मनमोहन सिंह के लिए उठी भारत रत्न की मांग, 1991 के आर्थिक सुधारों से लेकर PM पद तक का सफर चर्चा में
94वीं जयंती पर उठी मांग; पूर्व सहयोगियों ने सार्वजनिक सेवा, अकादमिक उपलब्धियों और आर्थिक सुधारों में योगदान को बताया सम्मान का आधार
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। उनकी 94वीं जयंती के मौके पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने यह मांग उठाई। उन्होंने हैदराबाद में मनमोहन सिंह की प्रतिमा का अनावरण करते हुए कहा कि देश को ऐसे महान राजनेता को हमेशा याद रखना चाहिए।
रेवंत रेड्डी ने सवाल उठाया कि सरकार को मनमोहन सिंह को भारत रत्न देने में आपत्ति क्यों होनी चाहिए। हालांकि, सिंह के करीबी रहे लोगों का कहना है कि वह स्वयं कभी किसी सम्मान को लेकर दावा या आग्रह करने के पक्ष में नहीं रहे होते।
आर्थिक सुधारों के लिए याद किए जाते हैं मनमोहन सिंह
मनमोहन सिंह को खास तौर पर 1991 के आर्थिक सुधारों के प्रमुख वास्तुकारों में गिना जाता है। उस समय वह केंद्रीय वित्त मंत्री थे। आर्थिक उदारीकरण, निजी क्षेत्र को अधिक स्वतंत्रता और व्यापार संबंधी नियंत्रणों में बदलाव ने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके समर्थकों का कहना है कि आर्थिक सुधारों के साथ-साथ प्रशासनिक और सार्वजनिक जीवन में उनके लंबे योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न दिया जाना चाहिए।
साधारण पृष्ठभूमि से देश के प्रधानमंत्री तक का सफर
मनमोहन सिंह का जीवन साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुंचने की यात्रा रहा। उनके करीबी सहयोगी और पूर्व योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने हाल में एक व्याख्यान में उनके शुरुआती जीवन से जुड़ी कई बातें साझा कीं।
अहलूवालिया के अनुसार, मनमोहन सिंह का बचपन वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र के गाह गांव में उनकी नानी के साथ बीता। उनके पिता पेशावर में सूखे मेवों के कारोबार से जुड़े थे। परिवार दो कमरों के कच्चे मकान में रहता था और वहां बिजली तथा नल का पानी जैसी सुविधाएं भी नहीं थीं।
गांव के स्कूल में सीमित कक्षाओं के कारण उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए चकवाल में अपने रिश्तेदार के घर जाना पड़ा। इसके बाद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियां हासिल कीं।
कैम्ब्रिज में हासिल किया प्रतिष्ठित पुरस्कार
अहलूवालिया ने इतिहासकार डेविड एंगरमैन की पुस्तक 'द एपोस्टल्स ऑफ डेवलपमेंट' का हवाला देते हुए मनमोहन सिंह के अकादमिक जीवन का उल्लेख किया। पुस्तक में कैम्ब्रिज में एक ही दौर में पढ़ने वाले दक्षिण एशिया के छह अर्थशास्त्रियों का जिक्र है, जिनमें भारत से मनमोहन सिंह, अमर्त्य सेन और जगदीश भगवती शामिल थे।
अहलूवालिया के अनुसार इन छह अर्थशास्त्रियों में से पांच ने प्रथम श्रेणी हासिल की और भारत के तीनों छात्रों ने प्रतिष्ठित एडम स्मिथ पुरस्कार जीता। उनके मुताबिक इन सभी ने बाद में अपने-अपने देशों के सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन मनमोहन सिंह की पारिवारिक पृष्ठभूमि इन सभी में सबसे साधारण थी।
1971 में ही आर्थिक उदारीकरण की वकालत
मनमोहन सिंह के प्रशासनिक करियर की शुरुआत 1971 में आर्थिक सलाहकार के तौर पर हुई थी। उनके सहयोगियों के मुताबिक इसी शुरुआती दौर में उन्होंने आर्थिक नियंत्रण कम करने और निजी क्षेत्र को अधिक स्वतंत्रता देने की जरूरत पर जोर दिया था।
मोंटेक सिंह अहलूवालिया के अनुसार, बांग्लादेश युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पीएन हक्सर ने मनमोहन सिंह से 'विजय के बाद क्या करना चाहिए' विषय पर एक नोट तैयार करने को कहा था। अहलूवालिया के मुताबिक, मनमोहन सिंह ने इसमें व्यापार उदारीकरण और निजी क्षेत्र को अधिक स्वतंत्रता देने की वकालत की थी।
बाद में 1991 में वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने व्यापक आर्थिक सुधारों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पूर्व सहयोगियों ने बताया सम्मान का हकदार
पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने मनमोहन सिंह को भारत रत्न के लिए अत्यंत उपयुक्त बताते हुए उनके सार्वजनिक जीवन, बौद्धिक उपलब्धियों और नेतृत्व का उल्लेख किया।
मनमोहन सिंह के एक अन्य पूर्व सहयोगी के अनुसार उनके अकादमिक और प्रशासनिक रिकॉर्ड की तुलना बहुत कम लोगों से की जा सकती है। उनके समर्थकों का यह भी कहना है कि भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के दौरान उन्होंने सरकार पर विश्वास मत हासिल करने का राजनीतिक जोखिम उठाया था।
मनमोहन सिंह ने 2004 से 2014 तक भारत के प्रधानमंत्री के रूप में दो कार्यकाल पूरे किए। इससे पहले वह वित्त मंत्री, रिजर्व बैंक के गवर्नर और योजना आयोग के उपाध्यक्ष समेत कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
भारत रत्न दिए जाने का निर्णय भारत सरकार की निर्धारित प्रक्रिया के तहत होता है। मनमोहन सिंह को यह सम्मान दिए जाने की मांग फिलहाल राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श का विषय बनी हुई है।

