चंडीगढ़ का मास्टर प्लान 2031 बदला, FAR से लेकर ऊंचाई और जमीन के इस्तेमाल तक कई अहम बदलाव
प्रशासन ने आपत्तियों और सुझावों की समीक्षा के बाद संशोधनों को मंजूरी दी; फेज-3 और परिधि क्षेत्र में ज्यादा FAR व ऊंची इमारतों की राह खुली, जबकि मनीमाजरा और मलोया में विकास को ट्रैफिक व पर्यावरणीय अध्ययन से जोड़ा गया
चंडीगढ़ प्रशासन ने मास्टर प्लान 2031 में संशोधनों को मंजूरी दे दी है। मुख्य सचिव एच. राजेश प्रसाद की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई उच्चस्तरीय बैठक में इन संशोधनों पर सहमति बनी। मई में सार्वजनिक किए गए मूल प्रस्तावों पर आई आपत्तियों और सुझावों की समीक्षा के बाद तैयार स्क्रीनिंग कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर अंतिम संशोधन किए गए हैं।
स्क्रीनिंग कमेटी का गठन 10 जून को किया गया था और उसने 1 सितंबर को अपनी रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी थी। इसके बाद प्रशासन ने मूल प्रस्तावों के कई प्रावधानों को संशोधित, सीमित या शर्तों के अधीन कर दिया।
क्यों महत्वपूर्ण है मास्टर प्लान?
चंडीगढ़ की योजना 1948 में ली कॉर्बूजिए, पियरे जेनरे और जेन ड्रू सहित वास्तुकारों की टीम ने तैयार की थी। शहर की मूल अवधारणा में सन, स्पेस और वर्ड्योर (Sun, Space and Verdure) को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था।
सेक्टरों की योजना इस तरह बनाई गई थी कि लोगों को स्कूल, बाजार, पार्क और डिस्पेंसरी जैसी सुविधाएं अपेक्षाकृत नजदीक मिल सकें। शहर का सीमित क्षेत्रफल और मौजूदा बुनियादी ढांचा भी मास्टर प्लान में विकास की सीमा तय करता है।
मास्टर प्लान 2031 में चंडीगढ़ की अंतिम आबादी की सीमा 16 लाख निर्धारित की गई है। ऐसे में FAR (Floor Area Ratio)), भवनों की ऊंचाई और जमीन के इस्तेमाल में होने वाला हर बदलाव शहर के पानी, सीवरेज, बिजली, सड़क और ड्रेनेज जैसे बुनियादी ढांचे पर असर डाल सकता है।
किस इलाके में क्या बदलाव हुआ?
फेज-1 : सेक्टर 1 से 30
फेज-1 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। शहर का विरासत क्षेत्र और कैपिटल कॉम्प्लेक्स से जुड़ा क्षेत्र पहले की तरह संरक्षित रहेगा।
फेज-2 : सेक्टर 31 से 47
सरकारी ग्रुप हाउसिंग के लिए निर्धारित खाली सरकारी प्लॉटों पर स्टिल्ट फ्लोर यानी पार्किंग के लिए स्टिल्ट की अनुमति दी गई है। यह प्रावधान निजी आवासीय प्लॉटों पर लागू नहीं होगा।
फेज-3 : सेक्टर 48 से 63
यहां खाली ग्रुप हाउसिंग प्लॉटों के लिए FAR को 1.2 से बढ़ाकर 3.0 किया गया है। यानी अनुमत निर्मित क्षेत्र में बड़ा इजाफा होगा।
भवनों की अधिकतम ऊंचाई 30 मीटर यानी करीब 98 फीट 5 इंच तक हो सकेगी और अधिकतम आठ मंजिल तक निर्माण की अनुमति होगी। पहले छह मंजिल तक की सीमा थी।
मनीमाजरा : पॉकेट-6
मनीमाजरा के पॉकेट-6 में स्टिल्ट+5 निर्माण की अनुमति का रास्ता साफ किया गया है। हालांकि इसे सीधे लागू नहीं किया जाएगा। इसके लिए ट्रैफिक इंपैक्ट असेसमेंट समेत जरूरी अध्ययन पूरे करने होंगे और अलग से जोनिंग प्लान तैयार करना होगा।
मलोया : पॉकेट-7
मलोया में करीब 178 एकड़ क्षेत्र को हाईराइज हाउसिंग के लिए प्रस्तावित किया गया है। यहां अनुमानित घनत्व करीब 250 व्यक्ति प्रति एकड़ रखा गया है।
हालांकि इस क्षेत्र का विकास तत्काल शुरू नहीं होगा। पर्यावरणीय सीमाओं, शहर की आधारभूत सुविधाओं और विकास की क्षमता का आकलन करने के लिए व्यापक कंसल्टेंट स्टडी के बाद ही आगे की प्रक्रिया होगी।
आईटी हैबिटेट
आईटी हैबिटेट क्षेत्र में हाईराइज निर्माण को लेकर पर्यावरण संबंधी आपत्तियों के कारण 2022 से मामला अटका हुआ था। अब यहां प्लॉटेड और फ्लैटेड डेवलपमेंट की अनुमति का रास्ता खोला गया है।
औद्योगिक क्षेत्र फेज-1 और फेज-2
औद्योगिक क्षेत्रों में FAR बढ़ाकर 2.0, ग्राउंड कवरेज 60 प्रतिशत और भवनों की अधिकतम ऊंचाई 68 फीट 3 इंच कर दी गई है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। मूल प्रस्ताव में नए जोनिंग फ्रेमवर्क में जाना अनिवार्य किया गया था, लेकिन अब इसे वैकल्पिक कर दिया गया है। यानी प्लॉट मालिक चाहें तो मौजूदा आर्किटेक्चरल कंट्रोल के तहत ही बने रह सकते हैं।
विकास मार्ग और मिक्स्ड लैंड यूज
विकास मार्ग का कमर्शियल कॉरिडोर बढ़ाया जाएगा, लेकिन इसका क्षेत्रफल पहले प्रस्तावित 428 एकड़ के बजाय करीब 390 एकड़ होगा। पंजाब सीमा तक प्रस्तावित अतिरिक्त 1.5 किलोमीटर विस्तार को फिलहाल टाल दिया गया है। मौजूदा 7.2 किलोमीटर हिस्से के पूरी तरह विकसित होने के बाद ही इस पर आगे निर्णय होगा।
शिक्षण संस्थान
फेज-3 और परिधि क्षेत्र में स्कूलों का FAR 0.75 से बढ़ाकर 1.5 और कॉलेजों का FAR 2.0 किया गया है।
फेज-2 में भी FAR बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है, लेकिन इसे विस्तृत पार्किंग और ट्रैफिक इंपैक्ट असेसमेंट के बाद ही लागू किया जाएगा।
मई के प्रस्तावों में क्यों किया गया बदलाव?
मई में जारी प्रस्तावों को लेकर शहर के कई पूर्व अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और अन्य पक्षों ने आपत्तियां दर्ज कराईं। पूर्व चीफ आर्किटेक्ट सुमित कौर ने 19 पन्नों की आपत्ति दाखिल की थी। उन्होंने मास्टर प्लान में प्रस्तावित बदलावों पर सवाल उठाते हुए शहर की वहन क्षमता के अध्ययन की प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई थी।
चंडीगढ़ के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने एक्सपर्ट कमेटी की संरचना पर सवाल उठाया था। उनका कहना था कि कमेटी में 11 सरकारी अधिकारी थे, जबकि स्वतंत्र विरासत विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और जनप्रतिनिधियों का प्रतिनिधित्व नहीं था।
पूर्व सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल ने भी प्रस्तावित बदलावों पर चिंता जताई थी। हालांकि उन्होंने औद्योगिक क्षेत्रों में FAR बढ़ाने के प्रस्ताव का सशर्त समर्थन किया था। इन आपत्तियों के बाद अंतिम प्रस्ताव में कई बड़े बदलावों को अध्ययन और अन्य शर्तों से जोड़ दिया गया है।
हाईकोर्ट के फैसले का भी असर
मास्टर प्लान में बदलाव का मामला ऐसे समय आया है जब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 29 मई को ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर परियोजना को खारिज करते हुए मास्टर प्लान की कानूनी स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी।
अदालत ने कहा था कि मास्टर प्लान के प्रावधान अनिवार्य प्रकृति के हैं और उन्हें कार्यकारी अधिसूचना के जरिये दरकिनार नहीं किया जा सकता। इसी बीच केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल करने की तैयारी कर रहा है।
हालांकि गुरुवार को मंजूर संशोधनों में फेज-1 और वहां फ्लाईओवर पर लागू प्रतिबंध को नहीं बदला गया है। बदलाव मुख्य रूप से फेज-2, फेज-3, परिधि और औद्योगिक क्षेत्रों से संबंधित हैं।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले भी रहेंगे महत्वपूर्ण
चंडीगढ़ में भविष्य के विकास को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दो पुराने फैसले भी महत्वपूर्ण रहेंगे। 2023 के RWA मामले में विकास संबंधी नियमों में बदलाव से पहले चंडीगढ़ हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया था।
वहीं 2019 के टाटा हाउसिंग मामले में सुखना वन्यजीव अभयारण्य के आसपास परिधीय हाईराइज निर्माण पर सवाल उठे थे। अब मलोया और मनीमाजरा जैसे क्षेत्रों में प्रस्तावित विकास में भी पर्यावरणीय और बुनियादी ढांचे से जुड़े अध्ययन महत्वपूर्ण होंगे।
अब आगे क्या होगा?
मास्टर प्लान में संशोधन की मंजूरी का अर्थ यह नहीं है कि सभी प्रस्तावित इलाकों में तत्काल निर्माण शुरू हो जाएगा। मलोया पॉकेट-7, मनीमाजरा पॉकेट-6 और औद्योगिक क्षेत्र के कुछ बदलाव आगे की स्टडी, ट्रैफिक इंपैक्ट असेसमेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर क्षमता के आकलन और अलग-अलग जोनिंग प्लान तैयार होने के बाद ही लागू होंगे।
यानी प्रशासन ने फिलहाल यह तय किया है कि इन क्षेत्रों में किस सीमा तक विकास की अनुमति दी जा सकती है। जमीन पर वास्तविक निर्माण के लिए आगे की वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
- फेज-1 के निवासियों पर: मौजूदा नियमों में कोई बदलाव नहीं।
- फेज-2 में: सरकारी ग्रुप हाउसिंग के खाली प्लॉटों पर स्टिल्ट पार्किंग की अनुमति।
- फेज-3 में: ग्रुप हाउसिंग के खाली प्लॉटों पर FAR 3.0 और अधिक ऊंचाई की अनुमति से ज्यादा घनत्व वाला विकास संभव।
- परिधि क्षेत्रों में: हाईराइज और अन्य विकास की संभावनाएं बढ़ेंगी, लेकिन कई प्रस्ताव अध्ययन पूरे होने के बाद ही आगे बढ़ेंगे।
- औद्योगिक प्लॉट मालिकों के लिए: ज्यादा निर्मित क्षेत्र और ऊंचाई की अनुमति, जबकि नए जोनिंग फ्रेमवर्क में जाना अनिवार्य नहीं होगा।
- पूरे शहर के लिए: ज्यादा निर्माण और आबादी के साथ पानी, सीवरेज, बिजली, सड़क, पार्किंग और ड्रेनेज जैसी सुविधाओं पर अतिरिक्त दबाव का आकलन महत्वपूर्ण होगा।

