चंडीगढ़,09:39 AM Mar 04, 2026 IST Updated At : 09:39 AM Mar 04, 2026 IST
तटीय शहर चेन्नई के आसमान में बादलों के बीच लुका-छिपी खेलता लाल चांद। समुद्र किनारे साफ हवा के कारण यहां चांद के चारों ओर दुर्लभ 'नीला घेरा' (Blue Fringe) भी स्पष्ट दिखाई दिया। -पीटीआई
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Blood Moon 2026 : बीती मंगलवार की शाम और रात आसमान में एक ऐसी खगोलीय घटना घटी जिसने न केवल वैज्ञानिकों बल्कि आम लोगों को भी हैरत में डाल दिया। साल 2026 का पहला पूरा चंद्र ग्रहण (Total Lunar Eclipse) 3 मार्च को दुनिया के कई हिस्सों में देखा गया। भारत में जब शाम को चांद निकला, तब ग्रहण की प्रक्रिया अपने चरम पर थी, जिसे खगोल विज्ञान की भाषा में 'ग्रस्तोदित' ग्रहण (Moonrise with Eclipse) कहा जाता है। यह घटना इसलिए भी विशेष रही क्योंकि यह रंगों के त्योहार 'होली' के दिन पड़ी और आसमान में चांद तांबे जैसा लाल यानी 'ब्लड मून' (Blood Moon) दिखाई दिया।
क्यों लाल हुआ चांद? 'रेले स्कैटरिंग' का विज्ञान
देश की राजधानी में ऐतिहासिक स्मारकों के पीछे से झांकता तांबे जैसा लाल चांद। दिल्ली में हवा में मौजूद धूल के कणों की वजह से बीती रात 'ब्लड मून' का रंग सामान्य से अधिक गहरा नजर आया। -पीटीआई
चंद्र ग्रहण तब होता है जब सूरज और चांद के बीच पृथ्वी इस तरह आ जाती है कि उसकी छाया चंद्रमा को पूरी तरह ढक लेती है। लेकिन सवाल यह उठता है कि पृथ्वी की छाया तो काली होती है, फिर चांद लाल क्यों नजर आया? अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके पीछे 'रेले स्कैटरिंग' (Rayleigh Scattering) जिम्मेदार है।
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जब सूरज की सफेद रोशनी पृथ्वी के वायुमंडल (Atmosphere) से गुजरती है, तो नीली रोशनी बिखर जाती है, लेकिन लाल रोशनी अपनी लंबी तरंगदैर्ध्य (Wavelength) के कारण मुड़कर सीधे चंद्रमा तक पहुँच जाती है। सरल शब्दों में कहें तो, ग्रहण के दौरान चंद्रमा पर पड़ने वाली चमक असल में उन सभी सूर्योदयों और सूर्यास्तों की मिली-जुली रोशनी होती है, जो उस समय पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे होते हैं।
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नया फैक्ट: 'ब्लड वर्म मून' (Blood Worm Moon) पश्चिमी देशों में मार्च की पूर्णिमा को 'वर्म मून' कहा जाता है। चूंकि इस बार इस पर पूर्ण ग्रहण लगा, इसलिए दुनिया भर के खगोलविदों ने इसे 'ब्लड वर्म मून' का नाम दिया है। भारत में हवा में मौजूद धूल और प्रदूषण की हल्की परत की वजह से बीती रात यह लाल रंग सामान्य से अधिक गहरा नजर आया।
ओजोन परत ने बनाया दुर्लभ 'नीला किनारा'
बीती रात चेन्नई और कोलकाता जैसे शहरों में खगोल प्रेमियों ने एक और अद्भुत चीज देखी लाल चांद के बाहरी हिस्सों पर एक हल्का नीला या बैंगनी घेरा (Navy-blue fringe)। जानकारों का कहना है कि यह पृथ्वी की ऊपरी ओजोन परत की वजह से होता है। ओजोन परत जब सूरज की कुछ खास लाल किरणों को सोख लेती है, तो केवल नीली रोशनी ही चांद के किनारों तक पहुंच पाती है। 2026 का यह ग्रहण इसलिए दुर्लभ था क्योंकि चांद पृथ्वी की सघन छाया (Umbra) के बिल्कुल किनारे से होकर गुजरा, जिससे यह नीला रंग और भी स्पष्ट दिखा।
भारत के प्रमुख शहरों की आंखों देखी रिपोर्ट
कोलकाता
देश के अलग-अलग हिस्सों में भौगोलिक स्थिति के कारण ग्रहण का नजारा अलग-अलग रहा :
नयी दिल्ली: राजधानी में ऐतिहासिक स्मारकों के ऊपर लाल चांद मुस्कुराता दिखा। हालांकि शहरी प्रदूषण की वजह से चांद का रंग गहरा सुर्ख (Dark Red) था। दिल्लीवासियों को ग्रहण के अंतिम 25 मिनट देखने को मिले।प्रयागराज
कोलकाता: पूर्वी भारत का यह प्रमुख शहर ग्रहण का गवाह बनने में सबसे आगे रहा। यहाँ चंद्रोदय जल्दी होने के कारण लोगों ने 'ब्लड वर्म मून' का सबसे लंबा और साफ नजारा देखा।
प्रयागराज: संगम नगरी में खगोल और आस्था का संगम दिखा। ग्रहण के 'मोक्ष' (समाप्ति) के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने संगम पर आस्था की डुबकी लगाई।
चेन्नई: समुद्र के किनारे साफ आसमान की वजह से खगोल प्रेमियों ने चांद के 'नीले घेरे' को दूरबीन से स्पष्ट देखा।
'ब्लड वर्म मून' (Blood Worm Moon)
पश्चिमी देशों में मार्च की पूर्णिमा को 'वर्म मून' कहा जाता है। चूंकि इस बार इस पर पूर्ण ग्रहण लगा, इसलिए दुनिया भर के खगोलविदों ने इसे 'ब्लड वर्म मून' का नाम दिया है। भारत में हवा में मौजूद धूल और प्रदूषण की हल्की परत की वजह से बीती रात यह लाल रंग सामान्य से अधिक गहरा नजर आया।
सोशल मीडिया पर दिखा 'ब्लड मून' का क्रेज
आस्था और खगोल का संगम। संगम नगरी प्रयागराज में ग्रहण के 'मोक्ष' (समाप्ति) के बाद श्रद्धालुओं ने गंगा-यमुना के तट पर आस्था की डुबकी लगाई और दान-पुण्य किया। -पीटीआई
जैसे ही आसमान में चांद का रंग बदलना शुरू हुआ, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स (X) पर तस्वीरों की बाढ़ आ गई। बीती रात लाखों लोगों ने अपने स्मार्टफोन के जरिए इस नजारे को कैद करने की कोशिश की। कई शहरों में लोगों ने अपनी छतों पर 'स्टार-गेजिंग' (तारा दर्शन) पार्टियों का आयोजन किया था। डिजिटल युग में यह ग्रहण केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि एक बड़ा 'सोशल मीडिया इवेंट' बन गया, जहाँ दिल्ली से लेकर टोक्यो तक की तस्वीरें रीयल-टाइम में साझा की गईं।
इतिहास के पन्नों से: जब ग्रहण ने बदला दुनिया का नक्शा
इतिहास में चंद्र ग्रहण का जिक्र केवल अंधविश्वास के लिए नहीं, बल्कि बड़े बदलावों के लिए भी मिलता है :
क्रिस्टोफर कोलंबस की चालाकी : 1504 में जब कोलंबस जमैका में फंस गए थे, तो उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए चंद्र ग्रहण की भविष्यवाणी का सहारा लिया था।
पृथ्वी के गोल होने का सबूत :प्राचीन ग्रीस के महान दार्शनिक अरस्तू ने चंद्र ग्रहण के दौरान चांद पर पड़ने वाली पृथ्वी की गोल छाया को देखकर ही पहली बार यह वैज्ञानिक दावा किया था कि हमारी पृथ्वी चपटी नहीं बल्कि गोल है।
होली पर ग्रहण : क्या कहते हैं विशेषज्ञ ?
लगभग 100 साल बाद होली और पूर्ण चंद्र ग्रहण का ऐसा अद्भुत मेल हुआ है।
ज्योतिषीय मत: होली और चंद्र ग्रहण का यह मिलन पुरानी नकारात्मक ऊर्जा को जलाकर भस्म करने और नई शुरुआत करने का संकेत है। चूंकि यह ग्रहण सिंह राशि (Leo) में लगा है, इसलिए यह लोगों के आत्मविश्वास को बढ़ाने में मददगार साबित होगा।'
वैज्ञानिक मत : वहीं, डॉक्टरों और चिकित्सा विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया पर फैले डर को खारिज किया है। उनका कहना है कि सूर्य ग्रहण के विपरीत, चंद्र ग्रहण को नंगी आंखों से देखना 100% सुरक्षित है। इससे कोई जहरीला रेडिएशन नहीं निकलता।
वैश्विक मान्यताएं
केवल भारत में ही नहीं, दुनिया के अलग-अलग कोनों में ग्रहण को लेकर रोचक कहानियां हैं :
चीन: प्राचीन चीन में लोग मानते थे कि एक 'आकाशीय कुत्ता' चांद को निगल रहा है। उसे भगाने के लिए लोग ढोल और बर्तन बजाते थे।
अफ्रीका: दक्षिण अफ्रीका की कुछ जनजातियों का मानना है कि ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा के बीच लड़ाई होती है। वे इस समय को अपने पुराने झगड़े सुलझाने के लिए शुभ मानते हैं।
क्या होता है 'ग्रस्तोदित' ग्रहण (Moonrise with Eclipse) ?
पूर्वी भारत के कोलकाता में दिखा चंद्र ग्रहण का अद्भुत नजारा। यहां चंद्रोदय जल्दी होने के कारण खगोल प्रेमियों ने 'ब्लड वर्म मून' की पूरी प्रक्रिया को सबसे स्पष्ट रूप से देखा। -पीटीआई
'ग्रस्तोदित' शब्द का अर्थ है कि ग्रहण की स्थिति में ही चांद का उदय होना। सरल शब्दों में कहें तो जब शाम को चांद आसमान में निकला, तब उस पर पहले से ही ग्रहण लगा हुआ था।
बीती रात का घटनाक्रम: मंगलवार को ग्रहण की खगोलीय प्रक्रिया दोपहर 3:20 बजे ही शुरू हो चुकी थी। चूंकि उस समय दिन का उजाला था, इसलिए हमें चांद दिखाई नहीं दिया। शाम को करीब 6:15 बजे जब चंद्रोदय हुआ, तब तक ग्रहण अपने चरम पर था। यही कारण है कि कल शाम जब देशवासियों ने पहली बार चांद को देखा, तो वह पहले से ही पृथ्वी की सघन छाया में पूरी तरह घिरा हुआ था।
इसे ऐसे समझें : यह किसी फिल्म के बीच में सिनेमा हॉल पहुंचने जैसा है, जहाँं फिल्म पहले ही शुरू हो चुकी हो और आपको सीधे उसका मुख्य हिस्सा दिखाई दे।
अगला मौका सीधे 2028 में
अगर आप बीती रात यह नजारा नहीं देख पाए हैं, तो अब आपको लंबा इंतजार करना होगा। खगोलीय गणना के अनुसार, अब अगला पूर्ण चंद्र ग्रहण (Total Lunar Eclipse) सीधे 6 जुलाई 2028 को दिखाई देगा। 2026 के अंत और 2027 में होने वाले ग्रहण केवल आंशिक (Partial) होंगे।
नजर एक नजर में
नाम: ब्लड वर्म मून (Blood Worm Moon)।
विशेष संयोग: 100 साल बाद होली के दिन चंद्र ग्रहण।
दुर्लभ नजारा: ओजोन परत के कारण नीला घेरा दिखना।
वैज्ञानिक तथ्य: ग्रहण ने ही साबित किया था कि पृथ्वी गोल है।