिले, तो पंजाब के किसान और सैनिक परिवारों की लड़कियां देश के सर्वोच्च मुकाम पर अपना परचम लहरा सकती हैं।

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