'ब्लू टिक' और स्क्रीनशॉट से नहीं होगा तलाक का फैसला: जानिये हाईकोर्ट ने व्हाट्सएप चैट को 'क्रूरता' मानने से क्यों किया इनकार
डिजिटल सबूतों पर बॉम्बे हाईकोर्ट की बड़ी व्यवस्था-सिर्फ मैसेज के आधार पर नहीं टूटेगा रिश्ता; पत्नी को सफाई का मौका न देना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ
WhatsApp Divorce : क्या मोबाइल की स्क्रीन पर दिखने वाले 'ब्लू टिक' और कड़वे संदेश किसी शादीशुदा रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म कर सकते हैं? क्या व्हाट्सएप पर होने वाली बहस को कानूनी तौर पर 'क्रूरता' मानकर एकतरफा तलाक दिया जा सकता है ? बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन सुलगते सवालों पर एक ऐसी व्यवस्था दी है, जो डिजिटल युग में अदालती लड़ाई लड़ रहे हजारों दंपतियों के लिए नजीर साबित होगी।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल व्हाट्सएप चैट (WhatsApp Chat) के स्क्रीनशॉट को 'क्रूरता' का अंतिम पैमाना मानकर तलाक की डिक्री जारी नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट के अनुसार, जब तक दूसरे पक्ष को उन संदेशों का खंडन करने या अपना पक्ष रखने का मौका न मिले, तब तक ऐसा फैसला कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने नासिक जिला फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक पति को उसकी पत्नी द्वारा की गई कथित क्रूरता के आधार पर तलाक दे दिया गया था।
चैट में क्या था, जिसे माना गया 'क्रूरता'?
पूरा मामला नासिक का है, जहां एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी के व्यवहार को 'क्रूर' बताते हुए तलाक की याचिका दायर की थी। पति ने अपनी दलीलों को पुख्ता करने के लिए साक्ष्य के रूप में पत्नी द्वारा भेजे गए व्हाट्सएप संदेशों के कई स्क्रीनशॉट पेश किए थे।
निचली अदालत का मई 2025 का आदेश : नासिक की फैमिली कोर्ट ने मई 2025 में पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए व्हाट्सएप चैट को मुख्य आधार बनाया था। अदालत ने तब माना था कि पत्नी इन चैट्स के जरिए पति पर नासिक छोड़कर पुणे शिफ्ट होने और अलग रहने का दबाव बना रही थी।
चैट में सास और ननद के खिलाफ कथित तौर पर अभद्र और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया था। निचली अदालत ने इसे 'इमोशनल ब्लैकमेल' और 'मानसिक क्रूरता' करार देते हुए तलाक मंजूर कर लिया था।
'सिर्फ चैट साक्ष्य तो हैं, पर अंतिम सच नहीं'
महिला ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी और दलील दी कि फैमिली कोर्ट का आदेश 'एकतरफा' (Ex-parte) था। उसे पति के आरोपों का जवाब देने या उन चैट्स का संदर्भ (Context) समझाने का कोई अवसर ही नहीं दिया गया।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
सफाई का अधिकार : हाईकोर्ट ने कहा कि "महज व्हाट्सएप चैट के आधार पर तलाक की डिक्री नहीं दी जा सकती, क्योंकि इन्हें साक्ष्यों के जरिए कानूनी रूप से सिद्ध (Lead Evidence) नहीं किया गया था।"
जिरह जरूरी : कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट पत्नी को उन चैट्स पर अपना बचाव करने या उनका खंडन (Rebuttal) करने का मौका देने में विफल रहा।
संदर्भ का महत्व : अदालत ने माना कि अक्सर संदेशों का अर्थ उनके संदर्भ के बिना बदल जाता है। बिना पत्नी का पक्ष सुने यह तय करना गलत है कि वे संदेश किन परिस्थितियों में लिखे गए थे।
अब दोबारा होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने नासिक फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को वापस (Remand) भेज दिया है। अब इस मामले की सुनवाई नए सिरे से होगी। हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि पत्नी को पति द्वारा पेश किए गए हर साक्ष्य पर सवाल उठाने और अपनी गवाही देने का पूरा मौका मिले।
कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि कानूनी लड़ाई को लंबा खींचने के बजाय, कपल को मध्यस्थता के जरिए आपसी सुलह की संभावना तलाशनी चाहिए।
डिजिटल युग में इस फैसले के मायने
यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी सीख है जो डिजिटल सबूतों को ही सर्वोपरि मानते हैं।
प्राकृतिक न्याय : यह आदेश सुनिश्चित करता है कि डिजिटल साक्ष्य के युग में भी 'दूसरे पक्ष को सुनने' का बुनियादी अधिकार सुरक्षित रहे।
स्क्रीनशॉट बनाम गवाही : अदालत ने साफ कर दिया है कि स्क्रीनशॉट केवल सहायक सबूत हो सकते हैं, वे पारंपरिक कानूनी गवाही का विकल्प नहीं हैं।
संतुलित न्याय : एकतरफा फैसलों पर रोक लगाकर हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में संतुलित कानूनी प्रक्रिया पर जोर दिया है।

