Elderly Heat Risk : तापमान थोड़ा बढ़ा और बढ़ गया खतरा, बुजुर्गों को लेकर अध्ययन में बड़ा खुलासा
वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री की वृद्धि पर बुजुर्गों को उतना ही खतरा, जितना युवाओं को 4 डिग्री बढ़ोतरी पर; भारत समेत चार देशों में 1.48 अरब लोग जोखिम में
Elderly Heat Risk : गर्मी बढ़ने का असर हर उम्र के व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। युवा जिस तापमान को सहन कर सकता है, वही गर्मी बुजुर्गों के लिए गंभीर स्वास्थ्य खतरा बन सकती है। ‘द लांसेट प्लैनेटरी हेल्थ’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन में सामने आया है कि वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर बुजुर्गों को उतना गर्मी का खतरा हो सकता है, जितना युवाओं को 4 डिग्री की वृद्धि पर होगा। यानी तापमान में मामूली बढ़ोतरी भी बुजुर्गों के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है।
स्टैनफोर्ड और पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी समेत विभिन्न संस्थानों के शोधकर्ताओं ने अलग-अलग आयु वर्गों की गर्मी सहने की क्षमता का अध्ययन किया। अध्ययन के अनुसार, वैश्विक तापमान में तीन डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर भारत, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के करीब 1.48 अरब लोग गर्मी के ऐसे जोखिम के दायरे में आ सकते हैं, जिसे उनका शरीर पर्याप्त रूप से सहन या नियंत्रित नहीं कर पाएगा। यह दुनियाभर में जोखिम वाली अनुमानित 2.03 अरब आबादी का 72.6 प्रतिशत है।
बुजुर्गों को गर्मी जल्दी क्यों परेशान करती है?
उम्र बढ़ने के साथ शरीर की गर्मी नियंत्रित करने की क्षमता कम हो जाती है। बुजुर्गों को अपेक्षाकृत कम पसीना आता है। उनकी रक्त वाहिकाएं गर्मी के प्रति धीमी प्रतिक्रिया देती हैं। गर्मी में शरीर का तापमान नियंत्रित रखने के लिए उनके हृदय को भी अधिक मेहनत करनी पड़ती है।
यही कारण है कि किसी युवा व्यक्ति के लिए सहने योग्य तापमान बुजुर्गों के लिए उतना आसान नहीं होता। तापमान के साथ आर्द्रता बढ़ने पर यह खतरा और बढ़ सकता है।
पहले के अनुमान में क्या छूट गया?
शोधकर्ताओं के अनुसार, पिछले अध्ययनों में मुख्य रूप से स्वस्थ युवा वयस्कों पर किए गए परीक्षणों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया था। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि किस तापमान और आर्द्रता पर गर्मी मानव शरीर के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
लेकिन बुजुर्गों का शरीर गर्मी के प्रति अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है। इसलिए केवल युवा वयस्कों के आंकड़ों से पूरे समाज के लिए गर्मी का खतरा तय करने पर बुजुर्गों का वास्तविक जोखिम कम आंका जा सकता है।
नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने तीन आयु वर्ग बनाए—15 से 39 वर्ष, 40 से 59 वर्ष और 60 वर्ष या उससे अधिक। इसके बाद अलग-अलग तापमान और आर्द्रता की परिस्थितियों में इन आयु वर्गों की गर्मी सहने की क्षमता का आकलन किया गया।
1.5 डिग्री और 4 डिग्री का अंतर समझिए
अध्ययन का सबसे अहम निष्कर्ष उम्र के हिसाब से गर्मी के अलग-अलग असर को सामने लाता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर बुजुर्गों को उतना गर्मी जोखिम हो सकता है, जितना युवा वयस्कों को 4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर होता है।
इसका सीधा मतलब है कि तापमान बढ़ने की स्थिति में बुजुर्गों को सुरक्षित मानने के लिए वही सीमा नहीं अपनाई जा सकती, जो युवा लोगों के लिए इस्तेमाल होती है।
भारत समेत चार देशों में कितना खतरा?
अगर वैश्विक तापमान में तीन डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो भारत, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश में करीब 1.48 अरब लोग गर्मी के जोखिम के दायरे में आ सकते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह दुनियाभर में जोखिम वाली 2.03 अरब आबादी का 72.6 प्रतिशत है। यानी दुनिया में अत्यधिक गर्मी के जोखिम वाली आबादी का बड़ा हिस्सा इन चार देशों में हो सकता है।
दक्षिण एशिया में क्यों ज्यादा चिंता?
दक्षिण एशिया और फारस की खाड़ी को अध्ययन में सबसे अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में रखा गया है। तीन डिग्री या उससे अधिक वैश्विक तापमान वृद्धि की स्थिति में इन क्षेत्रों के बुजुर्गों को करीब तीन महीने तक दिन-रात खतरनाक गर्मी का सामना करना पड़ सकता है।
दिन में तेज गर्मी के साथ यदि रात में भी पर्याप्त राहत न मिले तो शरीर को सामान्य स्थिति में लौटने का समय कम मिल सकता है। ऐसे में लंबे समय तक गर्मी का सामना करना बुजुर्गों के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
किन देशों में चुनौती सबसे बड़ी?
शोधकर्ताओं के मुताबिक भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमा और नाइजर जैसे देशों के सामने चुनौती ज्यादा बड़ी हो सकती है। इन देशों में अत्यधिक गर्मी के जोखिम के साथ गरीबी की ऊंची दर और ठंडक उपलब्ध कराने वाली सुविधाओं तक सीमित पहुंच भी समस्या है।
पहले के अनुमान से कितने ज्यादा लोग खतरे में?
शोधकर्ताओं का कहना है कि पिछले अध्ययनों में अत्यधिक गर्मी के जोखिम में आने वाले बुजुर्गों की संख्या कम से कम दोगुनी कम आंकी गई हो सकती है।
अध्ययन के लेखकों के अनुसार, बुजुर्गों को ऐसी गर्मी का सामना अधिक बार और बड़े क्षेत्र में करना पड़ सकता है, जिसे उनका शरीर पर्याप्त रूप से सहन या नियंत्रित नहीं कर पाता।
आगे क्या संकेत मिलते हैं?
शोधकर्ताओं ने कहा है कि असहनीय गर्मी से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या पहले के अनुमान से कहीं अधिक हो सकती है। इसका असर बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में और पहले की अपेक्षा अधिक लंबी अवधि तक रहने की आशंका है।
इस अध्ययन का सबसे आसान संदेश यही है—बढ़ती गर्मी का खतरा उम्र के साथ बदलता है। इसलिए भविष्य में गर्मी का आकलन केवल यह देखकर नहीं किया जा सकता कि तापमान कितना बढ़ा है। यह भी देखना होगा कि उस तापमान का असर बुजुर्गों के शरीर पर कितना पड़ रहा है।

