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Explainer : न वारंट, न जेल फिर भी गिरफ्तार ! जानिए क्या है ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खतरनाक खेल

ठग खुद को सीबीआई या बैंक अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर लोगों को कैद कर रहे हैं। डर और भरोसे के बीच फंसे लोग अपनी जीवनभर की बचत खो रहे हैं, जबकि असली पुलिस तक उन्हें ठग लगने लगती है।

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Digital Arrest :  फोन बजता है। सामने से सधी हुई आवाज आती है। ‘मैं सीबीआई से बोल रहा हूं, आपके नाम पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज है।’ घबराया व्यक्ति कुछ समझ नहीं पाता। दूसरी ओर से आदेश मिलता है। ‘आप अब जांच के अधीन हैं, कैमरा चालू करें और जहां हैं वहीं रहें।’ उसी क्षण उसकी दुनिया थम जाती है।

यह है ‘डिजिटल अरेस्ट’, साइबर अपराध का नया और खतरनाक रूप। इसमें अपराधी किसी को जेल नहीं भेजते, बल्कि उसे उसके ही फोन के कैमरे के सामने कैद कर देते हैं। वे खुद को सरकारी अधिकारी बताते हैं। आवाज अधिकारपूर्ण होती है और डर इतना गहरा होता है कि लोग अपने ही घर में बंदी बन जाते हैं।अब तक देशभर में साढ़े 13 लाख से ज्यादा मामले डिजिटल अरेस्ट के दर्ज हो चुके हैं।

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क्या है ‘डिजिटल अरेस्ट’

डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक ठगी है। इसमें ठग किसी व्यक्ति को यह विश्वास दिला देते हैं कि वह किसी गंभीर अपराध में फंस चुका है और जब तक वह सहयोग नहीं करेगा, तब तक उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

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वे पीड़ित को कैमरे के सामने बैठाए रखते हैं और कहते हैं कि वह जांच के दौरान किसी से बात न करे। कई बार यह वर्चुअल हिरासत कई दिनों तक चलती है। इसी दौरान ठग पीड़ित से पैसे ट्रांसफर करवाते हैं या उसके बैंक खातों पर नियंत्रण हासिल कर लेते हैं।

कैसे फंसाते हैं ठग

  1. पहला कदम : डराना  ठग कहते हैं कि आपके नाम से बैंक ट्रांजेक्शन या अपराध हुआ है।
  2. दूसरा कदम : भरोसा दिलाना वे फर्जी आईडी, सरकारी प्रतीक और कोर्ट ऑर्डर दिखाते हैं।
  3. तीसरा कदम : डिजिटल कैद कहते हैं कि कैमरे के सामने रहें और किसी से बात न करें।
  4. चौथा कदम : ठगी ‘इनसेंस सर्टिफिकेट’, ‘वेरिफिकेशन फीस’ या ‘जांच शुल्क’ के नाम पर रकम मंगाई जाती है।
  5. पांचवां कदम: नियंत्रण कई बार वे रिमोट एक्सेस ऐप डाउनलोड करवाकर बैंक खातों से पैसे निकाल लेते हैं।

डिजिटल अरेस्ट के असली केस : डर और भरोसे की सच्ची कहानियां

चंडीगढ़: रिटायर्ड अधिकारी से 85 लाख की ठगी : हरियाणा सरकार के डीएलआर विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी अमरनाथ चावला को ठगों ने विजिलेंस और बैंक अधिकारी बनकर कॉल की। कहा गया कि वे मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसे हैं और केस रोकने के लिए उन्हें ‘प्रायोरिटी इनसेंस सर्टिफिकेट’ लेना होगा।
डर के कारण उन्होंने कई बार अलग अलग खातों में पैसे ट्रांसफर किए और 85 लाख रुपये की ठगी का शिकार हुए। चंडीगढ़ साइबर सेल ने इंदौर निवासी अंकित गुप्ता को गिरफ्तार किया है।

फतेहाबाद: सरकारी एजेंसी बनकर 13 लाख की ठगी : भूना निवासी लेखराज को कुछ लोगों ने खुद को सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर कॉल की। उन्होंने डिजिटल अरेस्ट की झूठी कहानी सुनाई और 13 लाख रुपये ठग लिए। पुलिस ने आगरा जिले के तन्मय कुमार और विष्णु कुमार को गिरफ्तार किया और डेढ़ लाख रुपये बरामद किए।

पानीपत: 17 दिन तक कैमरे के सामने बंदी : रिटायर्ड थर्मल कर्मचारी सुभाष चंद्र को ठगों ने खुद को मुंबई क्राइम ब्रांच और सीबीआई अधिकारी बताकर डराया। कहा गया कि उनके बैंक खाते से अपराधियों ने लेनदेन किया है।
सुभाष 17 दिन तक वीडियो कॉल पर बैठे रहे और अपनी जीवनभर की कमाई 42 लाख 70 हजार रुपये ट्रांसफर कर दिए।

फरीदाबाद: मनी लॉन्ड्रिंग और ट्रैफिकिंग का डर : फरीदाबाद के सुबोध को ठगों ने बताया कि उनका नाम मनी लॉन्ड्रिंग और ह्यूमन ट्रैफिकिंग केस में सामने आया है। वे खुद को सीबीआई, डीसीपी बैंगलोर और टेलीकॉम विभाग का अधिकारी बताते रहे। सुबोध को पांच दिन तक कैमरे के सामने रखा गया और 81 लाख रुपये उनके खातों से निकलवा लिए गए।

कानपुर: 70 दिन की कैद, 53 लाख की ठगी : रिटायर्ड इंजीनियर रमेश चंद्र को ठगों ने बताया कि उनके नाम से सिम लेकर किसी महिला को परेशान किया गया, जिसने आत्महत्या कर ली। फर्जी कोलाबा पुलिस स्टेशन से वीडियो कॉल कर उन्हें धमकाया गया कि सहयोग नहीं किया तो परिवार समेत जेल भेज दिया जाएगा।
रमेश 70 दिन तक अपने घर में बंद रहे और 53 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए।

कोटद्वार: प्राध्यापिका से 1.11 करोड़ रुपये की ठगी : उत्तराखंड के कोटद्वार की कॉलेज प्राध्यापिका को ठगों ने सीबीआई और सुप्रीम कोर्ट का अधिकारी बनकर फंसाया। उन्हें 12 दिन तक वीडियो कॉल पर डिजिटल अरेस्ट में रखा गया। प्राध्यापिका ने एफडी तुड़वाकर 1.11 करोड़ रुपये ठगों के बताए खातों में भेज दिए। मुकदमा दर्ज होने के बाद भी ठग लगातार फोन करते रहे।

अहमदाबाद: जब अधिकारियों की सूझबूझ से बचे बुजुर्ग 

अहमदाबाद में तीन बुजुर्ग डिजिटल अरेस्ट के जाल में फंस चुके थे। वे पैसे निकालकर भेजने ही वाले थे कि बैंक और म्यूचुअल फंड अधिकारियों की सूझबूझ से 2.21 करोड़ रुपये की ठगी रुक गई। तीनों बुजुर्ग इतने भयभीत थे कि असली पुलिस पर भी उन्हें भरोसा नहीं हुआ। दो मामलों में बहस और हाथापाई तक की नौबत आ गई।

  • घाटलोडिया क्षेत्र में म्यूचुअल फंड अधिकारी पलक दोशी ने 1.43 करोड़ रुपये का ट्रांजेक्शन रोका।
    • सैटेलाइट क्षेत्र में बैंक मैनेजर जयेश गांधी ने 45 लाख रुपये ओडिशा खाते में जाने से रोके।
    • मणिनगर क्षेत्र में पूर्व क्रिकेट कोच का फोन देखकर अभिषेक सिंह ने 33 लाख रुपये की ठगी रोकी।

13.36 लाख से ज्यादा केस दर्ज

वित्तीय धोखाधड़ी की तत्काल रिपोर्टिंग और धोखेबाजों द्वारा धन की हेराफेरी रोकने के उद्देश्य से वर्ष 2021 में I4C के तहत ‘नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग और प्रबंधन प्रणाली’ की शुरुआत की गई। अब तक 13.36 लाख से अधिक शिकायतों के मामलों में 4,386 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि को बचाया जा चुका है। ऑनलाइन साइबर शिकायत दर्ज करने में सहायता के लिए टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर ‘1930’ भी चालू किया गया है।

पुलिस ने बताए.. डिजिटल अरेस्ट के संकेत

  • व्यक्ति का अचानक खुद में सिमट जाना
    • हर समय घबराया रहना या फोन बंद रखना
    • बैंक से बड़ी रकम निकालने की जल्दबाजी
    • परिवार या पुलिस से बात करने से इनकार करना

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती : यह जनता के भरोसे पर हमला है

हरियाणा के बुजुर्ग दंपति की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराध केवल ठगी नहीं हैं। जस्टिस Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर अपराधियों ने वरिष्ठ नागरिकों सहित देशभर में पीड़ितों से करीब तीन हजार करोड़ रुपये वसूल लिए हैं।

पीठ ने टिप्पणी की कि एजेंसियों के हाथ मजबूत करने के लिए न्यायिक निर्देश आवश्यक हैं और अदालत आवश्यक होने पर सख्त आदेश देने से पीछे नहीं हटेगी। कोर्ट ने कहा कि यह न्यायपालिका और सरकारी संस्थानों के नाम का दुरुपयोग है और जनता के भरोसे पर सीधा हमला है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से निर्देश दिया कि इस अपराध से निपटने के लिए सभी संबंधित एजेंसियों की संयुक्त और प्रभावी रणनीति तैयार की जाए।

अदालत के निर्देश

  • सीबीआई सभी राज्यों में मामलों की संयुक्त जांच करे और इंटरपोल से सहयोग ले।
    • आरबीआई और बैंक एआई के जरिये संदिग्ध खातों की पहचान कर तुरंत फ्रीज करें।
    • राज्य सरकारें क्षेत्रीय साइबर कोऑर्डिनेशन सेंटर बनाएं।
    • टेलीकॉम कंपनियां एक व्यक्ति को कई सिम कार्ड जारी न करें।
    • आईटी प्लेटफॉर्म्स सीबीआई को तकनीकी सहायता दें ताकि विदेशी नेटवर्क पकड़े जा सकें।

मुआवजा योजना पर विचार : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ब्रिटेन की तर्ज पर भारत में भी पीड़ितों के लिए मुआवजा व्यवस्था बनाई जाए, जहां बैंकिंग सिस्टम के जरिये ठगी की रकम वापस दिलाई जाती है।

अम्बाला का मामला बना आधार : यह पूरा मामला हरियाणा के अंबाला में एक बुजुर्ग दंपती के डिजिटल अरेस्ट से जुड़े प्रकरण के स्वतः संज्ञान के बाद सामने आया। ठगों ने सुप्रीम कोर्ट और जांच एजेंसियों के फर्जी आदेश दिखाकर दंपती से एक करोड़ पांच लाख रुपये से अधिक की ठगी की थी। अदालत ने इस प्रकरण में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से भी सहयोग मांगा था।

सीजेआई को पत्र, फर्जी आदेशों का जाल : इस मामले में 73 वर्षीय महिला ने 21 सितंबर को तत्कालीन सीजेआई बी आर गवई को पत्र लिखकर बताया कि 3 से 16 सितंबर 2025 के बीच उन्हें और उनके पति को निगरानी और गिरफ्तारी का डर दिखाकर कई बैंक लेनदेन के जरिये रकम वसूल ली गई। महिला का आरोप था कि ठगों ने ईडी फ्रीज आदेश, पीएमएलए के तहत गिरफ्तारी आदेश और निगरानी आदेश दिखाए, जो ऑडियो और वीडियो कॉल पर सीबीआई, ईडी और न्यायिक अधिकारियों का रूप धारण कर पेश किए गए।

क्यों फंस जाते हैं लोग

  • ठग सरकारी प्रतीक और अधिकार की भाषा का इस्तेमाल करते हैं।
  • डेटा लीक के कारण उन्हें लोगों की निजी जानकारी पहले से मिल जाती है।
  • लगातार कॉल और धमकियों से व्यक्ति निर्णय लेने की क्षमता खो देता है।
  • वीडियो कॉल देखकर उसे लगता है कि सामने असली अधिकारी है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट तकनीकी अपराध नहीं, बल्कि मानसिक नियंत्रण की ठगी है। इसमें अपराधी तकनीक नहीं, बल्कि इंसान के भय और भरोसे को निशाना बनाते हैं।
राष्ट्रीय साइबर अपराध प्रकोष्ठ के अनुसार पिछले एक वर्ष में ऐसे मामलों में चार गुना वृद्धि हुई है। अधिकांश पीड़ित शिक्षित, मध्यमवर्गीय और तकनीकी रूप से जागरूक लोग हैं, जो कानून से डरकर ठगों पर भरोसा कर लेते हैं।

कैसे बचें इस वर्चुअल गिरफ्तारी से

  • किसी भी कॉल पर अपनी बैंक डिटेल, आधार या ओटीपी साझा न करें।
  • सरकारी एजेंसियां कभी वीडियो कॉल पर जांच नहीं करतीं।
  • रिमोट एक्सेस ऐप डाउनलोड न करें।
  • अगर कोई आपको डराए या धमकाए तो तुरंत शिकायत करें।

राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन: 1930
cybercrime.gov.in

परिवार और दोस्तों को जरूर बताएं, क्योंकि चुप रहना ठगों का सबसे बड़ा हथियार है। अब वक्त है डिजिटल हिम्मत और जागरूकता दिखाने का, ताकि कोई भी व्यक्ति अपने ही फोन पर गिरफ्तार न हो।

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