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Explainer : 22 दिन का तप और एक दिन की जागर, उत्तराखंड में इसलिए मिलते हैं भाई-बंधु और रिश्तेदार

सुख-समृद्धि की कामना के लिए कठिन तप बैसी

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Explainer : जागर में पहुंच रहे हो ना। बैसी में तो आओगे ही। प्रवासी उत्तराखंडियों से अक्सर उनके भाई-बंधु और बिरादर इस तरह के सवाल पूछते हैं। असल में गांव के गांव खाली हो चुके उत्तराखंड के अनेक इलाकों में खास मौकों पर जब बिरादर जुटते हैं तो कुछ दिनों के लिए ही सही, रौनक आ जाती है। ये मौके होते हैं बैसी या जागर।

शादी-ब्याह या अन्य पारिवारिक आयोजनों में भले ही लोग कम जुट पाते हों, लेकिन इसे आने वाली पीढ़ी के दुआ मांगने की कवायद कहें या परिवार पर ईश्वर की कृपा बनी रहने की बात, लोग उक्त धार्मिक कार्यक्रमों में जरूर जुटते हैं। उत्तराखंड की एक कहावत वहां की हकीकत को बयां करती है जिसमें कहा गया है कि 'पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी वहां की काम नहीं आती।' यानी उत्तराखंड से पलायन की विकराल समस्या।

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हालांकि पिछले कुछ समय से स्थिति में सुधार हुआ है। 'रिवर्स पलायन' भी हो रहा है। फिर भी आज गांवों में सूनापन है। अगर कहीं लोग हैं तो इक्का-दुक्का बुजुर्ग। ऐसे में जब बैसी या जागर होती है तो लोग जुटते हैं, पूजा-पाठ संपन्न कराते हैं, भंडारा होता है। कुछ दिनों तक बिरादरों का आपसी मिलन से घर-आंगन चहक उठते हैं। इन अनुष्ठानों का प्रयोजन महज मिलन ही नहीं, बल्कि इसके पीछे अनेक अन्य कारण भी हैं। पहले जानते हैं कि बैसी और जागर हैं क्या?

सुख-समृद्धि की कामना के लिए कठिन तप बैसी

असल में बैसी एक ऐसा धार्मिक अनुष्ठान है जो 22 दिनों तक चलती है। इसे सामान्यत: कुटुंब की सुख-समृद्धि की कामना के निमित्त किया जाताा है। श्रद्धालु पूरे 22 दिन तक बहुत कड़े नियमों का पालन करते हैं। इनमें से प्रमुख हैं, एक वक्त भोजन, नंगे पांव चलना, धूनी रमाकर रहना, सिर्फ धोती पहनकर ही पूजा स्थल पर रहना। कुछ जगह बैसी का आयोजन गांव में सुख-समृद्धि एवं अच्छी फसल के लिए भी होता है। बैसी में आने वाले दूर-दराज से मित्र, परिजन आध्यात्मिक भाव से आते हैं।

माना जाता है कि इस तरह का धार्मिक आयोजन आध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। अमूमन बैसी साल में दो बार आयोजित होती हैं। एक पौष माह (दिसंबर-जनवरी) और दूसरा सावन (जून-जुलाई)। चूंकि दोनों ही वक्त स्कूलों में भी छुट्टियों का होता है तो इसलिए भी प्रवासी उत्तराखंडियों को जाने में परेशानी नहीं होती। सामान्यत: बैसी शिव मंदिरों में होती है। वैसे किसी भी मंदिर प्रांगण में इसका आयोजन होता है। धूनी के आसपास लोग भजन-कीर्तन करते हैं, जबकि मुख्य व्रती श्रद्धालु परिक्रमा करते रहते हैं। बैसी के अंतिम दिन भंडारा लगता है जिसमें पूरा कुटुंब या गांव जुटता है। कुछ श्रद्धालु इन दिनों मुंडन भी करते हैं।

धार्मिक जोश है जागर

उत्तराखंड के कुल देवताओं में भोलेनाथ (भोलनाथ), गंगनाथ, सैम, ग्वेल देवता, ऐरी आदि हैं। सालभर या दो साल में एक बार लोग इन देवताओं का आह्वान करते हैं। पारंपरिक वाद्य यंत्र हुड़का, ढोल के अलावा थाली आदि बजाई जाती हैं। संयमित जीवन जीने वाला कोई डंगरिया (ऐसा व्यक्ति जो उस वक्त नाचने लगता है और उसे ईश्वर का रूप माना जाता है) नाचता है। वाद्य यंत्र बजाने वाले कलाकार कई कथाओं को भी कहते हैं। इनमें शक्ति देवी, नाग देवता, महाभारत एवं धार्मिक स्थलों के कुछ चरित्रों का गायन के माध्यम से चित्रण किया जाता है।

जागर में कई बार कुल देवियों का भी आह्वान किया जाता है। संगीत की थिरकन के दौरान कुछ और लोग भी नाचने लगता है जिसका समाधान संबंधित डंगरिया निकालता है। दावा किया जाता है कि जागर के धार्मिक महत्व के अलावा आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व भी हैं। ध्वनि तरंगे हमें जागृत करती हैं और यह जागृति मन को स्थिर रखने में बहुत कारगर होती है। वैसे उत्तराखंड की तरह ऐसी परंपरा कई अन्य देशों में भी विख्यात हैं। बेशक आज यह परंपरा भी सीमित हो रही है, लेकिन सामाजिक रूप से इसका बहुत महत्व है।

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