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Explainer : चंडीगढ़ में बम की धमकियों का 'विदेशी कनेक्शन ': आखिर क्यों पुलिस की पहुंच से दूर है ईमेल भेजने वाला?

एक महीने में 8 बार दहशत, 50 से ज्यादा संस्थान निशाने पर; जानिए अब तक कब-कब क्या हुआ और क्यों डिजिटल रडार से बच रहे हैं आरोपी

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स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी मिलने के बाद अपने बच्चों को घर ले जाते परिजन। -ट्रिब्यून फाइल फोटो
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The Invisible Threat : सिटी ब्यूटीफुल पिछले दो महीनों से एक अनचाहे खौफ के साये में है। कभी स्कूल, कभी पासपोर्ट दफ्तर तो कभी पंजाब-हरियाणा सचिवालय।  शरारती तत्वों के एक ईमेल से पूरी राजधानी की रफ्तार थम जाती है। पुलिस की टीमें दौड़ती हैं, बम निरोधक दस्ते घंटों खाक छानते हैं और अंत में हाथ लगती है सिर्फ एक शब्द की सच्चाई 'होक्स' (अफवाह)। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ये धमकियां दे कौन रहा है और हाई-टेक चंडीगढ़ पुलिस अब तक इन तक क्यों नहीं पहुंच पाई?

कब-कब थमी शहर की रफ्तार: घटनाक्रम पर एक नजर

पंजाब और हरियाणा सचिवालय को बम से उड़ाने की ईमेल मिलने के बाद मुस्तैद पुलिस।
पंजाब और हरियाणा सचिवालय को बम से उड़ाने की ईमेल मिलने के बाद मुस्तैद पुलिस।

चंडीगढ़ में धमकियों का सिलसिला किसी सोची-समझी रणनीति की तरह लग रहा है। मुख्य घटनाओं का ब्यौरा इस प्रकार है :

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  • 28 जनवरी 2026 : साल की पहली बड़ी घटना, जब शहर के 26 नामी स्कूलों को एक साथ धमकी भरा ईमेल मिला।
  • 11 फरवरी 2026 : ट्राईसिटी के 10 स्कूलों (मोहाली और चंडीगढ़) को निशाना बनाया गया, जिससे अभिभावकों में भारी रोष दिखा।
  • 19 फरवरी 2026 : सुरक्षा के लिहाज से सबसे संवेदनशील पंजाब सिविल सचिवालय को उड़ाने की धमकी मिली। मुख्यमंत्री आवास के पास सुरक्षा बढ़ानी पड़ी।
  • 27 फरवरी 2026 : बोर्ड परीक्षाओं के बीच 21 स्कूलों को ईमेल भेजकर 'नरसंहार' की चेतावनी दी गई। परीक्षा केंद्रों पर अफरातफरी का माहौल रहा।
  • 2 मार्च 2026: ताजा मामला, जिसमें सेक्टर-17 बस स्टैंड और सेक्टर-34 पासपोर्ट ऑफिस को निशाना बनाने का दावा किया गया।

चुनौती : क्यों नहीं पकड़ा जा रहा 'ईमेल वाला' विलेन ?

आम तौर पर किसी भी डिजिटल अपराध में आईपी (IP) एड्रेस सबसे बड़ा सुराग होता है, लेकिन इस मामले में जांच एजेंसियां तीन बड़ी तकनीकी दीवारों से टकरा रही हैं :

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  1. डार्क वेब और प्रोटॉन मेल (ProtonMail) का खेल : जांच में सामने आया है कि ये ईमेल साधारण जीमेल से नहीं, बल्कि ProtonMail जैसी एंड-टू-एंड एनक्रिप्टेड सेवाओं से भेजे जा रहे हैं। ये कंपनियां स्विट्जरलैंड जैसे देशों के कड़े प्राइवेसी कानूनों के तहत चलती हैं और आसानी से यूजर का डेटा साझा नहीं करतीं।
  2. वीपीएन (VPN) और मल्टी-लेयर प्रॉक्सी : आरोपी Virtual Private Network का इस्तेमाल कर अपनी लोकेशन बार-बार बदल रहे हैं। यदि ईमेल भेजा गया है, तो उसका सर्वर कभी जर्मनी, कभी स्वीडन तो कभी तुर्की दिखाई देता है। इसे 'बाउंसिंग तकनीक' कहते हैं, जिससे असली लोकेशन का पता लगाना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
  3. बॉटनेट का इस्तेमाल : साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि ये ईमेल किसी व्यक्ति द्वारा नहीं, बल्कि 'बॉटनेट' (कंप्यूटरों का नेटवर्क) के जरिए ऑटो-शेड्यूल किए जा रहे हैं, जिससे भेजने वाले का फिजिकल एड्रेस छिपा रहता है।

प्रशासनिक चूक या सुरक्षा में कमी ?

हालांकि पुलिस हर बार मुस्तैदी दिखाती है, लेकिन जानकारों का मानना है कि कुछ मोर्चों पर अभी भी काम करने की जरूरत है :

  • साइबर फॉरेंसिक में देरी : चंडीगढ़ पुलिस के पास अंतरराष्ट्रीय स्तर के सर्वर को क्रैक करने के लिए जरूरी 'डिजिटल गेटवे' की कमी है। इसके लिए बार-बार केंद्रीय एजेंसियों (CBI/Interpol) पर निर्भर रहना पड़ता है।
  • स्कूलों में सुरक्षा प्रोटोकॉल : धमकियों के बावजूद कई स्कूलों में अब भी बैग स्कैनिंग या मेटल डिटेक्टर जैसे बेसिक इंतजामों का अभाव है।
  • पैनिक मैनेजमेंट : हर धमकी के बाद जिस तरह की अफरातफरी मचती है, वह शरारती तत्वों का हौसला बढ़ाती है। प्रशासन को 'साइलेंट सर्च' ऑपरेशन पर ध्यान देना चाहिए ताकि जनता में पैनिक न फैले।

पुलिस का पक्ष : 'अफवाहों से न डरें, हर ईमेल पर पैनी नजर'

शहर की सुरक्षा और जांच की प्रगति पर चंडीगढ़ पुलिस के आला अधिकारियों ने सख्त रुख अपनाया है। एसएसपी चंडीगढ़ के अनुसार, इन धमकियों का मुख्य मकसद केवल दहशत फैलाना है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भले ही ये धमकियां फर्जी (Hoax) साबित हुई हैं, लेकिन पुलिस हर ईमेल को 'वास्तविक खतरा' मानकर एसओपी (SOP) के तहत सर्च ऑपरेशन चलाती है।

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वहीं, साइबर सेल के एसपी केतन बंसल ने बताया कि पुलिस अपराधियों के डिजिटल पदचिह्नों (Digital Footprints) को ट्रेस करने के लिए 'म्युचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटी' (MLAT) के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय डेटा साझा करने वाली एजेंसियों के संपर्क में है। पुलिस ने चेतावनी दी है कि अफवाह फैलाना एक गंभीर अपराध है और सोशल मीडिया पर ऐसे संदेश फॉरवर्ड करने वालों पर भी नजर रखी जा रही है।

 क्या है धमकियों की हकीकत?

  • विस्फोटक: अब तक किसी भी स्थान से कोई संदिग्ध वस्तु या विस्फोटक बरामद नहीं हुआ है।
  • स्रोत: धमकियां विदेशी आईपी एड्रेस और एनक्रिप्टेड ईमेल सेवा के जरिए भेजी जा रही हैं।
  • अलर्ट: पुलिस ने साफ किया है कि जनता केवल आधिकारिक सूचना पर भरोसा करे और संदिग्ध वस्तु दिखने पर 112 पर कॉल करें।

चंडीगढ़ पुलिस ने अब इंटरपोल (Interpol) के जरिए उन देशों की सरकारों से संपर्क साधा है जहां के सर्वर इस्तेमाल हुए हैं। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन 'होक्स' कॉल्स के खिलाफ सख्त कानून और डेटा शेयरिंग संधि नहीं होती, तब तक इन 'डिजिटल आतंकियों' को दबोचना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।

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