Explainer : म्यूल अकाउंट कैसे बने साइबर ठगी की रीढ़, जानिए चंडीगढ़ पुलिस ने पूरा नेटवर्क कैसे तोड़ा
ऑपरेशन म्यूल हंट के दौरान चंडीगढ़ साइबर थाना ने 10 आरोपियों को किया गिरफ्तार
Cyber Fraud Trail : एक फोन कॉल आता है। दूसरी तरफ आवाज भरोसे से भरी होती है। ‘खाते में पैसा आएगा, बस निकालकर दे देना। काम बिल्कुल सुरक्षित है।’यहीं से साइबर ठगी की वह चेन शुरू होती है, जिसका आखिरी सिरा अक्सर किसी मासूम बैंक खाताधारक के गले में फंदे की तरह कस जाता है। चंडीगढ़ पुलिस का ‘ऑपरेशन म्यूल हंट’ इसी अदृश्य लेकिन सबसे अहम कड़ी पर सीधा वार है।
इस ऑपरेशन के तहत साइबर क्राइम थाना, चंडीगढ़ ने 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि ये आरोपी किसी बड़े कॉल सेंटर या हाई-टेक हैकिंग नेटवर्क का हिस्सा नहीं थे, बल्कि वे लोग थे जिनके बैंक खाते साइबर ठगों की रीढ़ बन चुके थे।
कौन हैं गिरफ्तार आरोपी
पुलिस ने जिन आरोपियों को गिरफ्तार किया है, उनमें रितिक, रिदम, आकाश, मोहम्मद दानिश, चारणदास, अर्चित, मोहम्मद तोशिक, दिलप्रीत सिंह, अंकित और रोहन दुबे शामिल हैं।
सभी आरोपी चंडीगढ़ और एसएएस नगर (मोहाली) क्षेत्र से जुड़े हैं। इनकी उम्र 20 से 26 वर्ष के बीच है। जांच में यह स्थापित हुआ कि सभी ने अपने बैंक खाते जानबूझकर साइबर ठगों को इस्तेमाल के लिए दिए और बदले में कमीशन लिया। यही वजह है कि पुलिस ने इन्हें केवल ‘पीड़ित’ नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार माना है।
ठगी का सुराग कहां से मिला![]()
इस पूरे नेटवर्क की परतें तब खुलनी शुरू हुईं, जब गृह मंत्रालय के आई4सी पोर्टल पर दर्ज सैकड़ों साइबर ठगी की शिकायतों का विश्लेषण किया गया।
देश के अलग अलग राज्यों से आई शिकायतों में जिन बैंक खातों का बार-बार जिक्र हो रहा था, उनमें से कई खाते चंडीगढ़ क्षेत्र में संचालित पाए गए। यहीं से जांच की दिशा तय हो गई।
जब खातों ने कहानी सुनानी शुरू की
साइबर क्राइम टीम ने इन खातों के ट्रांजैक्शन पैटर्न को खंगाला।
तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगी।
- खाते अलग अलग लोगों के नाम पर थे
- बैंक और ब्रांच अलग थे
- लेकिन पैसे का रास्ता लगभग एक जैसा था
ठगी की रकम पहले इन खातों में आती, फिर
- चेक से निकाली जाती
- या दूसरे खातों में भेजी जाती
- और कुछ मामलों में रकम को तकनीकी तरीकों से कई स्तरों पर घुमाया जाता। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद सिर्फ एक था, असली साइबर ठग को कानून की पकड़ से दूर रखना।
‘हमें लगा यह लीगल काम है’
जांच के दौरान कई आरोपियों ने स्वीकार किया कि उन्हें बताया गया था कि यह पैसा क्रिप्टो से जुड़ा है। ऑनलाइन काम का भुगतान है या किसी बिजनेस ट्रांजैक्शन का हिस्सा है। उन्हें भरोसा दिलाया गया कि कोई जोखिम नहीं है। बदले में उन्हें तय कमीशन मिलता था। यहीं पर एक अहम फर्क सामने आता है।
पुलिस के अनुसार, एक बार रकम के स्रोत और लेनदेन की प्रकृति समझ में आने के बावजूद खातों का इस्तेमाल जारी रखना, सीधे आपराधिक साजिश की श्रेणी में आता है।
चार एफआईआर, एक ही पैटर्न
इस कार्रवाई में सामने आए एफआईआर नंबर 11, 12, 13 और 109 अलग अलग मामलों से जुड़े हैं, लेकिन जांच का ढांचा लगभग एक जैसा है।
हर केस में
- निजी बैंक खाते उपलब्ध कराए गए
- बड़ी रकम का लेनदेन हुआ
- पैसा तुरंत निकाल लिया गया
- और बदले में कमीशन लिया गया
यही वजह है कि पुलिस ने सभी मामलों को एक बड़े संगठित नेटवर्क के रूप में देखा।
युवा क्यों बनते हैं सबसे आसान शिकार
इस पूरे केस का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि लगभग सभी आरोपी युवा हैं। पुलिस के अनुसार, साइबर ठग खासतौर पर युवाओं को निशाना बनाते हैं क्योंकि
- वे जल्दी पैसे कमाने के अवसर ढूंढते हैं
- डिजिटल सिस्टम से परिचित होते हैं
- और कानूनी जोखिम को हल्के में ले लेते हैं
एक बार बैंक खाता हाथ लग गया, तो वही खाता पूरे साइबर फ्रॉड सिस्टम का सबसे सुरक्षित कवच बन जाता है।
क्यों अहम है ‘ऑपरेशन म्यूल हंट’
यह कार्रवाई यह साफ संदेश देती है कि साइबर अपराध सिर्फ फोन कॉल, फर्जी लिंक या मैसेज तक सीमित नहीं हैं।
जब तक
- म्यूल अकाउंट पर लगाम नहीं लगेगी
- खाताधारकों की जिम्मेदारी तय नहीं होगी
तब तक साइबर ठगी के नेटवर्क को तोड़ना संभव नहीं है। पुलिस का कहना है कि यह ऑपरेशन आगे भी जारी रहेगा और ऐसे खातों की पहचान कर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
म्यूल अकाउंट क्या है
म्यूल अकाउंट वह बैंक खाता होता है, जिसे कोई व्यक्ति खुद इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि किसी और के कहने पर पैसे के लेनदेन के लिए उपलब्ध करा देता है।
कैसे बनता है म्यूल अकाउंट
- आसान कमाई या कमीशन का लालच
- खाते में ठगी की रकम ट्रांसफर
- पैसा निकालकर या आगे भेज देना
- असली ठग पीछे छिपा रहता है
खतरा क्या है
- खाताधारक खुद आरोपी बन जाता है
- गिरफ्तारी और मुकदमे का खतरा
- बैंक खाता फ्रीज हो सकता है
- भविष्य की बैंकिंग पर असर पड़ता है
कौन-कौन था कार्रवाई में शामिल और कैसे पकड़े गए आरोपी
इस पूरे ऑपरेशन को Chandigarh Police के साइबर क्राइम थाना ने अंजाम दिया।
साइबर क्राइम की एसपी गीताांजलि खंडेलवाल ने इसका नेतृत्व किया और डीएसपी ए. वेंकटेश की निगरानी में पूरे आपरेशन को अंजाम दिया गया।
जमीनी और तकनीकी जांच
- एराम रिज़वी, थाना प्रभारी, साइबर क्राइम थाना, सेक्टर 17
- साइबर क्राइम शाखा की तकनीकी विश्लेषण टीम
- बैंकिंग ट्रांजैक्शन ट्रेस करने वाली विशेष यूनिट
ऐसे पकड़े गए आरोपी
- आई4सी पोर्टल से मिले डेटा का विश्लेषण
- संदिग्ध खातों की सूची तैयार की गई
- ट्रांजैक्शन पैटर्न का डिजिटल मिलान
- खाताधारकों से पूछताछ
- कमीशन और रकम की स्वीकारोक्ति
- इसके बाद गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई
पुलिस का कहना है कि नेटवर्क के अन्य हिस्सों की जांच अभी जारी है।
सतर्कता जरूरी
यदि किसी के बैंक खाते में संदिग्ध रकम आती है या साइबर ठगी की आशंका हो, तो तुरंत
- नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल
- साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए।

