'ब्रेव डॉग' को मिला बड़ा सम्मान, क्या किया था इस श्वान ने और क्या होता है मेंशन-इन-डिस्पैचेस
जर्मन शेफर्ड टायसन ने ऑपरेशन में अदम्य साहस दिखाकर आतंकियों की सटीक स्थिति का पता लगाने में मदद की
यह तो हम सब जानते हैं कि सैन्य बलों के साथ कार्यरत कुत्तों और घोड़ों को भी विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। यहां तक कि पशुओं को रैंक भी दिए जाते हैं और भी बहुत कुछ। ये जानवर भी विषम परिस्थितियों में गजब का साहस दिखाते हैं और फुर्ती के लिए जाने जाते हैं। इस बार एक श्वान को 'मेंशन-इन-डिस्पैचेस' सम्मान के लिए चुना गया है। इसका नाम है टायसन। जर्मन शेफर्ड ब्रीड। सैन्य अभियान के दौरान इसने असाधारण साहस दिखाया था।
इस संबंध में बताया गया कि इस श्वान ने ऑपरेशन स्नो लेपर्ड, ऑपरेशन मेघदूत, ऑपरेशन रक्षक और ऑपरेशन हिफाजत जैसे कई सैन्य अभियान में हिस्सा लिया था। असल में टू पैरा से संबंधित इस श्वान (एक जर्मन शेफर्ड) 'टायसन' का नाम उन 75 'मेंशन-इन-डिस्पैचेस' की सूची में शामिल है, जिन्हें उन सैन्यकर्मियों के लिए मंज़ूरी दी गई है जिन्होंने यह सम्मान 'ऑपरेशन रक्षक' के तहत किए गए कार्य के लिए दिया गया है।
रीमाउंट वेटरनरी कॉर्प्स का हमलावर श्वान दो पैरा (स्पेशल फोर्सेज) के साथ संबद्ध है। यहां उल्लेखनीय है कि देश की आजादी की 80वीं सालगिरह की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 89 'मेंशन-इन-डिस्पैचेस' को भी मंज़ूरी दी थी। इनमें भारतीय सेना के 75, भारतीय नौसेना के चार और भारतीय वायुसेना के 10 कर्मी शामिल हैं।
जब गोली टायसन ने खुद खाई थी...
सेना के व्हाइट नाइट्स कोर द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गयी जानकारी के मुताबिक बहादुर टायस ने ऑपरेशन 'त्राशी-1' के तहत वीरता दिखाई थी। बताया गया कि टायसन ने आतंकवादियों के ठिकाने में घुसने की अगुवाई की। इस दौरान आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। ट्रेंड बहादुर टायसन घबराया नहीं और ठिकाने में घुसता चला गया। इस दौरान उसे एक गोली भी लग गयी। आतंकियों की गोली से घायल टायसन फिर भी आगे बढ़ता रहा। उसके अदम्य साहस की सबने तारीफ की। टायन की इस वीरता से आतंकियों की सटीक स्थिति का पता चल गया। इस ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों ने तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों को ढेर कर दिया था।
क्या है इस सम्मान के मायने
असल में 'मेंशन-इन-डिस्पैच' सेना का एक विशेष सम्मान है। किसी खास अभियान या फिर युद्ध के दौरान असाधारण बहादुरी के लिए इस सम्मान को दिया जाता है। किसी भी असाधारण काम के लिए वरिष्ठों द्वारा इस सम्मान की सिफारिश की जाती है। विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के अनुसार, इस सम्मान की शुरुआत 25 नवंबर 1950 को हुई।
यह सम्मान सेना के तीनों अंगों अर्थात थल, जल और वायु सभी के जवानों और अधिकारियों को दिया जा सकता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में इस सम्मान से नागरिकों को भी नवाजा जा सकता है। इसके तहत एक पदक दिया जाता है। सैन्य गतिविधियों के संदर्भ में देखें तो पदक प्राप्तकर्ता को प्रमोशन में प्राथमिकता के साथ ही अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं।

